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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 730, कुल 869 में से

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पृष्ठ 730

७१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसने शंकर से ही कहा कि आप वसिष्ठजी को समझाइये। उनसे कहिये कि पार्वती का शापवचन कभी असत्य
नहीं होगा। तब वसिष्ठ को समझाने-बुझाने के लिये शंकर ने एक तीसरा चमत्कार किया। उन्होंने कहा कि
शुक्लपक्ष में सद्युम्न को पुरुषत्त्व प्राप्त होगा। कृष्णपक्ष में उसने स्त्री के रूप में बुध के साथ विलास किया। एक
पक्ष पुरुष और दूसरे पक्ष स्त्री, इस प्रकार उःशाप का पर्याय कर शिव ने उस पर कृपा की और उसे उसके राज्य
का अधिकारी बनाया। इस प्रकार सद्युम्न को पुरुषत्व अवश्य प्राप्त हुआ लेकिन वह पुरुषत्व उसे अच्छा नहीं
लगा। स्त्री संभोग के कारण उसे बुध से ही प्रीति हो गयी थी। स्वर्ग की अप्सराएँ सद्युम्न के पास आतीं लेकिन
वे उसे अच्छी नहीं लगती थीं। स्त्री के नाते उसकी बुध से ही पराकाष्ठा की प्रीति हो गयी थी। बुध को भी
सद्युम्न से ऐसी प्रीति हो गयी थी कि उसे उपभोग के लिये देवांगनाएँ अच्छी नहीं लगती थीं। पुरुष का पुरुष से
ही रममाण होने का मर्म मुझ श्रीकृष्ण को ही मालूम है। अन्य पापी बेचारे स्त्रीदेह पर ही आसक्त हो जाते हैं।
स्त्री देह में जो आत्मा है उसका भोग मैं श्रीकृष्ण ही कर सकता हूँ। अन्यों को विषय की इच्छा से स्त्री देह की
ही चाह होती है। अस्तु! और कितना बताऊँ? काम में निष्काम होकर रमना में रमापति ही जानता हूँ अथवा
जिनका निज का अनुभव है, वे जानते होंगे। पुरुषत्व की अपेक्षा कामरति में स्त्री देह में ही अधिक आसक्ति
रहती है। उस स्त्री विषय की निवृत्ति केवल सत्संग से ही होती है। वसिष्ठ की सत्संगति से स्त्रीभाव की निवृत्ति
हुई और सद्युम्न को पुरुषत्त्व प्राप्त हुआ। इससे स्पष्ट है कि सत्संग सारे त्रिभुवन में धन्य है। सद्युम्न को पुरुषत्त्व
प्राप्त होते ही वह अपने नगर में आया। किन्तु सारी सेना स्त्री रूप होने के कारण नष्ट हो गयी थी। इस प्रकार
उसकी सारी सेना विगत हो जाने के कारण उसे 'वीतसेन' यह नाम पड़ा। वीतसेन का पुत्र 'वैतसेन' अर्थात्
पुरूरवा था। उसने आत्मस्वरूप पहचान कर, विरक्ति से स्वर्ग की सारी भोग सम्पत्ति छोड़कर, उर्वशी के प्रति
कामासक्ति का त्याग कर, वह आत्मस्वरूप में रममाण हो गया। इस प्रकार आत्मस्वरूप में स्थिर होकर देहसंग
और अन्य संगतियों को मिथ्या मान वह त्रिभुवन में स्वानंद से संचार कर रहा था। जहाँ-जहाँ वह पग धरता वहाँ
सुख की राशियाँ एकत्र हो जाती थीं क्योंकि उसे आत्मानंद से सारी सृष्टि भरी हुई मालूम होती थी। इस प्रकार
वह ब्रह्ममय दृष्टि से ही विचरण करता रहता था। ब्रह्मस्वरूप होकर ब्रह्म में संचार करते हुए उसका पूरा जीवन
ही ब्रह्मरूप हो गया। वह जन्म-मरण भूलकर पूरी तरह पूर्ण मैं ही पूर्णस्वरूप होकर रहा। उर्वशी पुरूरवा का यह
आख्यान जो ध्यानपूर्वक श्रवण करेगा, उसके अगम्यागमनादि दोष नष्ट होंगे और साधकों को पूर्ण विरक्ति प्राप्त
होगी। इस प्रकार वैराग्य के बल पर वह राजा ब्रह्मपद पर पहुँचा। वैराग्य सत्संगति से उत्पन्न होता है और मेरे
भजन से सत्संग और विरक्ति ये दोनों प्राप्त होते हैं। सद्भाव से मेरी भक्ति करने से साधकों में विरक्ति उत्पन्न
होती है, ऐसा श्रीकृष्ण ने बताया जिसे उद्धव ने मन में ग्रहण किया। अब उस भजन प्रक्रिया के सम्बन्ध में प्रश्न
उद्धव अगले अध्याय में पूछेगा और उससे श्रीकृष्ण के मन को संतोष प्राप्त होगा। उद्धव अत्यन्त मधुर प्रश्न
पूछेगा और उससे श्रीकृष्ण को आनन्द होगा। उसी आनन्द के आवेग में वे भजन का मार्ग बतायेंगे। उपासना
काण्ड का सम्पूर्ण रहस्य, मुख्यरूप से क्रियायोग का निरूपण तथा आगम का सारा लक्षण स्वमुख से श्रीकृष्ण
बताएँगे। श्रोतागण उस कथा की ओर ध्यान दें। आत्मानन्द के मेघ गुरु जनार्दन ने इस प्रकार ज्ञानबोध से एकनाथ
को तृप्त किया।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धव संवादे एकाकार टीकायां
ऐलगोतोपाख्यान नाम षड् विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