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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

६७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बोयेंगे वैसा फल प्राप्त होगा। उसी प्रकार स्वकर्म स्वयं मूलतया शुद्ध है किन्तु गुणों की वृत्ति के कारण उसका
फल भोगना पड़ता है। वाणी स्वाभाविक रूप से सरल और शुद्ध है। रामनाम से उसे ब्रह्मस्वरूप प्राप्त होता है।
लेकिन यदि वह व्यर्थ की बकवास करती है तो वह व्यर्थ हो जाता है और यदि वह निंदा करे तो उसके कारण
बाद में महापाप भोगना पड़ता है। उसी प्रकार श्रद्धायुक्त बुद्धि से स्वधर्माचरण करें तो वह मनुष्य को विरक्त करें
देता है किन्तु यदि त्रिगुणों का सन्निपात हो जाय तो वही श्रद्धा छल करने लगती है। उसके बारे में भी सुनो।
स्वधर्म कर्म में श्रद्धा उत्पन्न होती है और उसके कारण मनुष्य क्षणभर में विरक्ति की ओर मुड़ता है (क्षणभर में
उसकी भोगफल की आशा बढ़ने लगती है अथवा क्षण भर में वह ममता के साथ जुड़ जाता है। काम की भी
वैसी ही स्थिति है। एक क्षण निष्कामता में प्रेम रहता है, क्षणभर में स्त्रीभोग के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है
अथवा क्षणभर में परस्त्री के प्रति ही कामवासना उत्पन्न होती है। यही स्थिति धन की भी है। एक ही क्षण में धन
की आशा छोड़ देता है, दूसरे ही क्षण धन के प्रति चाह उत्पन्न होती है अथवा क्षण भर में दूसरे का धन हड़प
लेता है। धर्म तीन प्रकार का, कर्म तीन प्रकार का और धन प्राप्त करने में भी तीन भेद हैं। गुणवृत्ति के इस भेद
के कारण लोग स्वधर्म छोड़कर अकर्म करते रहते हैं (धर्म सात्विक, अर्थ तामस और काम राजस है। श्रद्धा, रति
और धन ये उनके क्रमानुसार फल हैं। मनुष्य धर्म-अर्थ काम इन तीनों में आसक्त होता है यह सन्निपात का काम
है) इस प्रकार धर्म, अर्थ और काम इनमें अनंत गुणों के सन्निपात हैं। यदि उन सबका यहाँ उल्लेख करें तो ग्रन्थ
का विस्तार अत्यधिक बढ़ जायगा। इसलिये त्रिगुणों का सन्निपात संक्षेप में बताया। श्रीकृष्ण भी पुनः उसी अर्थ
का निरूपण संक्षेप में सुना रहे हैं।
प्रवृत्तिलक्षणे निष्ठा पुमान् यर्हि गृहाश्रमे ।
स्वधर्मे चानुतिष्ठेत गुणानां समितिर्हि सा ॥ ८ ॥
पुरुष को जो गृहस्थाश्रम है वह केवल काम है ऐसा समझना चाहिये। उसमें चित्तशुद्धि के लिये नित्य
नैमित्तिक करना यही स्वधर्म है। गृहस्थ के घर में चक्की चलाने में, ऊखल में अनाज कूटने, चूल्हा सुलगाने,
पानी भरने और झाड़ू लगाने में जाने-अनजाने जीव हिंसा होती है, वही पंचसूना दोष हैं। गृहस्थाश्रम के कारण ये
दोष होते हैं इसलिये उसमें तमोगुण ही प्रमुख होता है और घर में गृहस्थ स्त्रीसुख का उपभोग करता है इसलिये
उसमें रजोगुण है। नित्य नैमित्तिक कर्म करना और स्वधर्म का पालन करना यही गृहस्थ का प्रमुख कर्तव्य है।
यही चित्तशुद्धि का रहस्य है इसलिये गृहस्थाश्रम में सत्त्वगुण भी सुलभ है। गृहस्थाश्रम की जो प्रवृत्ति है वह सदा
इन तीन गुणों से मिश्रित है। उन गुणों ने ही उसे गुणयुक्त बनाया है और वे उससे कर्माचरण करवाते हैं। किसी
भी रंग से रंगे बिना ही स्फटिक उस रंग का दिखायी देने लगता है। उसी प्रकार गुणों की संगत से गुणात्मक
आत्मा भी गुणकर्मों में विचरने लगता है। जिस प्रकार कसौटी स्वयमेव सोने का वर्ण स्पष्ट रूप से दिखाती है,
उसी प्रकार पुरुष की क्रिया भी गुणलक्षण के विभाग प्रदर्शित करती हैं।
पुरुषं सत्त्वसंयुक्तमनुमीयाच्छमादिभिः।
कामीदिभी रजोयुक्तं क्रोधाद्यैस्तमसा युतम् ॥ ९ ॥
जो उचित ढंग से इन्द्रिय निग्रह करता है, जो शमदम में निरन्तर खेलता रहता है, जिसके अंतःकरण में शान्ति
रहती है, वही सच्चा सात्त्विक है ऐसा मान लो। जो सदा फल की इच्छा से लोभी बना रहता है, संसार भोग के सुख
की इच्छा करता है, धन के लिये चाहे जैसा ढोंग करता है, वह मनुष्य रजोगुणी है, इसे ध्यान में रखो। स्वधर्म में

पच्चीसवाँ अध्याय ६७९
जिसकी रुचि नहीं होती, अधर्मप्रवृत्ति ही अच्छी लगती है, क्रोध और लोभ ने जिसका उत्साह निगल लिया रहता
है, वह सचमुच तामस है, ऐसा समझ लो। इस प्रकार पुरुष का कर्माचरण देखकर उसका लक्षण पहचानना चाहिये।
इसका नाम है अनुमान। विचारशील पुरुष इसे जानते हैं। सामान्य ढंग से इन तीनों गुणों का निरूपण किया। लेकिन
यदि यह भी समझ में न आ रहा हो तो उन्हीं गुणों की भिन्न-भिन्न वृत्तियों का श्रवण करो।
यदा भजति मां भक्त्या निरपेक्षः स्वकर्मभिः।
तं सत्त्वप्रकृतिं विद्यात् पुरुषं स्त्रियमेव वा॥१०॥
स्वकर्म का आचरण करते समय फल की इच्छा करना यही माया का परदा है लेकिन जो फल की आशा
छोड़, मुझसे मत्स्वरूप होकर मेरे ही भजन में निमग्न रहते हैं, फल की आशा छोड़ स्वधर्म से ही मेरा भजन
करते हैं, फिर वे पुरुष हों या स्त्री हों उन्हें सत्त्वगुण सम्पन्न समझना चाहिये। देह के अवयवों का जो स्वरूप होता
है उसके अनुसार उसे स्त्री या पुरुष यह नाम प्राप्त होता है। लेकिन स्त्री-पुरुषों में आत्मा या आत्मी यह भेद नहीं
होता। उनमें जीवभाव एक ही जैसा होता है। चित्त को एकाग्र कर जिस क्रिया का आचरण होता है, उसका नाम
है कर्म। उसमें निरपेक्ष दृष्टि से मेरा भजन करना यही सम्पूर्ण स्वधर्म है। यहाँ ऐसी आशंका उत्पन्न होती है कि
यदि कर्म करते समय फल की आशा बढ़ती चली जाय तो उस फल का भोग भोगना पड़ता है। फिर ऐसे स्वकर्म
से भक्ति कैसे होगी ? अर्थात् वह फल अत्यन्त खराब है। कर्म करने पर उसका फल बाधक होता है और न करने
पर नरक भोगना पड़ता है। इस प्रकार इस संसार में कर्म से ही लोग बँधे हुए हैं। जो जीव स्वतंत्र था, उसे कर्म ने
ही पराधीन किया। इस कर्म का चरित्र इतना विचित्र और अत्यन्त बाधक है। तब स्वकर्म से ही भक्ति किस
प्रकार सम्भव है ? इस शंका के उत्तर के रूप में भगवान उसका ही प्रकार बताते हैं यदि दौड़ कर सर्प का मुँह
पकड़ा जाय तो वह पूरे शरीर को घेर लेता है और उससे बचने के लिये यदि उसका मुँह छोड़ दें तो वह दंश कर
अपने प्रखर विष से प्राणनाश कर देता है। उस सर्प दंश का निवारण जिस प्रकार मंत्रवादी अथवा मदारी करता
है, उसी प्रकार कर्म में ही उत्पन्न कर्म की बाधा गुरुराज तत्काल नष्ट कर देता है। सद्गुरु की शरण जाने से वह
सारा कर्म ब्रह्मार्पण करा देता है और उद्धव! निष्काम बुद्धि से भगवत्सेवा करने का यही सच्चा लक्षण है, यह
जान लो। ब्रह्म ही कर्म का प्रकाशक है अतः सारा कर्म ब्रह्मात्मक ही है। ऐसी भावना धारण करना यही सचमुच
मुझे कर्म अर्पण करना है। इसी ढंग से मेरा भजन करना चाहिये। सारी इन्द्रियों में ज्ञान की स्फूर्ति होना, यही
ब्रह्मा की ब्रह्मशक्ति है। ऐसे निश्चय से कर्म का आचरण करना, इसी का नाम स्वकर्म भक्ति है। इस प्रकार के
स्वकर्म से स्वाभाविक रूप से जो भक्त मेरा भजन करते हैं वे सारे लोग हे उद्धव! शुद्ध सात्त्विक हैं, ऐसा
निश्चयपूर्वक समझो। जो लोग स्वधर्म को पूरी तरह निष्फल मानते हैं, वे केवल मूर्ख हैं। स्वधर्म ही चित्त के
मैल को स्वच्छ करता है और सारे कर्मों को समूल नष्ट करता है। स्वधर्म से होने वाले ऐसे लाभ को छोड़ जो
लोग विषय माधुरी की इच्छा करते हैं वे बेचारे राजस हैं। वे विषयसुख में ही पागल दिखायी देते हैं। विषय फल
की इच्छा करने से उसके लिये देह धारण करना पड़ता है और देहधारण करना दुःखदायी होने के कारण उसके
योग से स्वर्ग, नरक आदि फल भोगने पड़ते हैं। इस प्रकार संसार में राजस और तामस प्रकृति दुःखदायक ही है।
उन दोनों प्रकारों की गुणवृत्ति सुनो। तुम्हें स्पष्ट करके बताता हूँ।
यदा आशिष आशास्य मां भजेत स्वकर्मभिः।
तं रजःप्रकृतिं विद्याद्धिंसामाशास्य तामसम्॥११॥

