श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 703, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंपच्चीसवाँ अध्याय ६८७
वनं तु सात्त्विको वासो ग्रामो राजस उच्यते।
तामसं द्यूतसदनं मन्निकेतं तु निर्गुणम्॥ २५॥
पवित्र तीर्थस्थल, एकान्त निर्जन वन, ऐसे स्थानों में रहने में जिसका मन प्रफुल्लित होता है, उसका वह
रहना वास्तव में सात्विक है। सार्वजनिक व्यवहार अथवा व्यापार में स्थल में निवास करना अथवा सम्मानपूर्वक
राजदरबार में रहना, अथवा विवाह-मण्डप में विचरना जिसे अच्छा लगता है, जिस धन, सम्पत्ति, चारों ओर
युवतियों का समूह जिसे अच्छा लगता है, जो सदा बड़े-बड़े शहरों और गाँवों में रहता है, उसका वह रहना
राजस है। जहाँ मन सम्मान की इच्छा करता है, जो मन विषयासक्त होकर सदा क्षुब्ध रहता है ऐसे लोग जहाँ
दिखायी पड़ें, समझ लो कि वे राजस हैं। जहाँ साधु की निंदा होती है, जहाँ सदा दूसरों के गुणदोष देखने की
प्रवृत्ति रहती है, ऐसे स्थान पर रहना जिसे अच्छा लगता है वह स्थान तामस है इसे अच्छी तरह समझना चाहिये।
जहाँ कलह का मूल हो, जहाँ मन अविचार करेगा, जहाँ वेश्या, द्यूत और शराब का अड्डा होगा, वह तामस के
रहने का स्थान है और हे उद्धव! देवालय की मेरी रमणीय मूर्ति को देखकर जिसकी चित्तवृत्ति को आनन्द होता
है, वही निर्गुण की बस्ती है। अभेदभाव के भक्त का जो घर है, वही मुझ निर्गुण का वसतिस्थान है। जहाँ सुख
से चित्तवृत्ति स्थिर होती है, वही वास्तव में निर्गुण की बस्ती है। किन्तु निर्गुण का घरबार है, यह बात ही
बिलकुल व्यर्थ है क्योंकि जहाँ ब्रह्मभावना उत्पन्न होती है, वही निर्गुण की बस्ती है। देखो ! उद्धव ! विषय से दूर
और केवल आनंद में सन्तुष्ट रहने की वृत्ति, वही निर्गुण की बस्ती है। आकार को भूलकर जो निराकार में सुखी
रहता है, वहीं जिसकी वृत्ति पूर्णरूप से स्थिर होती है, फिर वहाँ लोग हों या न हों, उसे निर्गुण की बस्ती समझना
चाहिये। तीन गुणों के संबंधों के कारण कर्त्ता भी तीन प्रकार के होते हैं और निर्गुण लक्षण का कर्त्ता चौथा है।
उन चारों कर्त्ताओं की व्यवस्था बताता हूँ, सुनो।
सात्त्विकःकारकोऽसङ्गी रागान्धो राजसः स्मृतः।
तामसः स्मृतिविभ्रष्टो निर्गुणो मदपाश्रयः॥ २६॥
काँटे से ही काँटा निकाल देने से जिस प्रकार दुःख कम होता है, उसी प्रकार संग से ही संग का नाश
करने से सात्त्विक कर्त्ता अलिप्त हो जाता है। जो सात्विक कर्त्ता होता है वह सद्गुरुचरणों की संगति से, विरक्ति
के योग से सभी संग नष्ट कर देता है और विषयों की संगति में होते हुए भी निःसंग रहता है। मन में
फलाभिलाषा होने के कारण विवेक की दृष्टि अन्धी हो जाती है और इस प्रकार राजस कर्ता फल की आशा में
बँध कर अत्यन्त भयंकर, करोड़ों दुःख भोगता रहता है। विचारज्ञान का पूर्णरूप से विलय हो जाता है; स्मृति वन
में भटकती रहती है; कार्य क्या है और कारण क्या है इसकी याद ही नहीं रहती, ऐसा पुरुष तामस कर्त्ता होता है।
अनन्यभाव से जो श्रीहरि की शरण में जाता है और कर्म का चल केवल नारायण है यह समझ कर जो कर्म का
अभिमान नहीं करता, वही सचमुच निर्गुण कर्त्ता है। इन तीन गुणों की श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती है और
निर्गुण की श्रद्धा शुद्ध होती है। इसी बात को श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं।
सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्म श्रद्धा तु राजसी।
तामस्यधर्मे या श्रद्धामत्सेवायां तु निर्गुणा॥ २७॥
देह, इंद्रिय, चेतना और प्राण आदि से जो 'मैं पन' का भास होता है, उसका पूरी तरह विचार कर हमारा
'मैं पन' हम स्वयं देखते हैं। वह कहता है, देह जड़-मूढ़ होने के कारण वह देह तो मैं नहीं हूँ; इन्द्रिय एकदेशी