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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 694, कुल 869 में से

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पृष्ठ 694

६७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बोयेंगे वैसा फल प्राप्त होगा। उसी प्रकार स्वकर्म स्वयं मूलतया शुद्ध है किन्तु गुणों की वृत्ति के कारण उसका
फल भोगना पड़ता है। वाणी स्वाभाविक रूप से सरल और शुद्ध है। रामनाम से उसे ब्रह्मस्वरूप प्राप्त होता है।
लेकिन यदि वह व्यर्थ की बकवास करती है तो वह व्यर्थ हो जाता है और यदि वह निंदा करे तो उसके कारण
बाद में महापाप भोगना पड़ता है। उसी प्रकार श्रद्धायुक्त बुद्धि से स्वधर्माचरण करें तो वह मनुष्य को विरक्त करें
देता है किन्तु यदि त्रिगुणों का सन्निपात हो जाय तो वही श्रद्धा छल करने लगती है। उसके बारे में भी सुनो।
स्वधर्म कर्म में श्रद्धा उत्पन्न होती है और उसके कारण मनुष्य क्षणभर में विरक्ति की ओर मुड़ता है (क्षणभर में
उसकी भोगफल की आशा बढ़ने लगती है अथवा क्षण भर में वह ममता के साथ जुड़ जाता है। काम की भी
वैसी ही स्थिति है। एक क्षण निष्कामता में प्रेम रहता है, क्षणभर में स्त्रीभोग के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है
अथवा क्षणभर में परस्त्री के प्रति ही कामवासना उत्पन्न होती है। यही स्थिति धन की भी है। एक ही क्षण में धन
की आशा छोड़ देता है, दूसरे ही क्षण धन के प्रति चाह उत्पन्न होती है अथवा क्षण भर में दूसरे का धन हड़प
लेता है। धर्म तीन प्रकार का, कर्म तीन प्रकार का और धन प्राप्त करने में भी तीन भेद हैं। गुणवृत्ति के इस भेद
के कारण लोग स्वधर्म छोड़कर अकर्म करते रहते हैं (धर्म सात्विक, अर्थ तामस और काम राजस है। श्रद्धा, रति
और धन ये उनके क्रमानुसार फल हैं। मनुष्य धर्म-अर्थ काम इन तीनों में आसक्त होता है यह सन्निपात का काम
है) इस प्रकार धर्म, अर्थ और काम इनमें अनंत गुणों के सन्निपात हैं। यदि उन सबका यहाँ उल्लेख करें तो ग्रन्थ
का विस्तार अत्यधिक बढ़ जायगा। इसलिये त्रिगुणों का सन्निपात संक्षेप में बताया। श्रीकृष्ण भी पुनः उसी अर्थ
का निरूपण संक्षेप में सुना रहे हैं।
प्रवृत्तिलक्षणे निष्ठा पुमान् यर्हि गृहाश्रमे ।
स्वधर्मे चानुतिष्ठेत गुणानां समितिर्हि सा ॥ ८ ॥
पुरुष को जो गृहस्थाश्रम है वह केवल काम है ऐसा समझना चाहिये। उसमें चित्तशुद्धि के लिये नित्य
नैमित्तिक करना यही स्वधर्म है। गृहस्थ के घर में चक्की चलाने में, ऊखल में अनाज कूटने, चूल्हा सुलगाने,
पानी भरने और झाड़ू लगाने में जाने-अनजाने जीव हिंसा होती है, वही पंचसूना दोष हैं। गृहस्थाश्रम के कारण ये
दोष होते हैं इसलिये उसमें तमोगुण ही प्रमुख होता है और घर में गृहस्थ स्त्रीसुख का उपभोग करता है इसलिये
उसमें रजोगुण है। नित्य नैमित्तिक कर्म करना और स्वधर्म का पालन करना यही गृहस्थ का प्रमुख कर्तव्य है।
यही चित्तशुद्धि का रहस्य है इसलिये गृहस्थाश्रम में सत्त्वगुण भी सुलभ है। गृहस्थाश्रम की जो प्रवृत्ति है वह सदा
इन तीन गुणों से मिश्रित है। उन गुणों ने ही उसे गुणयुक्त बनाया है और वे उससे कर्माचरण करवाते हैं। किसी
भी रंग से रंगे बिना ही स्फटिक उस रंग का दिखायी देने लगता है। उसी प्रकार गुणों की संगत से गुणात्मक
आत्मा भी गुणकर्मों में विचरने लगता है। जिस प्रकार कसौटी स्वयमेव सोने का वर्ण स्पष्ट रूप से दिखाती है,
उसी प्रकार पुरुष की क्रिया भी गुणलक्षण के विभाग प्रदर्शित करती हैं।
पुरुषं सत्त्वसंयुक्तमनुमीयाच्छमादिभिः।
कामीदिभी रजोयुक्तं क्रोधाद्यैस्तमसा युतम् ॥ ९ ॥
जो उचित ढंग से इन्द्रिय निग्रह करता है, जो शमदम में निरन्तर खेलता रहता है, जिसके अंतःकरण में शान्ति
रहती है, वही सच्चा सात्त्विक है ऐसा मान लो। जो सदा फल की इच्छा से लोभी बना रहता है, संसार भोग के सुख
की इच्छा करता है, धन के लिये चाहे जैसा ढोंग करता है, वह मनुष्य रजोगुणी है, इसे ध्यान में रखो। स्वधर्म में