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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 708, कुल 869 में से

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पृष्ठ 708

६९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
को मरण आता ही नहीं है। इतने पर भी प्रारब्ध से आयु शेष होने पर उसे देहाभिमान की बाधा नहीं होती। वह
बाहर के दृश्य पदार्थ नहीं देखता। उसके अंतःकरण में विषय का स्फुरण नहीं होता, और वह देह का देहपन भी
नहीं देखता। यही जीवन्मुक्ति का लक्षण है। बाहर दृश्य सुख का अनुभव लेना और हृदय में विषयों की आसक्ति
रखना, यही है अज्ञान की स्थिति। यह अविद्या की शक्ति है तथा बाधक है। अविद्या का यह बन्धन तोड़ने के
लिये मेरा भजन करना चाहिये। इसीलिये साधु संतों ने भक्ति पर प्राण न्योछावर किये रहते हैं। मेरी भक्ति से
उत्तम कोई गति नहीं है और वह भजन अभेदभाव से करने पर चारों मुक्तियाँ दासी बन जाती हैं। हृदय में विषय
के प्रति विरक्ति हो और तिस पर अभेद भाव से मेरी भक्ति हो और वह भजन अनन्य भाव से किया हुआ हो तो
मैं श्रीकृष्ण उसका आज्ञाधारी हूँ। भक्ति शब्द का अर्थ इतना ही है कि मेरे स्वरूप पर अभेद भाव से श्रद्धा रखना।
इसी योग से परमार्थ का लाभ होता है। शास्त्रों की सफलता यही है। मेरे प्रति भक्ति के कारण मैं जब पशु-
पक्षियों का उद्धार करता हूँ तो मनुष्य यदि भक्तिभाव से मेरा भजन करते हैं तो उन्हें निजधाम तक पहुँचाना मेरा
काम है। इसलिये विद्वत्ता को एक ओर रखकर सभी को श्रद्धापूर्वक भगवद्भक्ति करनी चाहिये, जिससे अनायास
ही आत्मस्वरूप को लाभ होगा। श्रद्धापूर्वक मेरा भजन करने से अपने आप ही तीनों गुणों का नाश होता है और
हमारा निर्गुणत्व स्वयमेव प्रकट हो आता है। श्रीकृष्ण ने ही यह तथ्य समझने के लिये कहा। जहाँ गुणों की
उलझन समाप्त होती है, वहाँ आत्मशान्ति प्रकट होती है। इसी बात का निरूपण श्रीकृष्ण ने इस अध्याय में उद्धव
से किया। जहाँ भक्ति होती है, वहाँ वृत्ति को गुणों पर विजय प्राप्त होती है और सहज आत्मशांति प्राप्त हो,
स्वयंसिद्ध आत्मस्वरूप प्राप्त होता है। वही आत्मभक्ति मेरी माँ है। जिस जनार्दन ने मुझे उस भक्ति तक पहुँचाया,
उस जनार्दन के चरणों के पास एकनाथ तल्लीन होकर भजन कर रहा है। अगले अध्याय में ऐल-उर्वशी
उपाख्यान की कथा नितांत मनोहारी है। उस अध्याय का पठन करने से अगम्यागमन के दोष भी समाप्त हो जाते
हैं। उसमें पुरूरवा की जिस विरक्ति का वर्णन श्रीकृष्ण अपने मुख से करेंगे उस विरक्ति के योग से निजात्म प्राप्ति
होती है। केवल भाग्यशाली लोग ही उस वैराग्य को प्राप्त कर सकते हैं। उस वैराग्य का निरूपण श्रीकृष्ण ने
अत्यन्त रसीले ढंग से किया है। अतः श्रोतागण कृपया ध्यान देकर कथा सुनें। उस कथा पर ध्यान देने से
महापातक जैसे दोष भी जल जाते हैं, ब्रह्म में ही ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति होती है और मनुष्य ज्ञानस्वरूप में रह
पाता है। उस निरूपण का माधुर्य उत्कृष्ट है। एकनाथ पर जनार्दन की असीम कृपा है। वह उसे परात्पर तीर के
पार पहुँचाएगा। भक्ति-भाव से जनार्दन के चरण पकड़ने से दुःख की बाधा नहीं हो सकती। एकनाथ जनार्दन की
शरण में है। आगे रस से पूर्ण निरूपण है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे एकाकार टीकायां
गुण निर्गुण निरूपण नाम पंचविंशतितमोऽध्यायः ॥ २५ ॥