श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 713, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंछब्बीसवाँ अध्याय ६९७
आसक्त हो गया। उर्वशी का भोग करते कितने दिन, मास और वर्ष बीत गये कुछ पता ही नहीं चला। जीवन का
नाश हुआ इसका भी स्मरण नहीं रहा। अग्नि में घृत पड़ने पर उसकी ज्वालायें अधिकाधिक तीव्र हो जाती हैं,
उसी प्रकार स्त्री का बार-बार भोग करने से काम भी बढ़ जाता है। स्त्री विषय का विचार करने पर वह अत्यन्त
तुच्छ मालूम होता है किन्तु रात-दिन भोग करते हुए भी राजा के मन में वैराग्य नहीं उत्पन्न हुआ। उर्वशी में
उसके प्राण बसे हुए थे इसलिये उसने उससे करुणा की गुहार की। लेकिन राजा की ओर मुड़कर देखे बिना ही
वह तेजी से चली गयी। जब उर्वशी सामने नहीं दिखायी दी तो राजा विरह शोक से मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।
फिर उठकर इधर-उधर देखने लगा। जोर-जोर से रोते हुए उसने ताण्डव मचा दिया। इस प्रकार दसों दिशाओं में
भटकते हुए वह एकाएक कुरुक्षेत्र आ गया। वहाँ अन्तरिक्ष में बैठी हुई उर्वशी उसे दिखायी दी। उसे देखते ही
वह चिल्लाया, "दौड़ो उर्वशी ! मुझे अपने आलिंगन में ले लो।" तब वह बोली, हे विषयांध ! यह सारी मूर्खता
अब त्याग दो; भूपते, हम स्त्रियों की आसक्ति कभी अच्छी नहीं होती। हे महाराज ! स्त्रियाँ स्वभाव से ही दुष्ट
होती हैं। विशेष रूप से वेश्याएँ तो स्वच्छंद होती हैं। अपने मन के अनुसार व्यवहार करती हैं, और परपुरुष से
स्वेच्छा से संग करती हैं; इसलिये हे राजा ! तुम मन में हमारा कभी भी विश्वास न करना। हे राजा! हम स्त्रियों
की संगत से आज तक कितने लोग फँसे हैं इसका कोई पता नहीं है; तुम अब हमारी आसक्ति छोड़कर परमार्थ
मार्ग का अनुसरण करो। इतने दिन तक तुमने मेरा भोग किया लेकिन तुम्हें अभी वैराग्य प्राप्त नहीं हुआ। इसलिये
अब तुम कामासक्ति समूल छोड़ दो और अपने सच्चे स्वार्थ की साधना में लग जाओ। लेकिन उसका वह भाषण
उसे अच्छा नहीं लगा। वह पुनः उसके पैर पकड़ कर उसकी प्रार्थना करने लगा। कहने लगा, "तुम कुछ भी
करो लेकिन एक बार अपना अंग संग दो। हे सुन्दरी ! एक बार तुम अपना सुख संभोग दो।" उसकी वह ग्लानि
देखकर उर्वशी का मन पसीज उठा। वह राजा को अपना पूर्व वृत्तांत सुनाने लगी। मैं अत्यन्त सुन्दर स्वर्गांगना हूँ,
मुझे ब्रह्मदेव ने शाप दिया था; किन्तु तुम अत्यन्त पुण्यवान राजा होने के कारण तुम्हारी संगति से मैं उस पाप से
मुक्त हो गयी। तुम्हारी संगत से मैं निष्पाप हुई, मेरे शाप का निवारण हो गया। अब तुम्हारा और मेरा संग इस
लोक में असम्भव है। मैं अब स्वर्ग जा रही हूँ। उर्वशी का यह भाषण सुनकर राजा उसके विरह में रोने लगा।
उर्वशी का मन व्याकुल हो उठा और उसने उसे एक अच्छा उपाय बतलाया। पहले उसने गन्धर्व की प्रार्थना कर
एक अग्निपात्र प्राप्त किया और उसे राजा को देकर बोली, इस अग्निपात्र पर यज्ञ करो, जिससे तुम्हें मेरी प्राप्ति
होगी। उर्वशी के वियोग में व्याकुल होने के कारण राजा अग्निपात्र वहीं छोड़कर अपने मन्दिर में चला आया।
उस समय अत्यन्त शोक से व्याप्त होने के कारण वह अत्यन्त दुःखी हो गया था। उसके मन में उर्वशी का दुःख
था इसलिये वह उसे स्वप्न में दिखायी दी। वह जागृत होकर तत्काल अग्निपात्र देखने पहुँचा। तो उसे वहाँ
अश्वत्थ के वृक्ष पर शमी का पेड़ दिखाई दिया। उसने उस अश्वत्थ की ही अरणी तैयार की और यज्ञ के लिये
पवित्र अग्नि तैयार किया और विधिपूर्वक यज्ञ कर कामसुखभोगेच्छा के कारण वह उर्वशी के लोक में पहुँचा।
उस उर्वशी से विलास करते-करते राजा को विरक्ति हुई और उसने क्या कहा, तुम्हें बताता हूँ। वह निरूपण राजा
ने अठारह श्लोकों में किया है। उसमें के आठ श्लोकों में उसका सच्चा पश्चात्ताप है। वही श्रीकृष्ण सुनाते हैं।
ऐल उवाच
अहो मे मोहविस्तारः कामकश्मलचेतसः ।
देव्या गृहीतकण्ठस्य नायुःखण्डाइमेस्मृताः ॥ ७॥