६८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वधर्म का आचरण कर जो नाना प्रकार के फलों की इच्छा करता है, वह उसका कर्म काम्य है, यह जान
लो। उसे राजस धर्म कहते हैं। जो अंतःकरण में अत्यन्त लोभी होता है वह जो भी कर्म-धर्म-आचरण करता है
वह सब लोभवश ही होता है क्योंकि उस कर्म का फल मिले यही उद्देश्य रहता है। कर्म के मूल स्वरूप में
काम्यत्व बिलकुल नहीं होता। कामना उस कर्म को काम्य बनाती है। सुवर्ण वास्तव में अपने मूल स्वरूप में स्थिर
रहता है किन्तु हम बड़े परिश्रम से उसके अलंकार बनाते हैं। उसी प्रकार स्वकर्म स्वभाव से पवित्र ही है। स्वधर्म
से मेरा शुद्ध भजन घटता है लेकिन उसमें फल की इच्छा कर हम स्वयं ही उसे काम्य बना देते हैं। फल की इच्छा
से मेरी जो उपासना की जाती है, वह मेरा भजन नहीं बल्कि केवल मेरे फल का भजन है। इस प्रकार जो सकाम
स्वधर्माचरण किया जाता है, वह प्रकृति राजस है यह मान लो। इस प्रकार की प्रकृति का खेल जहाँ दिखायी दे,
फिर वह स्त्री हो या पुरुष हो, वे सारे लोग राजस हैं, यह समझ लो। अब तामस की गुणवृत्ति सुनो। अंतःकरण
क्रोध से भरा होता है और उसी से उसका स्वधर्माचरण होता है इसलिये वह अपने शत्रु के लिये मृत्यु के फल की
ही इच्छा करता है। वह प्रकृति तामस है। जिसके अंतःकरण में द्वेष ने घर बनाया होता है, जिसके मन में असीम
क्रोध रहता है, जो प्राणिमात्र के प्रति निष्ठुर होता है, जिसकी प्रकृति सदा क्रूर रहती है, ऐसे स्वभाव का पुरुष हो
या स्त्री हो, उद्धव! वे लोग संसार में तामसी हैं यह निश्चयपूर्वक जान लो। देखो, "जीव यदि स्वरूपतः ब्रह्म ही
है, तो फिर भगवान उसे 'मेरी (भगवान की) भक्ति करो' ऐसा क्यों कहते हैं ? जीव ही सेवक क्यों बन गया ?
और भगवान ही 'सेव्य' (जिसकी सेवा की जाती है) कैसे बन गया ?'' यह शंका नष्ट हो इसलिये श्रीकृष्ण इसी
अर्थ का निरूपण करते हैं कि यह सेव्य-सेवक भाव गुण सम्बन्धों के कारण उत्पन्न हुआ है।
सत्वं रजस्तम इति गुणा जीवस्य नैव मे।
चित्तजा यैस्तु भूतानां सज्जमानो निबध्यते ॥ १२ ॥
जिस प्रकार छाया देह के साथ बँधी न होने पर भी सदा देह के साथ ही रहती है, उसी प्रकार माया
भगवान के अधीन रहकर, उसे स्पर्श किये बिना ही वह अपने साथ चलाता रहता है। सचमुच माया को साथ
चलाने वाला और उसे अदृश्य करने वाला प्रभु भगवान ही है। लेकिन वेद उसे ही माया का नियंता कहते हैं।
सूर्य अँधेरे को नष्ट करता है, किन्तु वह अँधेरा जिस प्रकार उसके सामने कभी नहीं आता, उसी प्रकार माया का
नियंता यद्यपि हरी है, फिर भी माया भगवान को नहीं दिखायी देती। मेरा केवल देखना यही माया का मुख्य
लक्षण है। मेरे पास माया अपने गुणाभिमान के साथ नहीं रहती। माया में प्रतिबिम्बित जो चैतन्य होता है उसे ही
जीवत्व कहते हैं। तीन गुणों ने उसे देह को आबद्ध कर देहाभिमान को दृढ़ कर दिया है। जीव को यदि
देहाभिमान चिपका हुआ हो तो वह माया के अधीन होता है। अतः माया का नियंता मैं नारायण, वही जीव का
भी स्वामी हो गया यह समझ लो। जीव गुणों के अभिमान से बद्ध रहता है इसलिये वह सेवक हो गया और
आत्मा गुणों से अलिप्त अर्थात् निर्मल होने के कारण, वही जीव को जन्म-मरण के बन्धन से छुड़ाने वाला हो
गया। देखो ! इस प्रकार सेव्य सेवक भाव का विभाग दिखाकर तीन गुणों का सम्बन्ध भगवान स्वयं स्पष्ट करके
बता रहे हैं। तीन गुण समान ही हैं किन्तु उनमें जिन-जिन गुणों का क्षोभ होकर वे अधिक बढ़ जाते हैं उनका
स्वरूप श्रीहरि बताते हैं। ब्रह्म अपनी पवित्रता के लिये प्रसिद्ध है। कर्म भी अपनी निर्मलता के कारण अत्यन्त
शुद्ध है। फिर भी कर्म में जो कर्म का बन्धन उत्पन्न होता है वह गुण क्षोभ के योग से विकृत हुए चित्त का संबंध
है। कर्म और ब्रह्म में कोई दोष नहीं है। दोष चित्तवृत्ति में है और वह भी गुणक्षोभ के कारण होता है। वही पुरुष

पच्चीसवाँ अध्याय ६८१
को अनर्थ में फँसाता है। इस अर्थ का निरूपण कर मैंने गुणों का मिश्र लक्षण बताया। अब प्रत्येक गुण बढ़ने पर
उस गुण का स्वरूप कैसा हो जाता है, सुनो। जो गुण अत्यधिक बढ़ता है, उसकी आज्ञा में अन्य गुण विचरण
करते हैं। उस समय पुरुष की स्थिति कैसी रहती है वह श्रीहरि उद्धव को बताते हैं।
यदेतरौ जयेत् सत्त्वं भास्वरं विशदं शिवम्।
तदा सुखेन युज्येत धर्मज्ञानादिभिः पुमान् ॥ १३॥
जो पुरुष फल की आशा समूल छोड़कर निर्विकल्प, अभिमानरहित होकर स्वधर्माचरण करने लगता
है,उसका सत्त्वगुण रज और तम इन दोनों गुणों पर विजय प्राप्त करता है। जब भाग्य का भण्डार खुलता है, उस
समय हरिकथा श्रवण का सुअवसर प्राप्त होता है, मुख से हरिनाम कीर्ति का वर्णन करना अच्छा लगता है और
इस प्रकार अत्यन्त शुद्ध सत्त्व की वृद्धि होती है अथवा यदि ईश्वरकृपा से सत्संगति का लाभ प्राप्त हो जाय तो
भगवान के गुणानुवाद सुनने के लिये कान आतुर हो उठते हैं और वाणी अत्यन्त प्रेम से रात दिन भगवान की
नामकीर्ति का वर्णन करने में लीन हो जाती है। इस प्रकार के आचरण से रज और तम ये दोनों गुण क्षीण हो जाते
हैं और सत्त्वगुण अत्यन्त उत्साह से बढ़ता है। उस सत्त्व की साद्यंत स्थिति सुनो। तेजरूप से अत्यन्त प्रकाशयुक्त,
स्वच्छता से अत्यन्त निर्मल, शिव का अर्थ है शांत और सरल, यह सत्व का प्रमुख स्वरूप है। सत्व की यह
सत्त्ववृत्ति जिसके हाथ लगती है, उस साधक पुरुष की स्थिति उस समय कैसी होती है, सुनाता हूँ। उसे उस
समय विवेक की नौका मिल जाती है। उसे वैराग्य का आत्मरहस्य प्राप्त होता है। समस्त इन्द्रियों पर प्रकाश
पड़ता है और स्वधर्म तो अपने शिखर पर पहुँच जाता है। उस समय लोग उसे ज़बर्दस्ती से अधर्म, अहंकार,
अभिमान, झूठ आदि की शिक्षा भले ही देते हों लेकिन वह अधर्म के कृत्य बिलकुल नहीं करता। दुःख का
साधन सन्त्रिकट होने पर भी सात्त्विक वृत्ति का पुरुष सदा सुखसम्पन्न ही रहता है। सात्त्विक का मन बलात्कार से
क्षुब्ध होने पर भी क्षुब्ध नहीं होता। ऐसी आत्मसत्त्व की दृष्टि से सुख ही सुख से मिलने आने पर, सारी सृष्टि
आत्मानंद से भर गयी है ऐसा उसे लगता है। यही शुद्ध सत्व की बाढ़ है। जिसके पास ऐसा शुद्ध सत्त्व रहता है,
उसकी सेवा शम और दम करते हैं। वैराग्य उनके चरणों पर गिर पड़ता है। उद्धव! ऐसा सात्त्विक पुरुष मानों
सत्त्व गुण का भण्डार ही है। उसी प्रकार सत्व और तम को जीत कर जब रजोगुण बढ़ता है, उस समय का
राजस का लक्षण सुनो। इतना कहकर श्रीकृष्ण आगे कहने लगे।
यदा जयेत्तमः सत्त्वं रजः सङ्गं भिदा बलम्।
तदा दुःखेन युज्येत कर्मणा यशसा श्रिया॥ १४॥
रजोवृद्धि का कारण है, देह में ज्ञानाभिमान उत्पन्न होना। ऐसा पुरुष पग-पग पर दूसरों के गुण और दोषों
को देखता रहता है और सम्मान तथा प्रतिष्ठा की इच्छा करता है। रजोगुण की कीर्ति अद्भुत है। ऐसे मनुष्य को
ज्ञान होते हुए भी कामासक्ति रहती है। वह मन में अनेक प्रकार के भोगों की इच्छा रखता है। इससे रज की बाढ़
अमर्यादित हो उठती है। इस प्रकार रजोगुण की बाढ़ प्रबल होकर वह सत्त्व और तम को जमीनदोस्त कर देती
है। अब, जिससे रज का भी स्वरूप नष्ट हो जाता हो, ऐसी बात बताता हूँ। मूल श्लोक में रजोगुण 'सङ्ग-भिदा-
बलम्' इन तीन शब्दों में कहे गये तीन प्रकार से प्रबल होता है, यह केवल रजोगुण का वर्णन है। उसे ही
श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं। संग का अर्थ है—देहाभिमान। भेद का अर्थ है 'मैं और मेरा' यह भेदभाव। बल
का अर्थ है प्रबल इच्छा और प्रवृत्ति का पूर्व आग्रह। देहाभिमान से दुःख उत्पन्न होता है। भेद से भय पीछा करता

६८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है और ऐसा मनुष्य उस नश्वर देह के बल से काम्य कर्म का आचरण शुरु करता है। जिस कर्म के योग से यश
और अकूत धन प्राप्त हो ऐसा कर्म वह करता ही जाता है। रजोगुण से ऐसा आचरण घटता है। त्रिभुवन में मैं ही
अकेला पवित्र हूँ। मेरा ही कर्माचरण श्रेष्ठ है, इस प्रकार की प्रवृत्ति, मान्यता और आसक्ति का होना, यही राजस
स्थिति समझनी चाहिये। रज का बल बड़ा अद्भुत रहता है। उसके कारण मनुष्य अद्भुत काम करना स्वीकार
कर लेता है और अपने उद्योग का दायरा बढ़ाता है। इसे श्रेष्ठ राजस गुण समझना चाहिये। ऊपर से उसकी वृत्ति
सात्त्विक लगती है किन्तु अंतःकरण में कर्म की वासना और धन का लोभ रहता है और जिसके मन में स्त्री की
चाह होती है, वह सचमुच राजस है। अब सत्त्व और रजोगुण इन दोनों को जीतकर जब तमोगुण पूरी तरह बढ़ता
है, उस समय के उस पुरुष के लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
यदा जयेद् रजः सत्त्वं तमो मूढं लयं जडम्।
युज्येत शोकमोहाभ्यां निद्रया हिंसयाऽऽशया॥ १५ ॥
सत्त्व और रज का लोप कर तमोगुण जब प्रबल होता है तो वह उस पुरुष को पूरी तरह जड़, मूढ़ और
अत्यन्त स्तब्ध कर देता है। जब अत्यन्त विश्वास जताकर पराया धन डुबाने का कार्य होता है, अथवा परस्त्रीगमन
होता है, उस समय उस घटना से तमोगुण बढ़ गया ऐसा समझना चाहिये। अपने ही मुख से दूसरों के दुःखों का
उच्चार करना, स्वयं साधु की निंदा करना, संतसज्जनों का द्वेष करना, ये लक्षण जहाँ दिखायी दें वहाँ तमोगुण ने
अड्डा जमा लिया है, ऐसा समझना चाहिये। कोहरा छाने पर सूर्य ढँक जाता है, उसी प्रकार विवेक के अस्तित्व
को भी तमोगुण ढँक देता है। सत्त्वगुण प्रकाश देता है, रजोगुण प्रवृत्ति बढ़ाता है और इन दोनों को निगल कर
तमोगुण की वृद्धि अधर्म के योग से बढ़ती ही जा रही है। श्रेष्ठ जनों का अपमान करने से अथवा साधु का
गुणदोष देखने से तमोगुण किस प्रकार क्षुब्ध होता है उसका स्वरूप सुनो। तमोगुण जब पर्याप्त मात्रा में बढ़ता है
तो स्फूर्ति मंद होती है और तमोगुण बुद्धिनाश कर जीव को जड़ बना देता है। कार्य कौन सा और अकार्य कौन-
सा इस विचार का ज्ञान, उसकी स्फूर्ति पूर्ण रूप से अन्धी हो जाती है। इसका नाम है, मूढ़ता। अब लय का
लक्षण सुनो। चित्त जागृत अवस्था में होते हुए भी जब अर्थ, स्वार्थ, परमार्थ अथवा कृत्य-अकृत्य कुछ नहीं
सूझता, इसी का नाम है लय। उद्योग न करने से सारे इन्द्रियों के व्यापार कुंठित हो जाते हैं और ज्ञानशक्ति पूरी
तरह लुप्त हो जाती है, इसका नाम है जड़त्वप्राप्ति। मूढ़त्व के कारण शोक और दुःख प्राप्त होता है। जड़त्व से
मिथ्या मोह उत्पन्न होता है और मोह के कारण अधर्म में अत्यन्त अविचारी होकर पाप हो जाता है। अब लय का
चमत्कार सुनो। अहोरात अत्यन्त निद्रा आती है। तामस् को निद्रा के सिवा ब्रह्मानन्द का सुख भी नहीं भाता।
तमोगुण पूरी तरह बढ़ने पर पुरुष की ऐसी स्थिति होती है। अब सत्त्वादि गुण बढ़ने पर कौन-सा फल प्राप्त होता
है, उसे श्रीकृष्ण बताते हैं।
यदा चित्तं प्रसीदेत इन्द्रियाणां च निर्वृतिः।
देहेऽभयं मनोऽसङ्गं तत्सत्व विद्धि मत्पदम्॥ १६॥
सत्त्वगुण बढ़ने पर अंतःकरण सदासर्वदा प्रसन्न रहता है और काम, क्रोध और लोभ का बिलकुल स्फुरण
नहीं होता। विषय भोग के लिये जो चित्त व्याकुल रहता था, वही अब विषयोपभोग में उदास रहता है। विषय
भले ही देह पर गिर पड़े लेकिन वह उनसे नहीं उलझता। जिस प्रकार पानी में रहकर भी कमलिनी का पत्ता
पानी से अलिप्त रहता है, उसी प्रकार मेरे ज्ञान के कारण चित्त विषय में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहता है।

