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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 698, कुल 869 में से

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पृष्ठ 698

६८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है और ऐसा मनुष्य उस नश्वर देह के बल से काम्य कर्म का आचरण शुरु करता है। जिस कर्म के योग से यश
और अकूत धन प्राप्त हो ऐसा कर्म वह करता ही जाता है। रजोगुण से ऐसा आचरण घटता है। त्रिभुवन में मैं ही
अकेला पवित्र हूँ। मेरा ही कर्माचरण श्रेष्ठ है, इस प्रकार की प्रवृत्ति, मान्यता और आसक्ति का होना, यही राजस
स्थिति समझनी चाहिये। रज का बल बड़ा अद्भुत रहता है। उसके कारण मनुष्य अद्भुत काम करना स्वीकार
कर लेता है और अपने उद्योग का दायरा बढ़ाता है। इसे श्रेष्ठ राजस गुण समझना चाहिये। ऊपर से उसकी वृत्ति
सात्त्विक लगती है किन्तु अंतःकरण में कर्म की वासना और धन का लोभ रहता है और जिसके मन में स्त्री की
चाह होती है, वह सचमुच राजस है। अब सत्त्व और रजोगुण इन दोनों को जीतकर जब तमोगुण पूरी तरह बढ़ता
है, उस समय के उस पुरुष के लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
यदा जयेद् रजः सत्त्वं तमो मूढं लयं जडम्।
युज्येत शोकमोहाभ्यां निद्रया हिंसयाऽऽशया॥ १५ ॥
सत्त्व और रज का लोप कर तमोगुण जब प्रबल होता है तो वह उस पुरुष को पूरी तरह जड़, मूढ़ और
अत्यन्त स्तब्ध कर देता है। जब अत्यन्त विश्वास जताकर पराया धन डुबाने का कार्य होता है, अथवा परस्त्रीगमन
होता है, उस समय उस घटना से तमोगुण बढ़ गया ऐसा समझना चाहिये। अपने ही मुख से दूसरों के दुःखों का
उच्चार करना, स्वयं साधु की निंदा करना, संतसज्जनों का द्वेष करना, ये लक्षण जहाँ दिखायी दें वहाँ तमोगुण ने
अड्डा जमा लिया है, ऐसा समझना चाहिये। कोहरा छाने पर सूर्य ढँक जाता है, उसी प्रकार विवेक के अस्तित्व
को भी तमोगुण ढँक देता है। सत्त्वगुण प्रकाश देता है, रजोगुण प्रवृत्ति बढ़ाता है और इन दोनों को निगल कर
तमोगुण की वृद्धि अधर्म के योग से बढ़ती ही जा रही है। श्रेष्ठ जनों का अपमान करने से अथवा साधु का
गुणदोष देखने से तमोगुण किस प्रकार क्षुब्ध होता है उसका स्वरूप सुनो। तमोगुण जब पर्याप्त मात्रा में बढ़ता है
तो स्फूर्ति मंद होती है और तमोगुण बुद्धिनाश कर जीव को जड़ बना देता है। कार्य कौन सा और अकार्य कौन-
सा इस विचार का ज्ञान, उसकी स्फूर्ति पूर्ण रूप से अन्धी हो जाती है। इसका नाम है, मूढ़ता। अब लय का
लक्षण सुनो। चित्त जागृत अवस्था में होते हुए भी जब अर्थ, स्वार्थ, परमार्थ अथवा कृत्य-अकृत्य कुछ नहीं
सूझता, इसी का नाम है लय। उद्योग न करने से सारे इन्द्रियों के व्यापार कुंठित हो जाते हैं और ज्ञानशक्ति पूरी
तरह लुप्त हो जाती है, इसका नाम है जड़त्वप्राप्ति। मूढ़त्व के कारण शोक और दुःख प्राप्त होता है। जड़त्व से
मिथ्या मोह उत्पन्न होता है और मोह के कारण अधर्म में अत्यन्त अविचारी होकर पाप हो जाता है। अब लय का
चमत्कार सुनो। अहोरात अत्यन्त निद्रा आती है। तामस् को निद्रा के सिवा ब्रह्मानन्द का सुख भी नहीं भाता।
तमोगुण पूरी तरह बढ़ने पर पुरुष की ऐसी स्थिति होती है। अब सत्त्वादि गुण बढ़ने पर कौन-सा फल प्राप्त होता
है, उसे श्रीकृष्ण बताते हैं।
यदा चित्तं प्रसीदेत इन्द्रियाणां च निर्वृतिः।
देहेऽभयं मनोऽसङ्गं तत्सत्व विद्धि मत्पदम्॥ १६॥
सत्त्वगुण बढ़ने पर अंतःकरण सदासर्वदा प्रसन्न रहता है और काम, क्रोध और लोभ का बिलकुल स्फुरण
नहीं होता। विषय भोग के लिये जो चित्त व्याकुल रहता था, वही अब विषयोपभोग में उदास रहता है। विषय
भले ही देह पर गिर पड़े लेकिन वह उनसे नहीं उलझता। जिस प्रकार पानी में रहकर भी कमलिनी का पत्ता
पानी से अलिप्त रहता है, उसी प्रकार मेरे ज्ञान के कारण चित्त विषय में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहता है।