श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 701, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंपच्चीसवाँ अध्याय ६८५
अवस्थाओं के गुण उसमें होने के कारण ही उसे तुरीय कहते हैं। परब्रह्म में इन सभी अवस्थाओं का आभास
होता है और इस प्रकार भासमान होने वाली अवस्था तत्काल नष्ट हो जाती है। किन्तु उस भास के विनाश के
कारण परब्रह्म नष्ट नहीं हो जाता। वह तुरीय भी शेष रहता है। तुरीय यह अवस्था त्रिकाल निरन्तर रहने वाली
है। अब गुणवृद्धि के कारण कर्म की जैसी गति होती है उसका वर्णन श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
उपर्युपरि गच्छन्ति सत्वेन ब्राह्मणा जनाः।
तमसाधोऽध आमुख्याँद् रजसान्तरचारिणः ॥ २१ ॥
ब्राह्मणजन ही मुख्यतः सत्वगुण के आश्रय स्थान हैं। ऐसे जो ब्राह्मण ब्रह्मार्पण न करने पर भी स्वधर्माचरण
करते हैं, उन्हें स्वधर्म की कर्मशक्ति से ही ऊर्ध्वलोक में जाने को मिलता है। अब उन ब्राह्मणों को अलग-अलग
लोग कैसे प्राप्त होते हैं, वह भी सुनो। जो सात्त्विक ब्राह्मण होते हैं, वे स्वर्गलोक और महर्लोक को पार कर
जनलोक में पहुँचते हैं और बाद में तपोलोक का भी उल्लंघन कर सत्यलोक पहुँचते हैं। रजोगुण बढ़ने पर जीव
को शूद्रादिक चांडाल जाति प्राप्त होती है और वह बार-बार जन्म, मृत्यु के भोग भोगता ही रहता है। तमोगुण
बढ़ने पर पश्वादि योनि में जन्म लेकर मच्छर, मक्खी, पेड़, पत्थर आदि योनि भोगनी पड़ती हैं। प्राणी के
अंतकाल में देह में जो गुण बढ़ता है, उस मृत्यु का क्या फल है उसे श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
सत्वे प्रलीनः स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलयाः।
तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणाः ॥ २२ ॥
संसार में तीन गुण प्रमुख हैं। उसमें जिसे सत्वगुण बढ़कर मृत्यु आती है, वह स्वर्ग का सुख भोगने के
लिये दिव्य देह प्राप्त करता है। इस प्रकार सात्विक पुरुष सत्वगुण के ही प्राबल्य में मृत्यु पाने पर स्वर्गलोक जाते
हैं। रजोगुण में मृत्यु पाने पर उन्हें मनुष्यलोक प्राप्त होता है और अन्त में काल में तमोगुण की अधिकता होकर
मृत्यु होने पर, वे अत्यन्त दुःखदायी और महाभयंकर नरक भोगते हैं। प्रेम से मेरी भक्ति करने पर भक्तों के हृदय
में, अंत समय में मेरी आत्मतेज से दीप्त मूर्ति प्रकट होती है। शंख, चक्र, गदा आदि सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र धारण
किये पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण का ध्यान कर जो मरण प्राप्त करता है, वह वैकुण्ठ में मत्स्वरूप हो जाता है। समस्त
प्राणिमात्र में मैं ही आत्मा के रूप में परिपूर्ण विद्यमान हूँ। इस प्रकार जिनका भजन अखण्ड चलता रहता है, वे
जीवित अवस्था में ही तीनों गुणों को जीत कर निर्गुण पद को प्राप्त करते हैं। यदि दैवयोग से उन्हें मरण आ जाय
तो मेरे सिवाय उन्हें कोई स्थान नहीं है। निजानंद से परिपूर्ण होने के कारण वे स्वयं ही निर्गुण स्वरूप हो जाते
हैं। मेरा निर्गुण स्वरूप, अथवा वैकुण्ठ में मेरा सगुण स्वरूप ये दोनों सचमुच एक ही हैं। जो कोई स्वर्ग, नरक,
मृत्युलोक अथवा शुद्ध निर्गुण स्वरूपं प्राप्त करते हैं, उनके साधनों का चमत्कार श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
मदर्पणं निष्फलं वा सात्विकं निज कर्म तत्।
राजसं फलसंकल्पं हिंसाप्रायदि तामसम्॥ २३॥
सारी क्रियाओं तथा कर्म आदि का आचरण बिना संकल्प लिये करने से, वह स्वयं ही ब्रह्मार्पण हो जाता
है। यही शुद्ध सत्त्व से निर्गुणस्वरूप का साधन है। वही सभी वर्णाश्रम धर्म का आचरण करता है लेकिन उसके
फलों की इच्छा नहीं करता। उसमें मेरी भक्ति का प्रेम ही रहता है। मेरा भजन करना यही स्वधर्म है। इसी का
नाम है, अपना कर्त्तव्य। यह रहस्य जो जानता है उसके ही कर्म को 'सात्त्विक कर्म' कहते हैं। जो अपने धर्म के