श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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है, वही स्थिति पिण्ड में रहती है। ब्रह्माण्ड के सारे देवता महापुरुष के अवयव हैं। पिण्ड में भी वे सब एक
होकर रहते हैं। स्वधर्मशास्त्र के अनुसार उचित निष्कर्म की ओर जो प्रवृत्ति होती है, ऐसी इन्द्रिय प्रवृत्ति जहाँ
होगी, वही दैवी या सत्वस्थ सम्पत्ति है। मन में दृढ़ कामासक्ति और स्वधर्म के अनुसार आचरण करने की जो
इन्द्रिय प्रवृत्ति रहती है, वह राजस अर्थात् आसुरी सम्पत्ति है। लोभ और मोह के वश में होने के कारण मन में
क्रोध का होना और अधर्म की ओर प्रवृत्ति होना, ऐसी जो इन्द्रियों की स्थिति होगी, वह तामसी और राक्षसी
सम्पत्ति है। क्षण में इच्छारहित होना, ऐसा स्वधर्म जहाँ बढ़ता है उसे वह राक्षसी वृत्ति समझनी चाहिये। वह दैवी
और आसुरी वृत्ति का विनाश करती है। सकाम-निष्काम मोहभ्रम में फँस कर जिसकी वृत्ति व्यवहार करती है,
वहाँ देवता, असुर और राक्षस इन सब में भयंकर झगड़ा चलता रहता है। क्षणभर के लिये परमार्थ मे रुचि,
क्षणभर के लिये द्रव्य की इच्छा, क्षणभर के लिये अनर्थ करने में रुचि, क्षण में पराया धन और परायी स्त्री में
रुचि। ऐसी चित्तवृत्ति में सच्ची शांति कभी नहीं प्राप्त होगी। फिर परमार्थ की प्राप्ति किस ढंग से होगी? साधक
लोग हमेशा पूछते रहते हैं कि चित्तवृत्ति में कौन-सी पीड़ा होती है? उसी पीड़ा की स्थिति तुम्हें स्पष्ट करके
बतलायी। यदि एक ही गुण पूर्ण रूप से स्थिर हो जाय तो एक ही प्रकार की वृत्ति बढ़नी चाहिये, लेकिन वैसा
होता नहीं है। गुण एक-दूसरे का अपमान करते हुए झगड़ते रहते हैं। एक ही गुणावस्था प्राप्त नहीं होती इसलिये
एकविधता नहीं हो पाती और अमर्याद भवपीड़ा की बाधा होती रहती है। तमोगुण अधर्म की ओर बढ़ता रहता है,
रजोगुण देहकर्म में लगता है और सत्त्वगुण की वृद्धि ही नहीं होती। फिर जीव की मुक्ति कैसे हो? रज और तम
इन दोनों के चंगुल में सत्त्व फँसा रहता है। वह बढ़ ही नहीं सकता। उस सत्त्व गुण की बाढ़ केवल आशा को
समूल नष्ट करने से होती है। तीन गुणों की त्रिकुटी हमने अपने अंतःकरण में कल्पना के ही बल पर खड़ी की
रहती है और अंत में वही संसार भय के रूप में बाधक बनकर खड़ी रहती है। सत्त्व के योग से देवताओं को
बल प्राप्त होता है, रजोगुण से दैत्य प्रबल होते हैं और तमोगुण से केवल राक्षसों का जोर बढ़ता है। इन तीन गुणों
की वृत्तियों की व्यवस्था तुम्हें बतायी। अब तीन अवस्थाओं के सम्बन्ध में भी बताऊँगा।
सत्त्वाज्जागरणं विद्याद् रजसा स्वप्नमादिशेत् ।
प्रस्वापं तमसा जन्तोस्तुरीयं त्रिषु संततम् ॥ २० ॥
सत्त्वगुण देह में हो तो जीव को स्वप्न और सुषुप्ति स्पर्श नहीं करती और जीव में जो निरन्तर जागृति रहती
है, उससे इन्द्रिय प्रवृत्ति सचेत रहती हैं। रजोगुण प्रबल होने पर स्वप्न चित्तवृत्ति पर विजय प्राप्त करता है।
जागृति और सुषुप्ति दूर चली जाती हैं और वह राजस पुरुष बैठे-बैठे ही स्वप्न देखने लगता है। तमोगुण जब
बढ़ जाता है तो वह जागृति और स्वप्न इन दोनों को दूर भगाता है और जीव पर गहरी निद्रा का प्रभाव छा जाता
है। उसे सभा में बैठाने पर वह बात करते-करते ही झपकी लेने लगता है। खाना खाते-खाते ही वह गहरी निद्रा
में सो जाता है। हे उद्धव ! क्षण में जागृति, क्षण में सुषुप्ति अर्थात् निद्रा, क्षण में स्वप्न का अनुभव; यह वास्तव में
तीन गुणों की मिश्र वृत्ति है। अब जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं को प्रकट करने वाला जो
आत्मतत्त्व है, उस चौथी अवस्था को ज्ञाता लोग तुर्यावस्था कहते हैं। उद्धव ! जो जागृति को जगाती है, जो स्वप्न
में स्वप्न को परिचालित करती है और जो निद्रा को भी सुलाती है, उस अवस्था को तुरीय अवस्था कहते हैं। जो
तीनों अवस्थाओं में होते हुए भी उनमें भासित नहीं होती, जो निर्गुण होते हुए नित्य रहती है, उस अवस्था को ही
तुरीय कहते हैं। जिस प्रकार पुत्र के जन्म के कारण पुरुष को 'पिता' यह नाम प्राप्त होता है, उसी प्रकार तीनों