पच्चीसवाँ अध्याय ६८३
देह को मृत्यु का भय तो सदा का लगा हुआ है। वह मृत्यु देह के पास आने पर भी सात्त्विक के मन में भय नहीं
उत्पन्न होता क्योंकि ऐसे सात्त्विक लोग मेरे चरणों पर भक्तिरस में डूबे रहते हैं। जब तक 'मैं तुम' का भास होता
है, तब तक मृत्यु अवश्य बाधक होती है। लेकिन सात्विक भक्त मेरे अधिकार से भिन्न नहीं होता इसलिये उसे
मृत्यु का भय नहीं है। जो सात्विक है वह अनन्य भाव से मेरी शरण में आया रहता है इसलिये उसे जन्म-मरण
बाधक नहीं होता। सत्त्वगुण मनुष्य से इस प्रकार का व्यवहार कराता है। अब रज का लक्षण सुनो।
विकुर्वन् क्रियया चाधीरनिवृत्तिश्च चेतसाम्।
गात्रास्वास्थ्यं मनो भ्रान्तं रज एतैर्नीशामय॥ १७॥
जब रजोगुण उफनता है तो विषय की भयंकर चिन्ता उत्पन्न होती है। अतः कर्मेंन्द्रियों से नाना प्रकार के
ठाठ-बाट प्रारम्भ कर देता है। शरीर स्वस्थ होते हुए भी मन चिंतात्तुर और भ्रांत रहता है। विषयों का स्वार्थ बढ़ा
कर वह सदा दुःखी रहता है। पत्नी, बच्चे, धन, सम्पत्ति आदि होते हुए भी वह रजोगुण मन का स्वार्थ और भी
अधिक बढ़ाता है। राजस की चित्तवृत्ति क्षणभर के लिये भी निवृत्ति नहीं चाहती। हे उद्धव ! विकार का कारण न
रहते हुए भी हम मन में विकार का चिंतन करते हैं यही राजस का प्रमुख लक्षण है। न घना अँधेरा हो और
प्रकाशयुक्त दिन भी न हो, ऐसी जो इन दोनों के बीच की हलकी अँधेरी शाम रहती है, ठीक वैसा ही रजोगुण
होता है। अब तमोगुण का लक्षण सुनो। उसका लक्षण जड़त्व है।
सीदच्चित्तं विलीयेत चेतसो ग्रहणेऽक्षमम्।
मनो नष्टं तमो ग्लानिस्तमस्तदुपधारय॥ १८॥
चित्त में गहन चिन्ता उत्पन्न होकर उस चिन्ता के असाध्य मोह में चित्त डूब जाता है और किसी भी प्रकार
के ज्ञान का उसके हृदय में उदय नहीं होता। प्रगाढ़ निद्रा के अलावा जितना भी कुछ अज्ञान रहता है वह सब
ज्ञान को देखकर भागने लगता है, लेकिन उसमें एक चमत्कार होता है और वह यह कि वह अज्ञान उस ज्ञान को
निगल लेता है। तामस पुरुष जगा रहने पर भी सोया हुआ-सा लगता है। जिस प्रकार कोई अन्धा अमावस की
रात जब आकाश बादलों से घिरा हो, उस समय किसी तरह लड़खड़ाता हुआ चलता है उसी प्रकार वह कर्म तो
करता है लेकिन पर्याप्त उत्साह नहीं होता। पूरा आलस का गोला बना गठरी की तरह पड़ा रहता है। तमोगुण की
ग्लानि की पीड़ा ऐसी होती है। उसके कारण चित्तवृत्ति की दृष्टि पर परदा पड़ा रहता है। मनोवृत्ति सदा संकल्पों
और विकल्पों की कल्पना कर ऊँची उड़ान भरती है किन्तु तमोगुण के कारण उस मन की स्थिति जड़ हो जाती
है और संकल्प का उत्साह भी नहीं रहता। इस प्रकार मनोवृत्ति का लय करने वाली ऐसी तमोवृत्ति की वृद्धि होती
है। इस प्रकार जब तम का बाल बढ़ जाता है उस समय अज्ञान ही मन को खा जाता है। मन नष्टप्राय होकर मूढ़
होकर बेहोश पड़ा रहता है। लेकिन मन यदि पूरी तरह नष्ट ही हो जाता तो फिर महादुःख कौन भोगता ?
इसलिये तम से ही एकरूप होकर मन जड़मूढ़ होकर पड़ा रहता है। उद्धव! इस प्रकार की जो स्थिति होती है
वह अत्यन्त दुःखदायी होती है। इसी को तम की स्थिति समझ लो। गुणों की वृद्धि बढ़ाते समय किस गुण से
कौन सी वृद्धि बढ़ती है इसका निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं करते हैं।
एधमाने गुणे सत्वे देवानां बलमेधते।
असुराणां च रजसि तमस्युद्धव रक्षसाम्॥ १९॥
दैवी, आसुरी और राक्षसी यही तीन प्रकार के गुणों की सम्पत्ति है। इन्द्रियों की जो स्थिति ब्रह्माण्ड में रहती

६८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है, वही स्थिति पिण्ड में रहती है। ब्रह्माण्ड के सारे देवता महापुरुष के अवयव हैं। पिण्ड में भी वे सब एक
होकर रहते हैं। स्वधर्मशास्त्र के अनुसार उचित निष्कर्म की ओर जो प्रवृत्ति होती है, ऐसी इन्द्रिय प्रवृत्ति जहाँ
होगी, वही दैवी या सत्वस्थ सम्पत्ति है। मन में दृढ़ कामासक्ति और स्वधर्म के अनुसार आचरण करने की जो
इन्द्रिय प्रवृत्ति रहती है, वह राजस अर्थात् आसुरी सम्पत्ति है। लोभ और मोह के वश में होने के कारण मन में
क्रोध का होना और अधर्म की ओर प्रवृत्ति होना, ऐसी जो इन्द्रियों की स्थिति होगी, वह तामसी और राक्षसी
सम्पत्ति है। क्षण में इच्छारहित होना, ऐसा स्वधर्म जहाँ बढ़ता है उसे वह राक्षसी वृत्ति समझनी चाहिये। वह दैवी
और आसुरी वृत्ति का विनाश करती है। सकाम-निष्काम मोहभ्रम में फँस कर जिसकी वृत्ति व्यवहार करती है,
वहाँ देवता, असुर और राक्षस इन सब में भयंकर झगड़ा चलता रहता है। क्षणभर के लिये परमार्थ मे रुचि,
क्षणभर के लिये द्रव्य की इच्छा, क्षणभर के लिये अनर्थ करने में रुचि, क्षण में पराया धन और परायी स्त्री में
रुचि। ऐसी चित्तवृत्ति में सच्ची शांति कभी नहीं प्राप्त होगी। फिर परमार्थ की प्राप्ति किस ढंग से होगी? साधक
लोग हमेशा पूछते रहते हैं कि चित्तवृत्ति में कौन-सी पीड़ा होती है? उसी पीड़ा की स्थिति तुम्हें स्पष्ट करके
बतलायी। यदि एक ही गुण पूर्ण रूप से स्थिर हो जाय तो एक ही प्रकार की वृत्ति बढ़नी चाहिये, लेकिन वैसा
होता नहीं है। गुण एक-दूसरे का अपमान करते हुए झगड़ते रहते हैं। एक ही गुणावस्था प्राप्त नहीं होती इसलिये
एकविधता नहीं हो पाती और अमर्याद भवपीड़ा की बाधा होती रहती है। तमोगुण अधर्म की ओर बढ़ता रहता है,
रजोगुण देहकर्म में लगता है और सत्त्वगुण की वृद्धि ही नहीं होती। फिर जीव की मुक्ति कैसे हो? रज और तम
इन दोनों के चंगुल में सत्त्व फँसा रहता है। वह बढ़ ही नहीं सकता। उस सत्त्व गुण की बाढ़ केवल आशा को
समूल नष्ट करने से होती है। तीन गुणों की त्रिकुटी हमने अपने अंतःकरण में कल्पना के ही बल पर खड़ी की
रहती है और अंत में वही संसार भय के रूप में बाधक बनकर खड़ी रहती है। सत्त्व के योग से देवताओं को
बल प्राप्त होता है, रजोगुण से दैत्य प्रबल होते हैं और तमोगुण से केवल राक्षसों का जोर बढ़ता है। इन तीन गुणों
की वृत्तियों की व्यवस्था तुम्हें बतायी। अब तीन अवस्थाओं के सम्बन्ध में भी बताऊँगा।
सत्त्वाज्जागरणं विद्याद् रजसा स्वप्नमादिशेत् ।
प्रस्वापं तमसा जन्तोस्तुरीयं त्रिषु संततम् ॥ २० ॥
सत्त्वगुण देह में हो तो जीव को स्वप्न और सुषुप्ति स्पर्श नहीं करती और जीव में जो निरन्तर जागृति रहती
है, उससे इन्द्रिय प्रवृत्ति सचेत रहती हैं। रजोगुण प्रबल होने पर स्वप्न चित्तवृत्ति पर विजय प्राप्त करता है।
जागृति और सुषुप्ति दूर चली जाती हैं और वह राजस पुरुष बैठे-बैठे ही स्वप्न देखने लगता है। तमोगुण जब
बढ़ जाता है तो वह जागृति और स्वप्न इन दोनों को दूर भगाता है और जीव पर गहरी निद्रा का प्रभाव छा जाता
है। उसे सभा में बैठाने पर वह बात करते-करते ही झपकी लेने लगता है। खाना खाते-खाते ही वह गहरी निद्रा
में सो जाता है। हे उद्धव ! क्षण में जागृति, क्षण में सुषुप्ति अर्थात् निद्रा, क्षण में स्वप्न का अनुभव; यह वास्तव में
तीन गुणों की मिश्र वृत्ति है। अब जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं को प्रकट करने वाला जो
आत्मतत्त्व है, उस चौथी अवस्था को ज्ञाता लोग तुर्यावस्था कहते हैं। उद्धव ! जो जागृति को जगाती है, जो स्वप्न
में स्वप्न को परिचालित करती है और जो निद्रा को भी सुलाती है, उस अवस्था को तुरीय अवस्था कहते हैं। जो
तीनों अवस्थाओं में होते हुए भी उनमें भासित नहीं होती, जो निर्गुण होते हुए नित्य रहती है, उस अवस्था को ही
तुरीय कहते हैं। जिस प्रकार पुत्र के जन्म के कारण पुरुष को 'पिता' यह नाम प्राप्त होता है, उसी प्रकार तीनों

