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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 712, कुल 869 में से

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पृष्ठ 712

६९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
से भेंट होते ही राजा की कामेच्छा भी प्रबल हो गयी। उसके साथ विलास करने में कब सुबह हुई और कब रात
हुई, कुछ समझ में नहीं आया। इसी प्रकार कई दिन बीत गये। उर्वशी के साथ विलास कर्म करने में वह अपना
स्वधर्म कर्म भी भूल गया। उसके नियम-संयम टूटते चले गये, विलासभोग की अति हो गयी। भेड़ों के रूप में
उर्वशी के साथ आये वे दोनों अश्विनीकुमार थे। इन्द्र ने उर्वशी का भोगक्षय करने के लिये उन्हें उसके साथ भेजा
था। पुरुरवा के भोग के अन्त में उर्वशी को स्वर्ग में ले जाने के लिये चोर उन भेड़ों को रात में चुरा ले गये, तब
वे 'ब्याँ', 'ब्याँ' कहकर चिल्लाने लगे। भेड़ों की आवाज सुनकर उर्वशी दुःख से व्याकुल हो उठी और राजा की
भर्त्सना करती हुई बोली, "तुम नपुंसक हो। व्यर्थ ही पुरुषार्थ की शेखी बघारते हो। मेरे बच्चों को चोर उठा कर
ले गये, तुम्हारे काले मुँह में आज लगे।" विलाप करते हुए वह अपना सिर पीटने लगी। उर्वशी का वह शोक
देखकर पुरुरवा ने तत्काल शस्त्र उठाया और चोरों का पीछा करने लगा। दौड़ने में उसका पीताम्बर खुल गया।
उसे उसका भान नहीं रहा। उसने भेड़ों को चोरों से मुक्त कर उन्हें उर्वशी के सामने खड़ा कर दिया। इतने में
बड़े जोर से आकाश में बिजली चमकी और राजा का नग्न शरीर चमक उठा। राजा को नग्न देखते ही उर्वशी
अपनी शर्त के अनुसार स्वर्ग चली गयी और उसके शोक में राजा व्याकुल हो उठा।
त्यक्त्वाऽऽत्मानं व्रजन्तींतांनग्नउन्मत्तवन्नृपः।
विलपन्नन्वगाज्जाये घोरे तिष्ठेति विह्वलः ॥५॥
पृथ्वी का पालन करने में वरिष्ठ; स्वधर्म में श्रेष्ठ धार्मिक, शत्रु का संहार करने में वीर तथा पराक्रम में
महावीर; वेदशास्त्र विवेक जानने वाला, जिसका सभी लोग वन्दन करते हैं, ऐसा व्यक्ति एक वेश्या का दास बन
गया? देवदानवों के सामने भी जिसकी गर्दन नहीं झुकती, जो जरा-सा भी अपमान सहन नहीं कर सकता, वह
अपनी श्रेष्ठता भूलकर एक वेश्या के आगे दीन बन गया? उर्वशी को जाते देख वह वैसा ही नग्न अवस्था में
खड़ा रहा और बेहोश होकर रोते-रोते उसके पीछे लग गया; उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहा था। जरा एक
बार तुम्हें देख तो लूँ; प्रेम की दो-चार बातें कर लूँ, तुम आँखों से दूर चली जाती हो तो प्राण निकलने लगते हैं।
अपने पूर्वजों की कसम खाकर कहता हूँ कि तुम्हारे वचन का कभी उल्लंघन नहीं करूँगा, मेरी बात को सच
मानो, तुम्हें मुझ से नाराज होने का कारण ही क्या है? चलते समय तुम्हारे पैरों में कंकड़-पत्थर लगेंगे, तुम कहाँ
जा रही हो? मैं भी आता हूँ, तुम्हारे साथ। एक बार मेरी ओर मुड़कर तो देख लो। कह कर वह उसके पैर
पकड़ने लगा। वह उसकी ओर बिना देखे चली गयी। जिसे बड़े-बड़े राजा साष्टांग दण्डवत किया करते थे, वह
राजाधिराज एक वेश्या के पैर पकड़ रहा है? काम की करनी कितनी अद्भुत है। उसने कहा, तुम्हारे लिये मेरा
चित्त व्याकुल हो रहा है, तुम इतनी पाषाण हृदया कैसे हो गयी हो? मुझ पर इतना गुस्सा भला क्यों करती हो?
इस प्रकार राजा का चित्त अत्यन्त विरहातुर और शोक से भर गया। वह अत्यन्त ग्लानियुक्त हो गया। श्रीकृष्ण
उसकी ग्लानि का वर्णन कर रहे हैं।
कामान्तृप्तोऽनुजुषन् क्षुल्लकान् वर्षयामिनीः।
न वेद यान्तीर्नायान्तीरुर्वश्याकृष्टचेतनः ॥६॥
उर्वशी का कामभोग में राजा का चित्त बिलकुल तल्लीन हो गया था। सूर्य कब उदित होता है और कब
अस्त होता है इसका भी उसे पता नहीं चलता था। मदन ने उसे इतना पागल कर दिया था। एक बार भोग की हुई
स्त्री को प्रतिदिन भोगते रहने से उसके प्रति प्रेम बढ़ जाता है। उसी प्रकार उसकी अवस्था हुई और वह उसका