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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 706, कुल 869 में से

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पृष्ठ 706

६९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
त्रिगुणात्मक हुआ है, ऐसा समझना चाहिये। इन तीन गुणों को निर्मूल करने के लिये प्रकृति का नियंता जो पुरुष
है, वह प्रकृति से भिन्न है। वह सदा सर्वांग से निर्गुण रहकर अपनी सत्ता से ही गुणों को चलाता रहता है। उद्धव!
पुरुष के बिना प्रकृति का जो भी कार्य है, उसे मिथ्या समझना चाहिये। उसे त्रिगुणात्मक कहते हैं, यह याद रखो।
यहाँ नरदेह प्राप्त होते हुए भी जो गुणातीततां नहीं साधते वे लुट गये समझो और उनका स्वार्थ डूब गया। लेकिन
तुम्हारी बुद्धि वैसी नहीं है। तुमने भगवद्भक्ति को अंगीकार किया तभी तुमने गुणातीतता प्राप्त कर ली। उद्धव
हरिभक्तों में श्रेष्ठ था इसलिये श्रीकृष्ण ने अपने मुख से उद्धव से कहा, हे पुरुषश्रेष्ठ! भाग्य से एक तुम ही श्रेष्ठ
हो। इन तीन गुणों के विस्तार से ही संसाररूपी वृक्ष खूब फला-फूला है। उसे छेदने का प्रकार श्रीकृष्ण बताते हैं।
एताः संसृतयः पुंसो गुणकर्मनिबन्धनाः।
येनेमे निर्जिताः सौम्य गुणा जीवेन चित्तजाः।
भक्तियोगेन मन्निष्ठो मद्भावाय प्रपद्यते॥ ३२॥
इसमें सत्त्वादि तीनों गुण, शुद्ध हों अथवा मिश्रित हों, वे पुरुष को गुणकर्मों से बद्ध कर संसारी बनाते हैं।
घट का पानी जिस प्रकार सूर्य बिम्ब उसमें अटका हुआ दिखाता है, उसी प्रकार इन तीन गुणकर्मों के कारण जीव
को दृढ़ बन्धन प्राप्त हुआ है। गागर में मटमैला पानी भरा हुआ हो तो बिम्ब भी मटमैला ही दिखायी देता है,
अथवा यदि पानी हिल रहा हो तो बिम्ब भी हिलता हुआ-सा दिखायी देता है। उसी प्रकार तीन गुणों का जो
कर्माचरण है, वही शुद्ध ब्रह्म में जीवत्व लाता है। जीव का वह बन्धन तोड़ने के लिये भगवद्भजन साधना
चाहिये। गुणों के बंधन को जीतने के लिये सद्गुरु की शरण में जाएँ। मेरी ही भावना से सद्गुरु का भजन करने
से अत्यन्त शुद्ध सत्त्वगुण की वृद्धि होती है। पैर में लोहे की बेड़ी पड़ी हो तो जिस प्रकार लुहार उसे लोहे से ही
काटकर निकाल देता है, उसी प्रकार सत्त्वगुण की वृद्धि होने पर गुरुराज ही तीनों गुणों को तोड़ डालता है।
इसलिये यदि गुणातीत होना हो तो गुरुभक्ति अवश्य करें। गुरुभजन पर जो विश्वास करते हैं, चारों मुक्तियाँ उनकी
दासी बन जाती हैं। गुरु चरणों में जिसकी भगवद्भावना रहती है, उसकी सेवा में ब्रह्मभावना भी तत्पर रहती है
और हाँ! ब्रह्मभावना के साथ मैं देवाधिदेव भी अंतर्बाह्य उसकी बाट जोहता खड़ा रहता हूँ। जो अनन्यभाव से गुरु
की शरण में जाता है, तो वह सहज ही ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। गुरुरूप से मेरा भजन करने से मेरे भक्त को
ब्रह्मसुख प्राप्त होता है। उद्धव! मेरा भजन तुम अच्छी तरह जानते ही हो यह कहकर श्रीकृष्ण ने उसे 'सौम्य' इस
नाम से सम्बोधित किया। अत्यन्त भाग्य से मनुष्यदेह प्राप्त होने पर, आस्थापूर्वक मेरा भजन करना चाहिये।
तस्माद् देहमिमं लब्ध्वा ज्ञानविज्ञानसन्त्वम्।
गुणसङ्गं विनिर्धूय मां भजन्तु विचक्षणाः ॥ ३३ ॥
जिस मनुष्य देह को प्राप्त करने के लिये देवता भी मन से उत्कंठित रहते हैं, वह प्राप्त होने पर अखण्ड
ज्ञान सम्पादन करना चाहिये। नरदेह प्राप्त हो गया इसलिये ब्रह्मज्ञान अपने आप ही नहीं प्राप्त हो जाता। इसलिये
देहाभिमान छोड़कर मेरा ही भजन करना चाहिये। मेरा अनन्यभाव से भजन करने से सत्त्वगुण सहज ही बढ़ जाता
है। उस सत्त्वगुण से ही विवेकयुक्त ज्ञान उत्पन्न होता है। विवेकज्ञान से युक्त वृत्ति हो जाने पर रज और तम ये
दोनों अपने आप ही झड़ जाते हैं। शुद्ध सत्त्व की स्थिति में अभेदशक्ति बड़े उल्हास के साथ बढ़ती है। मेरा
अभेद भजन करने से आत्मानंद का आस्वाद प्राप्त होता है और इसी को विज्ञान कहते हैं। वहाँ तीनों ही गुण
मिथ्या है, ऐसा निश्चय होता है। नरदेह प्राप्त होने पर प्राणी को इतना लाभ होता है। इसलिये मनुष्य देह प्राप्त