अध्याय २५ से ३१: ऐल-गीता, भिक्षु-गीता, यदुवंश उपसंहार व एकनाथी भागवत फलश्रुति

पच्चीसवाँ अध्याय ६८५
अवस्थाओं के गुण उसमें होने के कारण ही उसे तुरीय कहते हैं। परब्रह्म में इन सभी अवस्थाओं का आभास
होता है और इस प्रकार भासमान होने वाली अवस्था तत्काल नष्ट हो जाती है। किन्तु उस भास के विनाश के
कारण परब्रह्म नष्ट नहीं हो जाता। वह तुरीय भी शेष रहता है। तुरीय यह अवस्था त्रिकाल निरन्तर रहने वाली
है। अब गुणवृद्धि के कारण कर्म की जैसी गति होती है उसका वर्णन श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
उपर्युपरि गच्छन्ति सत्वेन ब्राह्मणा जनाः।
तमसाधोऽध आमुख्याँद् रजसान्तरचारिणः ॥ २१ ॥
ब्राह्मणजन ही मुख्यतः सत्वगुण के आश्रय स्थान हैं। ऐसे जो ब्राह्मण ब्रह्मार्पण न करने पर भी स्वधर्माचरण
करते हैं, उन्हें स्वधर्म की कर्मशक्ति से ही ऊर्ध्वलोक में जाने को मिलता है। अब उन ब्राह्मणों को अलग-अलग
लोग कैसे प्राप्त होते हैं, वह भी सुनो। जो सात्त्विक ब्राह्मण होते हैं, वे स्वर्गलोक और महर्लोक को पार कर
जनलोक में पहुँचते हैं और बाद में तपोलोक का भी उल्लंघन कर सत्यलोक पहुँचते हैं। रजोगुण बढ़ने पर जीव
को शूद्रादिक चांडाल जाति प्राप्त होती है और वह बार-बार जन्म, मृत्यु के भोग भोगता ही रहता है। तमोगुण
बढ़ने पर पश्वादि योनि में जन्म लेकर मच्छर, मक्खी, पेड़, पत्थर आदि योनि भोगनी पड़ती हैं। प्राणी के
अंतकाल में देह में जो गुण बढ़ता है, उस मृत्यु का क्या फल है उसे श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
सत्वे प्रलीनः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः।
तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणाः ॥ २२ ॥
संसार में तीन गुण प्रमुख हैं। उसमें जिसे सत्वगुण बढ़कर मृत्यु आती है, वह स्वर्ग का सुख भोगने के
लिये दिव्य देह प्राप्त करता है। इस प्रकार सात्विक पुरुष सत्वगुण के ही प्राबल्य में मृत्यु पाने पर स्वर्गलोक जाते
हैं। रजोगुण में मृत्यु पाने पर उन्हें मनुष्यलोक प्राप्त होता है और अन्त में काल में तमोगुण की अधिकता होकर
मृत्यु होने पर, वे अत्यन्त दुःखदायी और महाभयंकर नरक भोगते हैं। प्रेम से मेरी भक्ति करने पर भक्तों के हृदय
में, अंत समय में मेरी आत्मतेज से दीप्त मूर्ति प्रकट होती है। शंख, चक्र, गदा आदि सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र धारण
किये पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण का ध्यान कर जो मरण प्राप्त करता है, वह वैकुण्ठ में मत्स्वरूप हो जाता है। समस्त
प्राणिमात्र में मैं ही आत्मा के रूप में परिपूर्ण विद्यमान हूँ। इस प्रकार जिनका भजन अखण्ड चलता रहता है, वे
जीवित अवस्था में ही तीनों गुणों को जीत कर निर्गुण पद को प्राप्त करते हैं। यदि दैवयोग से उन्हें मरण आ जाय
तो मेरे सिवाय उन्हें कोई स्थान नहीं है। निजानंद से परिपूर्ण होने के कारण वे स्वयं ही निर्गुण स्वरूप हो जाते
हैं। मेरा निर्गुण स्वरूप, अथवा वैकुण्ठ में मेरा सगुण स्वरूप ये दोनों सचमुच एक ही हैं। जो कोई स्वर्ग, नरक,
मृत्युलोक अथवा शुद्ध निर्गुण स्वरूपं प्राप्त करते हैं, उनके साधनों का चमत्कार श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
मदर्पणं निष्फलं वा सात्विकं निज कर्म तत्।
राजसं फलसंकल्पं हिंसाप्रायदि तामसम्॥ २३॥
सारी क्रियाओं तथा कर्म आदि का आचरण बिना संकल्प लिये करने से, वह स्वयं ही ब्रह्मार्पण हो जाता
है। यही शुद्ध सत्त्व से निर्गुणस्वरूप का साधन है। वही सभी वर्णाश्रम धर्म का आचरण करता है लेकिन उसके
फलों की इच्छा नहीं करता। उसमें मेरी भक्ति का प्रेम ही रहता है। मेरा भजन करना यही स्वधर्म है। इसी का
नाम है, अपना कर्त्तव्य। यह रहस्य जो जानता है उसके ही कर्म को 'सात्त्विक कर्म' कहते हैं। जो अपने धर्म के

६८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अनुसार आचरण कर, इन्द्रादि देवताओं को यज्ञयाग कर सन्तुष्ट करता है और उससे ऐहिक और पारलौकिक
फलों की इच्छा करता है, उसका यह कर्म 'राजस' है। जिस कर्म में प्रत्यक्ष हिंसा घटती है अथवा जारणमारणादि
प्रयोग करना आवश्यक रहता है और कर्म का स्वरूप ही घृणित मालूम होता है वह कर्म स्पष्ट ही तामस है।
जिस कर्म में ढोंग ही दिखाई देता है, जिसमें साधुओं के प्रति ईर्ष्या की जाती है, जिसमें दूसरों की पर्याप्त निन्दा
की जाती है, वह कर्म तामस है। अब तीन गुण और निर्गुण इन चार प्रकारों का लक्षण श्रीकृष्ण आगे के श्लोक
में स्वयं बताते हैं।
कैवल्यं सात्विक ज्ञानं रजो वैकल्पिकं च यत्।
प्राकृतं तामसं ज्ञानं मन्निष्ठं निर्गुणस्मृतम् ॥ २४॥
देह में रहते हुए हम देह से भिन्न हैं, समस्त प्राणिमात्र में भगवान परमात्मा के रूप में अंतर्बाह्य व्याप्त है,
यह ज्ञान सचमुच सात्विक है। भिन्न जाति, भिन्न आकार, भिन्न नाम, भिन्न क्रिया इन सबमें ब्रह्म को अभिन्न
स्वरूप समझना, यह ज्ञान सचमुच ही सात्विक है। वेदशास्त्र पठन कर, आत्मज्ञान का विचार करते समय जो
विकल्प के कारण सन्देह करता है, उसके वे विकल्प पूरी तरह राजस हैं। वार्तिक का अध्ययन करने पर भी
जिसके चित्त में अद्वैत का निश्चय नहीं हो पाता, अपने ही तर्क से उसमें विकल्प खोजता है, यह उसका ज्ञान
राजस है। वेदशास्त्र श्रवण करने पर भी जो शिश्नोदर परायण होता है, इन्द्रियों की संतुष्टि के प्रति ही जिसकी
चाह रहती है, वह पूर्णरूप से राजस है। मन का कोई निश्चय न हो और अनेक विकल्प उत्पन्न होते हों, यह
रजोगुण की ज्ञानवृत्ति है। अब तमोगुण के बारे में सुनो। ज्ञान की जितनी भी स्फूर्ति होती है उसे महामोह ग्रस
लेता है। मैं जड़-अंध हूँ यही सच मानता है। क्षणभंगुर पदार्थों पर आसक्ति धरता है। उसका वह ज्ञान सचमुच
ही तामस है। आहार, निद्रा, भय और मैथुन यही पशुतुल्य ज्ञान सचमुच तामस है, इसे ध्यान में रखो। अब निर्गुण
के बारे में सुनो। उद्धव! कार्य, कर्त्ता और कारण यह त्रिकुटी तीन गुणों को शून्य कर चैतन्यस्वरूप में रहती है,
वह निर्गुण ज्ञान है। सत्व के उल्हास से सर्वेन्द्रियों में जो ज्ञान प्रकट होता है, उसे वह व्यर्थ समझता है क्योंकि
वह कहता है कि ज्ञानरूप में मैं अनादि हूँ। समुद्र के पानी से ही नदियाँ बहती हैं। वे नदियाँ समुद्र में आकर
मिलती हैं, लेकिन इससे समुद्र इतराता नहीं है। उसी प्रकार ज्ञान की स्फूर्ति होने से उसे उसका महत्त्व नहीं
मालूम होता। रजोगुण के कारण यदि उसके मन में कोई इच्छा उत्पन्न हो तो भी वह उसे क्षुब्ध नहीं कर सकती।
वह कहता है कि मेरे कारण ही काम्य कर्म चलता है, किन्तु अन्त में मैं स्वयं निष्काम ही हूँ। जिस प्रकार सूर्य
को ग्रीष्म ऋतु की बाधा नहीं होती उसी प्रकार काम्य कर्म का विधि होते समय उस कर्म में मेरा सम्बन्ध नहीं
होता। किन्तु मेरे ही कारण काम सवेग और सोज्वल होता है। तमोगुण बढ़ने पर महामोह का घेरा जकड़ लेता
है। लेकिन उस मोह की परवाह न कर वह मोह का सच्चा स्वरूप अच्छी तरह जानता रहता है। जहाँ सूर्य नहीं
दिखायी देता, वहाँ अन्धकार छा जाता है, उसी प्रकार स्वरूप निष्ठा के कारण मोह का संकट कभी बाधक नहीं
होता। तीनों गुण भले ही शरीर पर क्यों न गिर पड़ें लेकिन वह अपना सन्तुलन नहीं खोता। उद्धव! वही सचमुच
निर्गुण की आत्मनिष्ठा है, इसे ध्यान में रखो। अज्ञान के प्रसंग में जो ज्ञान की इच्छा नहीं करता, अथवा विषयों में
प्रवृत्त होकर निष्कामता की इच्छा नहीं करता अथवा मोह की झड़ी लगने पर भी जिसके ज्ञान में कोई परिवर्तन
नहीं होता, ऐसा मेरा भक्त मेरी श्रद्धा के कारण त्रिगुण में ही निर्गुणत्व से रहता है। तीन गुणों का तीन प्रकार से
रहना और निर्गुणत्व से रहना, इसके सम्बन्ध में भी श्रीकृष्ण स्पष्टीकरण करते हैं।

पच्चीसवाँ अध्याय ६८७
वनं तु सात्त्विको वासो ग्रामो राजस उच्यते।
तामसं द्यूतसदनं मन्निकेतं तु निर्गुणम्॥ २५॥
पवित्र तीर्थस्थल, एकान्त निर्जन वन, ऐसे स्थानों में रहने में जिसका मन प्रफुल्लित होता है, उसका वह
रहना वास्तव में सात्विक है। सार्वजनिक व्यवहार अथवा व्यापार में स्थल में निवास करना अथवा सम्मानपूर्वक
राजदरबार में रहना, अथवा विवाह-मण्डप में विचरना जिसे अच्छा लगता है, जिस धन, सम्पत्ति, चारों ओर
युवतियों का समूह जिसे अच्छा लगता है, जो सदा बड़े-बड़े शहरों और गाँवों में रहता है, उसका वह रहना
राजस है। जहाँ मन सम्मान की इच्छा करता है, जो मन विषयासक्त होकर सदा क्षुब्ध रहता है ऐसे लोग जहाँ
दिखायी पड़ें, समझ लो कि वे राजस हैं। जहाँ साधु की निंदा होती है, जहाँ सदा दूसरों के गुणदोष देखने की
प्रवृत्ति रहती है, ऐसे स्थान पर रहना जिसे अच्छा लगता है वह स्थान तामस है इसे अच्छी तरह समझना चाहिये।
जहाँ कलह का मूल हो, जहाँ मन अविचार करेगा, जहाँ वेश्या, द्यूत और शराब का अड्डा होगा, वह तामस के
रहने का स्थान है और हे उद्धव! देवालय की मेरी रमणीय मूर्ति को देखकर जिसकी चित्तवृत्ति को आनन्द होता
है, वही निर्गुण की बस्ती है। अभेदभाव के भक्त का जो घर है, वही मुझ निर्गुण का वसतिस्थान है। जहाँ सुख
से चित्तवृत्ति स्थिर होती है, वही वास्तव में निर्गुण की बस्ती है। किन्तु निर्गुण का घरबार है, यह बात ही
बिलकुल व्यर्थ है क्योंकि जहाँ ब्रह्मभावना उत्पन्न होती है, वही निर्गुण की बस्ती है। देखो ! उद्धव ! विषय से दूर
और केवल आनंद में सन्तुष्ट रहने की वृत्ति, वही निर्गुण की बस्ती है। आकार को भूलकर जो निराकार में सुखी
रहता है, वहीं जिसकी वृत्ति पूर्णरूप से स्थिर होती है, फिर वहाँ लोग हों या न हों, उसे निर्गुण की बस्ती समझना
चाहिये। तीन गुणों के संबंधों के कारण कर्त्ता भी तीन प्रकार के होते हैं और निर्गुण लक्षण का कर्त्ता चौथा है।
उन चारों कर्त्ताओं की व्यवस्था बताता हूँ, सुनो।
सात्त्विकःकारकोऽसङ्गी रागान्धो राजसः स्मृतः।
तामसः स्मृतिविभ्रष्टो निर्गुणो मदपाश्रयः॥ २६॥
काँटे से ही काँटा निकाल देने से जिस प्रकार दुःख कम होता है, उसी प्रकार संग से ही संग का नाश
करने से सात्त्विक कर्त्ता अलिप्त हो जाता है। जो सात्विक कर्त्ता होता है वह सद्गुरुचरणों की संगति से, विरक्ति
के योग से सभी संग नष्ट कर देता है और विषयों की संगति में होते हुए भी निःसंग रहता है। मन में
फलाभिलाषा होने के कारण विवेक की दृष्टि अन्धी हो जाती है और इस प्रकार राजस कर्ता फल की आशा में
बँध कर अत्यन्त भयंकर, करोड़ों दुःख भोगता रहता है। विचारज्ञान का पूर्णरूप से विलय हो जाता है; स्मृति वन
में भटकती रहती है; कार्य क्या है और कारण क्या है इसकी याद ही नहीं रहती, ऐसा पुरुष तामस कर्त्ता होता है।
अनन्यभाव से जो श्रीहरि की शरण में जाता है और कर्म का चल केवल नारायण है यह समझ कर जो कर्म का
अभिमान नहीं करता, वही सचमुच निर्गुण कर्त्ता है। इन तीन गुणों की श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती है और
निर्गुण की श्रद्धा शुद्ध होती है। इसी बात को श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्म श्रद्धा तु राजसी।
तामस्यधर्मे या श्रद्धामत्सेवायां तु निर्गुणा॥ २७॥
देह, इंद्रिय, चेतना और प्राण आदि से जो 'मैं पन' का भास होता है, उसका पूरी तरह विचार कर हमारा
'मैं पन' हम स्वयं देखते हैं। वह कहता है, देह जड़-मूढ़ होने के कारण वह देह तो मैं नहीं हूँ; इन्द्रिय एकदेशी

