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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 705, कुल 869 में से

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पृष्ठ 705

पच्चीसवाँ अध्याय ६८९
ब्रह्मस्वरूप ही है। ऐसा जिसका भोजनानुक्रम रहता है, वह भी निर्गुण का ही श्रेष्ठ आहार है। तीन गुणों का सुख
भी तीन प्रकार का होता है और निर्गुण का सुख तो अलौकिक है। उस सुख का प्रकार भी यदुनायक श्रीकृष्ण
बताते हैं।
सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तुराजसम्।
तामसं योहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम्॥२९॥
विषयसुख की स्फूर्ति छोड़कर आत्मसुख से ही चित्तवृत्ति आनन्दित होती है, ऐसी जो आत्मसुख प्राप्ति है
वह सचमुच सात्त्विक है। गंगा में जब बाढ़ आती है तो जिस प्रकार नाले आदि पानी से भर जाते हैं, उसी प्रकार
आत्मसुख का लाभ होते ही उस आनन्द से इन्द्रियाँ भी तृप्त हो जाती हैं। नाना प्रकार के विषयों में रुचि, इन्द्रियों
की धमाचौकड़ी, विषयसुख प्रिय लगना, यह सच्चा राजस सुख है और, हे उद्धव! अत्यन्त निन्दनीय और मद
चढ़ने वाला जो सुख होता है, वही बुद्धि को प्रिय लगना यही तामस सुख की सिद्धि है। हृदय में मेरी मूर्ति प्रकट
होते ही, संसार की इच्छा समाप्त हो जाती है और उसके उपरान्त जिस सुख का लाभ होता है वह सचमुच निर्गुण
सुख है। सारे प्राणिमात्र में जो परमेश्वर रहता है वह मैं ही हूँ, यह तत्त्व जानकर, मेरे ऐक्य से जो सुख प्राप्त होता
है वही निर्गुण का सच्चा आत्मसौख्य है। आत्मस्वरूप के सुख का स्वरूप दिखाई पड़ने पर हम स्वयं भी
सुखस्वरूप हो जाते हैं। पाप और पुण्य झड़ जाने पर ही निर्गुण सुख का दीप हाथ लगता है। स्वयं सर्वांग से
सुखस्वरूप होने पर ही स्वयं उस आनन्द का उपभोग प्राप्त होता है। निर्गुण सुख का मार्ग भक्तों को ही अपने
अंतःकरण में भोगना चाहिये। कल्पांतजल प्रलय में जब पूरी तरह ज्वार आ जाता है तो वह नदी, नाले किसी को
नहीं छोड़ता। उसी प्रकार निर्गुण सुख भी देहेन्द्रियों को नहीं छोड़ता। जिस प्रकार मृगजल में जल नहीं होता,
उसी प्रकार परब्रह्म में प्रपंच का स्पर्श भी नहीं है। वह जो भी सुख भोगता है वही निर्गुण है। जिस सुख की कोई
मर्यादा नहीं होती, सदासर्वकाल सुख से सुखस्वरूप होकर रहा जा सकता है, वह सुख-सम्पदा निर्गुण की ही है।
इस प्रकार श्रीहरि के त्रिगुण और निर्गुण के भेद लक्षण बताये। अब ग्रन्थ के अन्त में उसका उपसंहार करते हैं।
द्रव्यं देशः फलं कालो ज्ञानं कर्म च कारकः।
श्रद्धावस्थाऽऽकृतिनिष्ठा त्रैगुण्यः सर्व एवहि॥ ३०॥
'द्रव्य' शब्द से तीन प्रकार का आहार, 'देश' शब्द से वन और ग्राम के बीच का भेद, 'फल' शब्द से सुख
का बोध, इस प्रकार सत्त्व से सम्बन्धित विभाग हैं। 'काल' शब्द से भगवद्भजन समझना चाहिये। 'कैवल्य
निष्ठा' का अर्थ है ज्ञान। कर्म का अर्थ है, मुझे अर्पण करना और कर्त्ता अलिप्त है, यह ध्यान में रखो। 'श्रद्धा'
का अर्थ अध्यात्मिकी श्रद्धा समझना चाहिये। 'अवस्था' शब्द से जागरणादिक समझना चाहिये। 'आकृति' से
ऊर्ध्व लोक के देवताओं के विलास समझने चाहिये। देह के अंत में जो गुण बढ़ता है, अथवा उद्धव! जिस गुण
से अंतःस्थिति होती है, उसे वास्तव में निष्ठा कहते हैं। इस प्रकार इसके भिन्न-भिन्न अनेक भाग हैं। उनमें से
एक-एक का वर्णन कैसे करूँ? मेरे भक्त के लिये सारा संसार ही त्रिगुणात्मक है। सारा संसार तीन गुणों से भरा
हुआ है। इसमें निर्गुण एक मैं हूँ। यह रहस्य तुम्हें बताने के लिये मैंने गुणों का निरूपण किया।
सर्वे गुणमया भावाः पुरुषाव्यक्तधिष्ठिताः।
दृष्टं श्रुतमनुध्यातं बुद्ध्या वा पुरुषर्षभ ॥ ३१॥
आप जो भी कुछ देखते हैं, सुनते हैं या जिसका चिन्तन करते हैं, वह सब माया के गुणों के कार्य से