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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 709, कुल 869 में से

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पृष्ठ 709

छब्बीसवाँ अध्याय

हे देव जगन्मोहन ! मोहिनी की मोहकता के प्रमुख कारण ! तुम्हें नमस्कार है। कार्यकारणातीत तथा
ज्ञानस्वरूप, जगद्गुरु जनार्दन की जय हो। संसार पर माया की जो मोहरूपी छाया पड़ती है, उसे तुम
ज्ञानस्वरूप होने के कारण दूर करते हो। संसार में सब कुछ जगद्रूप से जनार्दन ही है। वह दीनों के प्रति
पूर्णरूप से कृपालु है। देवता ही माया स्त्री के रूप में उसके हावभाव और नेत्रकटाक्षों से मोहिनी डाल कर
दीन दुखियों को भुलावे में रखती है। लेकिन स्त्री के मोह जैसे मोहक सारे स्वरूप जनार्दन की कृपा से नष्ट
हो जाते हैं। जहाँ परिपूर्ण वैराग्य की वृद्धि होती है, वहाँ जनार्दन की पूर्ण कृपा समझनी चाहिये। जहाँ वैराग्य
होता है, वहाँ ब्रह्मज्ञान सहज ही होता है। जीव मूलतयः ब्रह्म ही है लेकिन वह माया के गुणों से जीवत्व
पालता है। जिस प्रकार पलंग पर सोया हुआ राजा स्वप्न में स्वयं को भिकारी के रूप में देखता है किन्तु
उसके सेवक उसे राजसिंहासन पर बैठने के लिये जगाते हैं, उसी प्रकार वैराग्य जब त्रिगुणों का नाश करता
है, उस समय जीव स्वयंसिद्ध ही ब्रह्म है। इस प्रकार स्वयंभू ही परब्रह्म प्राप्त होने पर स्त्री और पुरुष यह
ज्ञान मिथ्या हो जाता है और भोग्य और भोक्तापन शेष नहीं रहता। अस्तु ! साधक के पास देवता की माया
स्त्री के रूप में भुलावा देने आती है। उस समय भक्तिपूर्वक गुरुराया का स्मरण करने से उस स्त्री की पीड़ा
समाप्त हो जाती है। सद्गुरु का केवल एक ही नाम बड़े-बड़े दोषों की बाधा को दूर करता है और लौकिक
वैराग्य उत्पन्न करता है, जिससे साधकों को अत्यन्त सुख होता है। सचमुच, हमें अबाध रूप से सुख देने
वाला एक सद्गुरु ही है। उसके चरणों पर मस्तक रखने से साधकों को सुखलाभ होता है। संत वास्तव में
साधकों की सच्ची माता है और शान्ति आत्मसुख की छाया है। जनार्दन के कृपालु चरणों के प्रसाद से यही
कथा यथार्थ रीति से चल रही है। निर्गुण हाथ लगने पर साधक सुखसम्पन्न होते हैं, इसलिये मेरा भजन
करना चाहिये ऐसा श्रीकृष्ण ने पचीसवें अध्याय में कहा था। भक्तिभाव से भगवद्भजन करने से भगवान स्त्री
के रूप में बाधा डालते हैं। उस विघ्न का निवारण करने के लिये मेरा नामस्मरण करना चाहिये। अच्युत नाम
से स्मरण करने से वे अपने प्रभाव से ही कर्माकर्म का नाश करते हैं और समस्त पातकों को भस्म कर
डालते हैं। हरि के नाम में इतना अधिक सामर्थ्य है। नाम से ही मनुष्य निर्मल होता है, नाम से ही चित्त
निर्मल होता है, नाम से ही गुणातीतता प्राप्त होती है और नाम से ही संसारपाश टूटते हैं। नाम से ही, चित्त
आसक्त होने पर संसारभय का प्रवेश नहीं होता। इस प्रकार जहाँ नाम पर विश्वास रहता है, वहाँ भगवान
प्रसन्न है, ऐसा समझना चाहिये। दुष्ट की संगत से यदि विषयासक्त पुरुष विषय में ही पूरी तरह रममाण हो
गया हो, तो उसे पश्चात्ताप होते ही वह आधे क्षण में ही विरक्त हो जाता है। बड़े-बड़े दोषों के लिये सच्चा
पश्चात्ताप यही सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है। अनुताप हुए बिना प्रायश्चित्त करना केवल उपहास है। लोगों के
लिये संसार में पश्चात्ताप जैसा मित्र नहीं है। एक बार पश्चात्ताप हो जाय तो वह समस्त पातकों को भस्म
कर देता है। पश्चात्ताप होते ही वह क्षणार्ध में विरक्त कर छोड़ता है। इसी अर्थ का 'ऐलगीत' श्रीकृष्ण उद्धव
को सुना रहे हैं। यहाँ इस छब्बीसवें अध्याय में जिसका चित्त विषयासक्त से उसे विरक्त होने के लिये यह
'ऐलगीत' की प्रस्तावना है।