६८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
होने के कारण वह भी मैं नहीं हूँ, प्राण चपल होने के कारण वह भी मैं नहीं हूँ और मन चंचल होने के कारण
वह तो मैं हूँ ही नहीं। चित्त चिन्ता करता है, इसलिये वह भी मैं नहीं हूँ, जिसका धर्म है बोध का होना, तो वह
बुद्धि भी मैं नहीं हूँ, अहं बाधक होने के कारण वह भी मैं नहीं हूँ, तो फिर 'मैं' नाम से जो भी कुछ है, वह
अनादिसिद्ध है। इस प्रकार जो बुद्धि से चतुर रहता है वह 'मैंपन' का सार क्या है, इसका विचार कर सकता है।
यही श्रेष्ठ अध्यात्मश्रद्धा है। सात्विक लोग इसी श्रद्धा को पास में रखते हैं और जो 'मैं' नहीं कहता रहता है, वह
सचमुच वही रहता है; इसलिये मेरे 'मैंपन' के चरण पकड़ने से, चारों ओर मैं ही मैं रह जाता हूँ। यही शुद्ध
अध्यात्म श्रद्धा है। वह सदा सात्विक के पास रहती है। अब हे बुद्धिमते! राजस की श्रद्धा कैसी होती है, वह भी
सुनो। वर्णाश्रम के अनुसार रहने वाला एक मैं हूँ, आश्रमधर्म का आचरण करने वाला एक मैं हूँ, कर्म करने वाला
एक मैं ही हूँ, यही भावना मन में दृढ़ करना और इसी हेतु से कर्म का आडम्बर फैलाना; दर्भ, मृत्तिका आदि
साहित्य बड़ी आस्था से एकत्र करना; शुचिता का महत्त्व इतना अधिक बढ़ाना कि उसके चारों ओर विधि निषेधों
का चक्र सदा घूमता रहता है। दोष दृष्टि के आँगन में गुणदोषों की तो ढेर सारी राशियाँ पड़ी रहती हैं। पवित्रता
के अभिमान के साथ शुचिता के मामले में वह ब्रह्मदेव को भी तुच्छ मानता है। उद्धव! देहाभिमान को कंधे पर
बिठाकर कर्मबाधा को ही सत्य मानना। यही राजस श्रद्धा है, उद्धव! अविचार जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, हाथ से
अकर्म घटता है और अधर्म का लाभ होता है, यह श्रद्धा तामस को अच्छी लगती है। जिसमें स्वैराचार, अपेय का
पान तथा मनचाहा अभक्ष्य भक्षण होता है, अथवा अगम्यागमन की घटना होती है, तो वह सारी श्रद्धा तामसी है।
अधर्म को ही धर्म मानना, यही तामसी श्रद्धा का प्रमुख रहस्य है। अब जो सबसे उत्तम निर्गुण श्रद्धा है, उसके
बारे में सुनो। समस्त प्राणिमात्र में परमेश्वर ही भरा हुआ है, ऐसी श्रद्धा से जो एकनिष्ठा से प्राणिमात्र का ही
निर्गुण है। पत्नी, बच्चे, धन दौलत तथा प्राण भी जो मुझ पर न्योछावर कर देते हैं और एकनिष्ठा से मेरा भजन
करते हैं, वह श्रद्धा सचमुच ही निर्गुण है। चारों पुरुषार्थ छोड़, चारों मुक्तियों को दूर कर जो ऐक्य भाव से मेरा
भजन करते हैं, वह श्रद्धासम्पत्ति निर्गुण है। उद्धव! निष्काम होकर नामस्मरण करना, निर्लोभ वृत्ति से हरिकीर्तन
करना, ऐसी भक्तिभावना से जो मेरा भजन करता है, वही निर्गुण श्रद्धा है। तीन गुणों का आहार भी तीन प्रकार
का है। उसे श्रीकृष्ण बताते हैं और साथ में निर्गुण आहार के बारे में भी बताते हैं जिसका विचार गहन है।
पथ्यं पूतमनायस्तमाहार्यं सात्विकं स्मृतम् ।
राजसं चेन्द्रियप्रेष्ठं तामसं चार्तिदाशुचि ॥ २८ ॥
पवित्र होते हुए भी जो हलका हो, सत्ववृद्धि के लिये उपयुक्त और विशेष प्रयास न कर प्राप्त होने वाला
जो अन्न होता है वही सात्विक आहार है। अल्पाहार का ही नाम है पथ्य। पवित्र का अर्थ है धर्म से सम्पादित
किया हुआ और वह भी विशेष प्रयत्न के बिना मिला हुआ जो अन्न हो वही सात्त्विक आहार है। आम्ल, कतरा
या मधुर, तीखा, तला, मसालेदार, चटपटा या ऊष्ण, बार-बार भुना हुआ, एक रस में दूसरा रस मिलाकर, पन्हा,
कढ़ी या सारण, पापड़ आदि नमकीन सामग्री यह सब राजस आहार है। नाना प्रकार के प्रयास कर, कष्ट सह
कर राजस भोजन करते हैं। अब तामस का भोजन सुनो। खाना खाते समय जो मादक और दुर्गन्धियुक्त हो ऐसा
आहार वह मूर्ख करता है। अमंगल और दुःखदायी ऐसा जो आहार हो उसे तामस ही समझना चाहिये। भगवान्
का जूठा प्रसाद, साधु-सज्जनों की बची हुई पवित्र अन्न, यह निर्गुण का आहार तो प्रसिद्ध ही है। इस प्रकार
श्लो में 'च' अक्षर से ही भगवान ने उच्चार करके बतलाया। हर ग्रास पर 'गोविंद', 'गोविंद' कहने से अन्न शुद्ध
होता है। यही प्रसिद्ध निर्गुण का आहार है। अन्न भी ब्रह्म, मैं भी ब्रह्म और पंगत में उपस्थित रहने वाला भी

पच्चीसवाँ अध्याय ६८९
ब्रह्मस्वरूप ही है। ऐसा जिसका भोजनानुक्रम रहता है, वह भी निर्गुण का ही श्रेष्ठ आहार है। तीन गुणों का सुख
भी तीन प्रकार का होता है और निर्गुण का सुख तो अलौकिक है। उस सुख का प्रकार भी यदुनायक श्रीकृष्ण
बताते हैं।
सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तुराजसम्।
तामसं योहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम्॥२९॥
विषयसुख की स्फूर्ति छोड़कर आत्मसुख से ही चित्तवृत्ति आनन्दित होती है, ऐसी जो आत्मसुख प्राप्ति है
वह सचमुच सात्त्विक है। गंगा में जब बाढ़ आती है तो जिस प्रकार नाले आदि पानी से भर जाते हैं, उसी प्रकार
आत्मसुख का लाभ होते ही उस आनन्द से इन्द्रियाँ भी तृप्त हो जाती हैं। नाना प्रकार के विषयों में रुचि, इन्द्रियों
की धमाचौकड़ी, विषयसुख प्रिय लगना, यह सच्चा राजस सुख है और, हे उद्धव! अत्यन्त निन्दनीय और मद
चढ़ने वाला जो सुख होता है, वही बुद्धि को प्रिय लगना यही तामस सुख की सिद्धि है। हृदय में मेरी मूर्ति प्रकट
होते ही, संसार की इच्छा समाप्त हो जाती है और उसके उपरान्त जिस सुख का लाभ होता है वह सचमुच निर्गुण
सुख है। सारे प्राणिमात्र में जो परमेश्वर रहता है वह मैं ही हूँ, यह तत्त्व जानकर, मेरे ऐक्य से जो सुख प्राप्त होता
है वही निर्गुण का सच्चा आत्मसौख्य है। आत्मस्वरूप के सुख का स्वरूप दिखाई पड़ने पर हम स्वयं भी
सुखस्वरूप हो जाते हैं। पाप और पुण्य झड़ जाने पर ही निर्गुण सुख का दीप हाथ लगता है। स्वयं सर्वांग से
सुखस्वरूप होने पर ही स्वयं उस आनन्द का उपभोग प्राप्त होता है। निर्गुण सुख का मार्ग भक्तों को ही अपने
अंतःकरण में भोगना चाहिये। कल्पांतजल प्रलय में जब पूरी तरह ज्वार आ जाता है तो वह नदी, नाले किसी को
नहीं छोड़ता। उसी प्रकार निर्गुण सुख भी देहेन्द्रियों को नहीं छोड़ता। जिस प्रकार मृगजल में जल नहीं होता,
उसी प्रकार परब्रह्म में प्रपंच का स्पर्श भी नहीं है। वह जो भी सुख भोगता है वही निर्गुण है। जिस सुख की कोई
मर्यादा नहीं होती, सदासर्वकाल सुख से सुखस्वरूप होकर रहा जा सकता है, वह सुख-सम्पदा निर्गुण की ही है।
इस प्रकार श्रीहरि के त्रिगुण और निर्गुण के भेद लक्षण बताये। अब ग्रन्थ के अन्त में उसका उपसंहार करते हैं।
द्रव्यं देशः फलं कालो ज्ञानं कर्म च कारकः।
श्रद्धावस्थाऽऽकृतिनिष्ठा त्रैगुण्यः सर्व एवहि॥ ३०॥
'द्रव्य' शब्द से तीन प्रकार का आहार, 'देश' शब्द से वन और ग्राम के बीच का भेद, 'फल' शब्द से सुख
का बोध, इस प्रकार सत्त्व से सम्बन्धित विभाग हैं। 'काल' शब्द से भगवद्भजन समझना चाहिये। 'कैवल्य
निष्ठा' का अर्थ है ज्ञान। कर्म का अर्थ है, मुझे अर्पण करना और कर्त्ता अलिप्त है, यह ध्यान में रखो। 'श्रद्धा'
का अर्थ अध्यात्मिकी श्रद्धा समझना चाहिये। 'अवस्था' शब्द से जागरणादिक समझना चाहिये। 'आकृति' से
ऊर्ध्व लोक के देवताओं के विलास समझने चाहिये। देह के अंत में जो गुण बढ़ता है, अथवा उद्धव! जिस गुण
से अंतःस्थिति होती है, उसे वास्तव में निष्ठा कहते हैं। इस प्रकार इसके भिन्न-भिन्न अनेक भाग हैं। उनमें से
एक-एक का वर्णन कैसे करूँ? मेरे भक्त के लिये सारा संसार ही त्रिगुणात्मक है। सारा संसार तीन गुणों से भरा
हुआ है। इसमें निर्गुण एक मैं हूँ। यह रहस्य तुम्हें बताने के लिये मैंने गुणों का निरूपण किया।
सर्वे गुणमया भावाः पुरुषाव्यक्तधिष्ठिताः।
दृष्टं श्रुतमनुध्यातं बुद्ध्या वा पुरुषर्षभ ॥ ३१॥
आप जो भी कुछ देखते हैं, सुनते हैं या जिसका चिन्तन करते हैं, वह सब माया के गुणों के कार्य से

६९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
त्रिगुणात्मक हुआ है, ऐसा समझना चाहिये। इन तीन गुणों को निर्मूल करने के लिये प्रकृति का नियंता जो पुरुष
है, वह प्रकृति से भिन्न है। वह सदा सर्वांग से निर्गुण रहकर अपनी सत्ता से ही गुणों को चलाता रहता है। उद्धव!
पुरुष के बिना प्रकृति का जो भी कार्य है, उसे मिथ्या समझना चाहिये। उसे त्रिगुणात्मक कहते हैं, यह याद रखो।
यहाँ नरदेह प्राप्त होते हुए भी जो गुणातीततां नहीं साधते वे लुट गये समझो और उनका स्वार्थ डूब गया। लेकिन
तुम्हारी बुद्धि वैसी नहीं है। तुमने भगवद्भक्ति को अंगीकार किया तभी तुमने गुणातीतता प्राप्त कर ली। उद्धव
हरिभक्तों में श्रेष्ठ था इसलिये श्रीकृष्ण ने अपने मुख से उद्धव से कहा, हे पुरुषश्रेष्ठ! भाग्य से एक तुम ही श्रेष्ठ
हो। इन तीन गुणों के विस्तार से ही संसाररूपी वृक्ष खूब फला-फूला है। उसे छेदने का प्रकार श्रीकृष्ण बताते हैं।
एताः संसृतयः पुंसो गुणकर्मनिबन्धनाः।
येनेमे निर्जिताः सौम्य गुणा जीवेन चित्तजाः।
भक्तियोगेन मन्निष्ठो मद्भावाय प्रपद्यते॥ ३२॥
इसमें सत्त्वादि तीनों गुण, शुद्ध हों अथवा मिश्रित हों, वे पुरुष को गुणकर्मों से बद्ध कर संसारी बनाते हैं।
घट का पानी जिस प्रकार सूर्य बिम्ब उसमें अटका हुआ दिखाता है, उसी प्रकार इन तीन गुणकर्मों के कारण जीव
को दृढ़ बन्धन प्राप्त हुआ है। गागर में मटमैला पानी भरा हुआ हो तो बिम्ब भी मटमैला ही दिखायी देता है,
अथवा यदि पानी हिल रहा हो तो बिम्ब भी हिलता हुआ-सा दिखायी देता है। उसी प्रकार तीन गुणों का जो
कर्माचरण है, वही शुद्ध ब्रह्म में जीवत्व लाता है। जीव का वह बन्धन तोड़ने के लिये भगवद्भजन साधना
चाहिये। गुणों के बंधन को जीतने के लिये सद्गुरु की शरण में जाएँ। मेरी ही भावना से सद्गुरु का भजन करने
से अत्यन्त शुद्ध सत्त्वगुण की वृद्धि होती है। पैर में लोहे की बेड़ी पड़ी हो तो जिस प्रकार लुहार उसे लोहे से ही
काटकर निकाल देता है, उसी प्रकार सत्त्वगुण की वृद्धि होने पर गुरुराज ही तीनों गुणों को तोड़ डालता है।
इसलिये यदि गुणातीत होना हो तो गुरुभक्ति अवश्य करें। गुरुभजन पर जो विश्वास करते हैं, चारों मुक्तियाँ उनकी
दासी बन जाती हैं। गुरु चरणों में जिसकी भगवद्भावना रहती है, उसकी सेवा में ब्रह्मभावना भी तत्पर रहती है
और हाँ! ब्रह्मभावना के साथ मैं देवाधिदेव भी अंतर्बाह्य उसकी बाट जोहता खड़ा रहता हूँ। जो अनन्यभाव से गुरु
की शरण में जाता है, तो वह सहज ही ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। गुरुरूप से मेरा भजन करने से मेरे भक्त को
ब्रह्मसुख प्राप्त होता है। उद्धव! मेरा भजन तुम अच्छी तरह जानते ही हो यह कहकर श्रीकृष्ण ने उसे 'सौम्य' इस
नाम से सम्बोधित किया। अत्यन्त भाग्य से मनुष्यदेह प्राप्त होने पर, आस्थापूर्वक मेरा भजन करना चाहिये।
तस्माद् देहमिमं लब्ध्वा ज्ञानविज्ञानसन्त्वम्।
गुणसङ्गं विनिर्धूय मां भजन्तु विचक्षणाः ॥ ३३ ॥
जिस मनुष्य देह को प्राप्त करने के लिये देवता भी मन से उत्कंठित रहते हैं, वह प्राप्त होने पर अखण्ड
ज्ञान सम्पादन करना चाहिये। नरदेह प्राप्त हो गया इसलिये ब्रह्मज्ञान अपने आप ही नहीं प्राप्त हो जाता। इसलिये
देहाभिमान छोड़कर मेरा ही भजन करना चाहिये। मेरा अनन्यभाव से भजन करने से सत्त्वगुण सहज ही बढ़ जाता
है। उस सत्त्वगुण से ही विवेकयुक्त ज्ञान उत्पन्न होता है। विवेकज्ञान से युक्त वृत्ति हो जाने पर रज और तम ये
दोनों अपने आप ही झड़ जाते हैं। शुद्ध सत्त्व की स्थिति में अभेदशक्ति बड़े उल्हास के साथ बढ़ती है। मेरा
अभेद भजन करने से आत्मानंद का आस्वाद प्राप्त होता है और इसी को विज्ञान कहते हैं। वहाँ तीनों ही गुण
मिथ्या है, ऐसा निश्चय होता है। नरदेह प्राप्त होने पर प्राणी को इतना लाभ होता है। इसलिये मनुष्य देह प्राप्त

पच्चीसवाँ अध्याय ६९१
होने पर सबको भक्ति अवश्य करनी चाहिये। भागवत का यही अत्यन्त गुप्त ज्ञान है। वह मुख्यरूप से भक्तिप्रधान
है। भक्तिभाव से मेरा भजन करने से स्त्रियों तथा शूद्रों का भी उद्धार होता है। इसलिये नरदेह प्राप्त होने पर ज्ञाता
लोग मेरी ही भक्ति करते हैं और मेरे भजन से ही गुणों को जीत कर स्वयं परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। पूर्ण
ब्रह्म की प्राप्ति के लिये मेरी निरपेक्ष भक्ति करें। भजन का वही प्रकार श्रीकृष्ण बार-बार लोकार्थ से दृढ़ कर
दिखलाते हैं।
निःसङ्गो मां भजेद् विद्वानप्रमत्तो जितेन्द्रियः।
रजस्तमश्चाभिजयेत् सत्वसंसेवया मुनिः॥ ३४ ॥
विषयों के प्रति विरक्ति रखें और अन्तःकरण में मुक्ति की इच्छा न रखें। इस प्रकार मेरी निरपेक्ष भक्ति
अधिक से अधिक प्रेमपूर्वक करें। इससे अपार प्रेमशुद्धि होती है और समस्त प्राणिमात्र के प्रति भगवद्भक्ति
बढ़ती जाती है। साधकों के लिये ही भजनसिद्धि है। इस प्रकार मेरा भजन करने से विस्मरण की ही मृत्यु हो
जाती है, और सभी इन्द्रियों में सजगता आ जाती है। उस समय रज और तम ये दोनों गुण पूरी तरह नष्ट हो जाते
हैं और उस योग से शुद्ध सत्व की स्फूर्ति से साधकों को पूर्ण आत्मानंद प्राप्त होता है। जब केवल शुद्ध सत्वगुण
शेष रहता है तो साधक को ऐसा स्फुरण होने लगता है कि संसार में एक मैं ही पावन और धन्य हूँ। मुझे शुद्ध
आत्मज्ञान प्राप्त हो गया, मुझमें परमानंद प्रकट हो गया यह सुख सत्व का बोध होने वाले सात्त्विकों को होता है।
लेकिन ऐसा जो सत्वगुण शेष रहता है

६९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
को मरण आता ही नहीं है। इतने पर भी प्रारब्ध से आयु शेष होने पर उसे देहाभिमान की बाधा नहीं होती। वह
बाहर के दृश्य पदार्थ नहीं देखता। उसके अंतःकरण में विषय का स्फुरण नहीं होता, और वह देह का देहपन भी
नहीं देखता। यही जीवन्मुक्ति का लक्षण है। बाहर दृश्य सुख का अनुभव लेना और हृदय में विषयों की आसक्ति
रखना, यही है अज्ञान की स्थिति। यह अविद्या की शक्ति है तथा बाधक है। अविद्या का यह बन्धन तोड़ने के
लिये मेरा भजन करना चाहिये। इसीलिये साधु संतों ने भक्ति पर प्राण न्योछावर किये रहते हैं। मेरी भक्ति से
उत्तम कोई गति नहीं है और वह भजन अभेदभाव से करने पर चारों मुक्तियाँ दासी बन जाती हैं। हृदय में विषय
के प्रति विरक्ति हो और तिस पर अभेद भाव से मेरी भक्ति हो और वह भजन अनन्य भाव से किया हुआ हो तो
मैं श्रीकृष्ण उसका आज्ञाधारी हूँ। भक्ति शब्द का अर्थ इतना ही है कि मेरे स्वरूप पर अभेद भाव से श्रद्धा रखना।
इसी योग से परमार्थ का लाभ होता है। शास्त्रों की सफलता यही है। मेरे प्रति भक्ति के कारण मैं जब पशु-
पक्षियों का उद्धार करता हूँ तो मनुष्य यदि भक्तिभाव से मेरा भजन करते हैं तो उन्हें निजधाम तक पहुँचाना मेरा
काम है। इसलिये विद्वत्ता को एक ओर रखकर सभी को श्रद्धापूर्वक भगवद्भक्ति करनी चाहिये, जिससे अनायास
ही आत्मस्वरूप को लाभ होगा। श्रद्धापूर्वक मेरा भजन करने से अपने आप ही तीनों गुणों का नाश होता है और
हमारा निर्गुणत्व स्वयमेव प्रकट हो आता है। श्रीकृष्ण ने ही यह तथ्य समझने के लिये कहा। जहाँ गुणों की
उलझन समाप्त होती है, वहाँ आत्मशान्ति प्रकट होती है। इसी बात का निरूपण श्रीकृष्ण ने इस अध्याय में उद्धव
से किया। जहाँ भक्ति होती है, वहाँ वृत्ति को गुणों पर विजय प्राप्त होती है और सहज आत्मशांति प्राप्त हो,
स्वयंसिद्ध आत्मस्वरूप प्राप्त होता है। वही आत्मभक्ति मेरी माँ है। जिस जनार्दन ने मुझे उस भक्ति तक पहुँचाया,
उस जनार्दन के चरणों के पास एकनाथ तल्लीन होकर भजन कर रहा है। अगले अध्याय में ऐल-उर्वशी
उपाख्यान की कथा नितांत मनोहारी है। उस अध्याय का पठन करने से अगम्यागमन के दोष भी समाप्त हो जाते
हैं। उसमें पुरूरवा की जिस विरक्ति का वर्णन श्रीकृष्ण अपने मुख से करेंगे उस विरक्ति के योग से निजात्म प्राप्ति
होती है। केवल भाग्यशाली लोग ही उस वैराग्य को प्राप्त कर सकते हैं। उस वैराग्य का निरूपण श्रीकृष्ण ने
अत्यन्त रसीले ढंग से किया है। अतः श्रोतागण कृपया ध्यान देकर कथा सुनें। उस कथा पर ध्यान देने से
महापातक जैसे दोष भी जल जाते हैं, ब्रह्म में ही ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति होती है और मनुष्य ज्ञानस्वरूप में रह
पाता है। उस निरूपण का माधुर्य उत्कृष्ट है। एकनाथ पर जनार्दन की असीम कृपा है। वह उसे परात्पर तीर के
पार पहुँचाएगा। भक्ति-भाव से जनार्दन के चरण पकड़ने से दुःख की बाधा नहीं हो सकती। एकनाथ जनार्दन की
शरण में है। आगे रस से पूर्ण निरूपण है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे एकाकार टीकायां
गुण निर्गुण निरूपण नाम पंचविंशतितमोऽध्यायः ॥ २५ ॥

छब्बीसवाँ अध्याय

हे देव जगन्मोहन ! मोहिनी की मोहकता के प्रमुख कारण ! तुम्हें नमस्कार है। कार्यकारणातीत तथा
ज्ञानस्वरूप, जगद्गुरु जनार्दन की जय हो। संसार पर माया की जो मोहरूपी छाया पड़ती है, उसे तुम
ज्ञानस्वरूप होने के कारण दूर करते हो। संसार में सब कुछ जगद्रूप से जनार्दन ही है। वह दीनों के प्रति
पूर्णरूप से कृपालु है। देवता ही माया स्त्री के रूप में उसके हावभाव और नेत्रकटाक्षों से मोहिनी डाल कर
दीन दुखियों को भुलावे में रखती है। लेकिन स्त्री के मोह जैसे मोहक सारे स्वरूप जनार्दन की कृपा से नष्ट
हो जाते हैं। जहाँ परिपूर्ण वैराग्य की वृद्धि होती है, वहाँ जनार्दन की पूर्ण कृपा समझनी चाहिये। जहाँ वैराग्य
होता है, वहाँ ब्रह्मज्ञान सहज ही होता है। जीव मूलतयः ब्रह्म ही है लेकिन वह माया के गुणों से जीवत्व
पालता है। जिस प्रकार पलंग पर सोया हुआ राजा स्वप्न में स्वयं को भिकारी के रूप में देखता है किन्तु
उसके सेवक उसे राजसिंहासन पर बैठने के लिये जगाते हैं, उसी प्रकार वैराग्य जब त्रिगुणों का नाश करता
है, उस समय जीव स्वयंसिद्ध ही ब्रह्म है। इस प्रकार स्वयंभू ही परब्रह्म प्राप्त होने पर स्त्री और पुरुष यह
ज्ञान मिथ्या हो जाता है और भोग्य और भोक्तापन शेष नहीं रहता। अस्तु ! साधक के पास देवता की माया
स्त्री के रूप में भुलावा देने आती है। उस समय भक्तिपूर्वक गुरुराया का स्मरण करने से उस स्त्री की पीड़ा
समाप्त हो जाती है। सद्गुरु का केवल एक ही नाम बड़े-बड़े दोषों की बाधा को दूर करता है और लौकिक
वैराग्य उत्पन्न करता है, जिससे साधकों को अत्यन्त सुख होता है। सचमुच, हमें अबाध रूप से सुख देने
वाला एक सद्गुरु ही है। उसके चरणों पर मस्तक रखने से साधकों को सुखलाभ होता है। संत वास्तव में
साधकों की सच्ची माता है और शान्ति आत्मसुख की छाया है। जनार्दन के कृपालु चरणों के प्रसाद से यही
कथा यथार्थ रीति से चल रही है। निर्गुण हाथ लगने पर साधक सुखसम्पन्न होते हैं, इसलिये मेरा भजन
करना चाहिये ऐसा श्रीकृष्ण ने पचीसवें अध्याय में कहा था। भक्तिभाव से भगवद्भजन करने से भगवान स्त्री
के रूप में बाधा डालते हैं। उस विघ्न का निवारण करने के लिये मेरा नामस्मरण करना चाहिये। अच्युत नाम
से स्मरण करने से वे अपने प्रभाव से ही कर्माकर्म का नाश करते हैं और समस्त पातकों को भस्म कर
डालते हैं। हरि के नाम में इतना अधिक सामर्थ्य है। नाम से ही मनुष्य निर्मल होता है, नाम से ही चित्त
निर्मल होता है, नाम से ही गुणातीतता प्राप्त होती है और नाम से ही संसारपाश टूटते हैं। नाम से ही, चित्त
आसक्त होने पर संसारभय का प्रवेश नहीं होता। इस प्रकार जहाँ नाम पर विश्वास रहता है, वहाँ भगवान
प्रसन्न है, ऐसा समझना चाहिये। दुष्ट की संगत से यदि विषयासक्त पुरुष विषय में ही पूरी तरह रममाण हो
गया हो, तो उसे पश्चात्ताप होते ही वह आधे क्षण में ही विरक्त हो जाता है। बड़े-बड़े दोषों के लिये सच्चा
पश्चात्ताप यही सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है। अनुताप हुए बिना प्रायश्चित्त करना केवल उपहास है। लोगों के
लिये संसार में पश्चात्ताप जैसा मित्र नहीं है। एक बार पश्चात्ताप हो जाय तो वह समस्त पातकों को भस्म
कर देता है। पश्चात्ताप होते ही वह क्षणार्ध में विरक्त कर छोड़ता है। इसी अर्थ का 'ऐलगीत' श्रीकृष्ण उद्धव
को सुना रहे हैं। यहाँ इस छब्बीसवें अध्याय में जिसका चित्त विषयासक्त से उसे विरक्त होने के लिये यह
'ऐलगीत' की प्रस्तावना है।

६९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीभगवानुवाच
मल्लक्षणमिमं कायं लब्ध्वा मद्धर्म आस्थितः ।
आनंदंपरमात्मानमात्मस्थं समुपैति माम् ॥ १ ॥
ब्रह्म को पूरी तरह जानना यही इस नरदेह का प्रमुख कर्तव्य है। वह यह मानव शरीर तीनों लोकों में पवित्र
है। इस मनुष्य देह को पा कर अधर्म करने से परब्रह्म हाथ नहीं लगता। इसलिये जो परम पावन भागवत धर्म है,
उसका आचरण करना चाहिये। भागवत धर्म के अनुसार भक्ति करने से चित्तवृत्ति निर्मल होती है और जीव ही
ब्रह्म है यह ज्ञान निश्चयपूर्वक मन में अंकित हो जाता है। ब्रह्मस्फूर्ति मन में अंकित होते ही, उससे साधक
परमानन्द में लीन हो जाते हैं। यही मेरी सच्ची प्राप्ति है। मेरी प्राप्ति होने का लक्षण है, प्रत्यक्ष देह में होते हुए भी
विषय का बिलकुल स्मरण न होना। उसी का निरूपण श्रीकृष्ण करते हैं।
गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया ।
गुणेषु मायामात्रेषु दृश्यमानेष्ववस्तुतः ।
वर्तमानोऽपि न पुमान् युज्यतेऽवस्तुभिर्गुणैः ॥ २ ॥
जो मूल अज्ञान की खान है, जो संसार प्रवाह की पंक्ति है, जो तीन गुणों की माँ है, वह अनादि मायारानी
है। अरे देखो! इस मायागुणों के योग से सोलह कलाओं युक्त (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच विषय और
मन को मिलाकर कुल सोलह) वासनात्मक लिंगदेह, वही जीव से चिपक कर बैठ जाता है। जिस लिंगदोह के
कारण ही वह जीव नानाप्रकार के सुख-दुःख भोगता है, स्वर्ग-नरक के भवँरे में फँसता है और मिथ्या जन्म-
मरण के फेरों को सहता है, वह संसार जीव के लिये बाँझ के बच्चे के गृहस्थाश्रम जैसा है। देहाभिमान ने उसे
अपार तथा असीम बढ़ाया है। परन्तु गुरुपदेश के कारण ज्ञान का अनुभव आने पर माया का अभाव होता है,
लिंगदेह मिथ्या लगने लगता है और जीव का जीवत्व भी मिथ्या लगने लगता है। जिस प्रकार सूर्योदय होते ही
अन्धकार के साथ रात्रि समाप्त होती है, उसी प्रकार गुरुपदेश से ज्ञानप्राप्ति होने पर माया का स्वरूप धुँधला पड़ने
लगता है। इस प्रकार गुणों का विकार नष्ट होने पर पुरुष जीवन्मुक्त होता है। जिस प्रकार कुम्हार का पहिया पूर्व
प्राप्त गति से घूमता रहता है, उसी प्रकार पूर्वप्रारब्ध की बची हुई वृत्ति से ज्ञाता भी अपने देह में विचरण करते
रहते हैं। लेकिन इस प्रकार देह में विचरण करते हुए भी उन्हें देह का अभिमान नहीं होता। जिस प्रकार यदि कोई
अपनी छाया को कष्ट दे अथवा उसकी पूजा करे तो किसी को उसमें रुचि नहीं होती, उसी प्रकार ज्ञाता को भी
देह के विचरण में कोई रुचि नहीं होती। वह भले ही देह के ही भाग्य से विषयों में लिप्त हो, लेकिन उसकी
वृत्ति उस विकार के साथ मलिन नहीं होती। उसके लिये विषयों का दर्शन पूर्णतया मिथ्या रहता है। मृगजल पीने
से किसी के हाथ गीले नहीं होते। यदि आकाशकमल के मकरंद और सुवास का सेवन भ्रमर करेगा तभी ज्ञाता के
शरीर को विषय का स्पर्श होगा। अस्तु। मुक्तों की स्थिति अतर्क्य है। किन्तु श्रीकृष्ण मुमुक्षुओं को आत्मप्राप्ति के
लिये उससे सम्बन्धित नियम बता रहे हैं।
सङ्गं न कुर्यादसतां शिश्नोदरतृपां क्वचित् ।
तस्यानुगस्तमस्यन्धे पतत्यन्धानुगान्धवत् ॥ ३ ॥
कामविषय भोग तथा उदरभरण इसी में आसक्त होकर, स्वधर्म का त्याग कर अधर्म में मग्न रहने वाले जो

छब्बीसवाँ अध्याय ६९५
विषयासक्त होते हैं, उन्हें सचमुच असाधु ही समझो। ऐसे जो भी असाधु हों, उनके साथ कभी भी काया, वाचा,
मन के साथ संगत नहीं करनी चाहिये। आवारा मवेशियों के संगत में यदि कोई अच्छी गौ चली जाय तो उस
संगत से उसके गले में जीवनभर के लिये मोटा लक्कड़ पड़ जाता है। इस प्रकार दुर्जनों की क्षणभर की संगत से
भी अनर्थ हो जाता है। मुमुक्षुओं को ऐसे स्थान पर क्षणभर के लिये भी नहीं जाना चाहिये। लोहार की भट्टी से
कोई भी सहज ही झुलस सकता है, उसी प्रकार दुर्जनों की संगत भावुक लोगों को भ्रम में डालती है। गलती से
भी यदि असाधु की संगति हो जाय तो विषयासक्ति बढ़ती है जिससे विवेक स्फूर्ति को नष्ट करने वाले अधर्म की
प्रीति होती है। विवेकवृत्ति का अस्त होते ही ज्ञानस्फूर्ति अन्धी होकर मेघों से व्याप्त अमावस्या की रात्रि की तरह
हो जाती है और अपनी ही गति नहीं दिखायी देती। अन्धा यदि अन्धे का हाथ पकड़ता है तो दोनों ही खड्ग में
गिर जाते हैं, उसी प्रकार अविवेक की स्थिति के कारण विषयांध लोग 'अंधतम' नामक नरक में गिरते हैं।
कुसंगति से नरकवास प्राप्त होता है। उससे छुड़ाने वाला एक पश्चात्ताप ही है। उस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण
'ऐलगीत' सुनाते हैं।
ऐलः सम्राडिमां गाथामगायत् वृहच्छ्रवाः।
उर्वशीविरहान्मुह्यन् निर्विण्णः शोकसंयमे ॥ ४॥
समुद्र से घिरी हुई पृथ्वी का पालन करने वाला, सभी राजाओं का मुकुटमणि चक्रवर्ती राजा पुरुरवा की
कीर्ति पुराणों में प्रसिद्ध है। तेज, प्रभाव, महाशौर्य, उचित दातृत्व, गांभीर्य, मस्ती, पराक्रम तथा धार्मिक धैर्य आदि
गुणों से राजा पुरूरवा पूरी तरह युक्त था। राजधर्म की नीति के अनुसार वह स्वधर्म से पृथ्वी का पालन करता
था। ब्राह्मण जितना था उतना ही ब्रह्म की मूर्ति था। चाहे प्राण चला जाय लेकिन वह ब्राह्मण की निन्दा नहीं
करता था। गौ के लिये तो प्राण देने के लिये भी तत्पर था। दीनों का रखवाला था। पुरुरवा का दूसरा नाम 'ऐल'
था। ऐसा वह धार्मिक चक्रवर्ती राजा उर्वशी के फेर में अपनी स्थिति भूल गया। उस समय उसने पश्चात्तापपूर्वक
गीत गाया, उसके बारे में तुम्हें सुनाता हूँ। लेकिन उसकी पूर्व कथा तथा कामासक्तता के बारे में सुनो। वह अपना
बड़प्पन भूलकर, लंपट होकर वेश्या के आगे दीन बन गया। काम मनुष्य को किस प्रकार पागल बना देता है यह
श्रीकृष्ण ऐला के इतिहास से बताते हैं। ऐल (अर्थात् इला से बुध को हुआ पुत्र) पुरुरवा राजा उर्वशी के प्रति
कितना लंपट था और उसे किस प्रकार पश्चात्ताप होकर विरक्ति हुई, यह कथा वेदों में भी बतायी गयी है। उर्वशी
और पुरुरवा का सम्बन्ध नौवें स्कन्ध में विस्तार से आया है। इसे ध्यान में रखकर श्रीकृष्ण ने वह कथा विस्तार
से नहीं बतायी। उर्वशी, को स्वर्ग के भूषण स्वरूप नारायण ने स्वयं स्वर्ग में भेजा था; लेकिन वहाँ वह स्वयं को
श्रेष्ठ समझ कर अहंकार से फूल गयी। उसी अहंकार में शान से नृत्य करते समय ताल पर पैर गलत पड़ गया
और ब्रह्मदेव ने उसे शाप दिया कि तुम मृत्युलोक में जाओगी और मनुष्य तुम्हारा उपभोग करेंगे। इस पर उसने
उःशाप माँगा। इस पर ब्रह्मदेव ने कहा कि यदि तुम पुरुरवा को नग्न देख लो तो तुम स्वर्ग में आ सकोगी। ऐसा
शाप प्राप्त कर उर्वशी मृत्युलोक में आयी। उसका स्वरूप देखकर राजा पुरुरवा उस पर लट्टू हो गया। अपनी
महानता भूलकर वह उस वेश्या के वश में हो गया। उसके रूप पर वह इतना पागल हो गया कि उसे विचार
करने तक का भान नहीं हुआ। राजा को नग्न स्थिति में देखने के बाद, उर्वशी उसे छोड़कर चली जाय यह करार
मानकर राजा उसे अपने उपभोग के लिये ले आया। वह अपने शाम के परिहार के लिये अपने साथ दो भेड़ ले
आयी थी। उनका पुत्रवत पालन किया जाय इस सम्बन्ध में उसने राजा को कसम दिलाई थी। इस प्रकार उर्वशी

६९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
से भेंट होते ही राजा की कामेच्छा भी प्रबल हो गयी। उसके साथ विलास करने में कब सुबह हुई और कब रात
हुई, कुछ समझ में नहीं आया। इसी प्रकार कई दिन बीत गये। उर्वशी के साथ विलास कर्म करने में वह अपना
स्वधर्म कर्म भी भूल गया। उसके नियम-संयम टूटते चले गये, विलासभोग की अति हो गयी। भेड़ों के रूप में
उर्वशी के साथ आये वे दोनों अश्विनीकुमार थे। इन्द्र ने उर्वशी का भोगक्षय करने के लिये उन्हें उसके साथ भेजा
था। पुरुरवा के भोग के अन्त में उर्वशी को स्वर्ग में ले जाने के लिये चोर उन भेड़ों को रात में चुरा ले गये, तब
वे 'ब्याँ', 'ब्याँ' कहकर चिल्लाने लगे। भेड़ों की आवाज सुनकर उर्वशी दुःख से व्याकुल हो उठी और राजा की
भर्त्सना करती हुई बोली, "तुम नपुंसक हो। व्यर्थ ही पुरुषार्थ की शेखी बघारते हो। मेरे बच्चों को चोर उठा कर
ले गये, तुम्हारे काले मुँह में आज लगे।" विलाप करते हुए वह अपना सिर पीटने लगी। उर्वशी का वह शोक
देखकर पुरुरवा ने तत्काल शस्त्र उठाया और चोरों का पीछा करने लगा। दौड़ने में उसका पीताम्बर खुल गया।
उसे उसका भान नहीं रहा। उसने भेड़ों को चोरों से मुक्त कर उन्हें उर्वशी के सामने खड़ा कर दिया। इतने में
बड़े जोर से आकाश में बिजली चमकी और राजा का नग्न शरीर चमक उठा। राजा को नग्न देखते ही उर्वशी
अपनी शर्त के अनुसार स्वर्ग चली गयी और उसके शोक में राजा व्याकुल हो उठा।
त्यक्त्वाऽऽत्मानं व्रजन्तींतांनग्नउन्मत्तवन्नृपः।
विलपन्नन्वगाज्जाये घोरे तिष्ठेति विह्वलः ॥५॥
पृथ्वी का पालन करने में वरिष्ठ; स्वधर्म में श्रेष्ठ धार्मिक, शत्रु का संहार करने में वीर तथा पराक्रम में
महावीर; वेदशास्त्र विवेक जानने वाला, जिसका सभी लोग वन्दन करते हैं, ऐसा व्यक्ति एक वेश्या का दास बन
गया? देवदानवों के सामने भी जिसकी गर्दन नहीं झुकती, जो जरा-सा भी अपमान सहन नहीं कर सकता, वह
अपनी श्रेष्ठता भूलकर एक वेश्या के आगे दीन बन गया? उर्वशी को जाते देख वह वैसा ही नग्न अवस्था में
खड़ा रहा और बेहोश होकर रोते-रोते उसके पीछे लग गया; उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहा था। जरा एक
बार तुम्हें देख तो लूँ; प्रेम की दो-चार बातें कर लूँ, तुम आँखों से दूर चली जाती हो तो प्राण निकलने लगते हैं।
अपने पूर्वजों की कसम खाकर कहता हूँ कि तुम्हारे वचन का कभी उल्लंघन नहीं करूँगा, मेरी बात को सच
मानो, तुम्हें मुझ से नाराज होने का कारण ही क्या है? चलते समय तुम्हारे पैरों में कंकड़-पत्थर लगेंगे, तुम कहाँ
जा रही हो? मैं भी आता हूँ, तुम्हारे साथ। एक बार मेरी ओर मुड़कर तो देख लो। कह कर वह उसके पैर
पकड़ने लगा। वह उसकी ओर बिना देखे चली गयी। जिसे बड़े-बड़े राजा साष्टांग दण्डवत किया करते थे, वह
राजाधिराज एक वेश्या के पैर पकड़ रहा है? काम की करनी कितनी अद्भुत है। उसने कहा, तुम्हारे लिये मेरा
चित्त व्याकुल हो रहा है, तुम इतनी पाषाण हृदया कैसे हो गयी हो? मुझ पर इतना गुस्सा भला क्यों करती हो?
इस प्रकार राजा का चित्त अत्यन्त विरहातुर और शोक से भर गया। वह अत्यन्त ग्लानियुक्त हो गया। श्रीकृष्ण
उसकी ग्लानि का वर्णन कर रहे हैं।
कामान्तृप्तोऽनुजुषन् क्षुल्लकान् वर्षयामिनीः।
न वेद यान्तीर्नायान्तीरुर्वश्याकृष्टचेतनः ॥६॥
उर्वशी का कामभोग में राजा का चित्त बिलकुल तल्लीन हो गया था। सूर्य कब उदित होता है और कब
अस्त होता है इसका भी उसे पता नहीं चलता था। मदन ने उसे इतना पागल कर दिया था। एक बार भोग की हुई
स्त्री को प्रतिदिन भोगते रहने से उसके प्रति प्रेम बढ़ जाता है। उसी प्रकार उसकी अवस्था हुई और वह उसका

छब्बीसवाँ अध्याय ६९७
आसक्त हो गया। उर्वशी का भोग करते कितने दिन, मास और वर्ष बीत गये कुछ पता ही नहीं चला। जीवन का
नाश हुआ इसका भी स्मरण नहीं रहा। अग्नि में घृत पड़ने पर उसकी ज्वालायें अधिकाधिक तीव्र हो जाती हैं,
उसी प्रकार स्त्री का बार-बार भोग करने से काम भी बढ़ जाता है। स्त्री विषय का विचार करने पर वह अत्यन्त
तुच्छ मालूम होता है किन्तु रात-दिन भोग करते हुए भी राजा के मन में वैराग्य नहीं उत्पन्न हुआ। उर्वशी में
उसके प्राण बसे हुए थे इसलिये उसने उससे करुणा की गुहार की। लेकिन राजा की ओर मुड़कर देखे बिना ही
वह तेजी से चली गयी। जब उर्वशी सामने नहीं दिखायी दी तो राजा विरह शोक से मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।
फिर उठकर इधर-उधर देखने लगा। जोर-जोर से रोते हुए उसने ताण्डव मचा दिया। इस प्रकार दसों दिशाओं में
भटकते हुए वह एकाएक कुरुक्षेत्र आ गया। वहाँ अन्तरिक्ष में बैठी हुई उर्वशी उसे दिखायी दी। उसे देखते ही
वह चिल्लाया, "दौड़ो उर्वशी ! मुझे अपने आलिंगन में ले लो।" तब वह बोली, हे विषयांध ! यह सारी मूर्खता
अब त्याग दो; भूपते, हम स्त्रियों की आसक्ति कभी अच्छी नहीं होती। हे महाराज ! स्त्रियाँ स्वभाव से ही दुष्ट
होती हैं। विशेष रूप से वेश्याएँ तो स्वच्छंद होती हैं। अपने मन के अनुसार व्यवहार करती हैं, और परपुरुष से
स्वेच्छा से संग करती हैं; इसलिये हे राजा ! तुम मन में हमारा कभी भी विश्वास न करना। हे राजा! हम स्त्रियों
की संगत से आज तक कितने लोग फँसे हैं इसका कोई पता नहीं है; तुम अब हमारी आसक्ति छोड़कर परमार्थ
मार्ग का अनुसरण करो। इतने दिन तक तुमने मेरा भोग किया लेकिन तुम्हें अभी वैराग्य प्राप्त नहीं हुआ। इसलिये
अब तुम कामासक्ति समूल छोड़ दो और अपने सच्चे स्वार्थ की साधना में लग जाओ। लेकिन उसका वह भाषण
उसे अच्छा नहीं लगा। वह पुनः उसके पैर पकड़ कर उसकी प्रार्थना करने लगा। कहने लगा, "तुम कुछ भी
करो लेकिन एक बार अपना अंग संग दो। हे सुन्दरी ! एक बार तुम अपना सुख संभोग दो।" उसकी वह ग्लानि
देखकर उर्वशी का मन पसीज उठा। वह राजा को अपना पूर्व वृत्तांत सुनाने लगी। मैं अत्यन्त सुन्दर स्वर्गांगना हूँ,
मुझे ब्रह्मदेव ने शाप दिया था; किन्तु तुम अत्यन्त पुण्यवान राजा होने के कारण तुम्हारी संगति से मैं उस पाप से
मुक्त हो गयी। तुम्हारी संगत से मैं निष्पाप हुई, मेरे शाप का निवारण हो गया। अब तुम्हारा और मेरा संग इस
लोक में असम्भव है। मैं अब स्वर्ग जा रही हूँ। उर्वशी का यह भाषण सुनकर राजा उसके विरह में रोने लगा।
उर्वशी का मन व्याकुल हो उठा और उसने उसे एक अच्छा उपाय बतलाया। पहले उसने गन्धर्व की प्रार्थना कर
एक अग्निपात्र प्राप्त किया और उसे राजा को देकर बोली, इस अग्निपात्र पर यज्ञ करो, जिससे तुम्हें मेरी प्राप्ति
होगी। उर्वशी के वियोग में व्याकुल होने के कारण राजा अग्निपात्र वहीं छोड़कर अपने मन्दिर में चला आया।
उस समय अत्यन्त शोक से व्याप्त होने के कारण वह अत्यन्त दुःखी हो गया था। उसके मन में उर्वशी का दुःख
था इसलिये वह उसे स्वप्न में दिखायी दी। वह जागृत होकर तत्काल अग्निपात्र देखने पहुँचा। तो उसे वहाँ
अश्वत्थ के वृक्ष पर शमी का पेड़ दिखाई दिया। उसने उस अश्वत्थ की ही अरणी तैयार की और यज्ञ के लिये
पवित्र अग्नि तैयार किया और विधिपूर्वक यज्ञ कर कामसुखभोगेच्छा के कारण वह उर्वशी के लोक में पहुँचा।
उस उर्वशी से विलास करते-करते राजा को विरक्ति हुई और उसने क्या कहा, तुम्हें बताता हूँ। वह निरूपण राजा
ने अठारह श्लोकों में किया है। उसमें के आठ श्लोकों में उसका सच्चा पश्चात्ताप है। वही श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
ऐल उवाच
अहो मे मोहविस्तारः कामकश्मलचेतसः ।
देव्या गृहीतकण्ठस्य नायुःखण्डाइमेस्मृताः ॥ ७॥