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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 699, कुल 869 में से

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पृष्ठ 699

पच्चीसवाँ अध्याय ६८३
देह को मृत्यु का भय तो सदा का लगा हुआ है। वह मृत्यु देह के पास आने पर भी सात्त्विक के मन में भय नहीं
उत्पन्न होता क्योंकि ऐसे सात्त्विक लोग मेरे चरणों पर भक्तिरस में डूबे रहते हैं। जब तक 'मैं तुम' का भास होता
है, तब तक मृत्यु अवश्य बाधक होती है। लेकिन सात्विक भक्त मेरे अधिकार से भिन्न नहीं होता इसलिये उसे
मृत्यु का भय नहीं है। जो सात्विक है वह अनन्य भाव से मेरी शरण में आया रहता है इसलिये उसे जन्म-मरण
बाधक नहीं होता। सत्त्वगुण मनुष्य से इस प्रकार का व्यवहार कराता है। अब रज का लक्षण सुनो।
विकुर्वन् क्रियया चाधीरनिवृत्तिश्च चेतसाम्।
गात्रास्वास्थ्यं मनो भ्रान्तं रज एतैर्नीशामय॥ १७॥
जब रजोगुण उफनता है तो विषय की भयंकर चिन्ता उत्पन्न होती है। अतः कर्मेंन्द्रियों से नाना प्रकार के
ठाठ-बाट प्रारम्भ कर देता है। शरीर स्वस्थ होते हुए भी मन चिंतात्तुर और भ्रांत रहता है। विषयों का स्वार्थ बढ़ा
कर वह सदा दुःखी रहता है। पत्नी, बच्चे, धन, सम्पत्ति आदि होते हुए भी वह रजोगुण मन का स्वार्थ और भी
अधिक बढ़ाता है। राजस की चित्तवृत्ति क्षणभर के लिये भी निवृत्ति नहीं चाहती। हे उद्धव ! विकार का कारण न
रहते हुए भी हम मन में विकार का चिंतन करते हैं यही राजस का प्रमुख लक्षण है। न घना अँधेरा हो और
प्रकाशयुक्त दिन भी न हो, ऐसी जो इन दोनों के बीच की हलकी अँधेरी शाम रहती है, ठीक वैसा ही रजोगुण
होता है। अब तमोगुण का लक्षण सुनो। उसका लक्षण जड़त्व है।
सीदच्चित्तं विलीयेत चेतसो ग्रहणेऽक्षमम्।
मनो नष्टं तमो ग्लानिस्तमस्तदुपधारय॥ १८॥
चित्त में गहन चिन्ता उत्पन्न होकर उस चिन्ता के असाध्य मोह में चित्त डूब जाता है और किसी भी प्रकार
के ज्ञान का उसके हृदय में उदय नहीं होता। प्रगाढ़ निद्रा के अलावा जितना भी कुछ अज्ञान रहता है वह सब
ज्ञान को देखकर भागने लगता है, लेकिन उसमें एक चमत्कार होता है और वह यह कि वह अज्ञान उस ज्ञान को
निगल लेता है। तामस पुरुष जगा रहने पर भी सोया हुआ-सा लगता है। जिस प्रकार कोई अन्धा अमावस की
रात जब आकाश बादलों से घिरा हो, उस समय किसी तरह लड़खड़ाता हुआ चलता है उसी प्रकार वह कर्म तो
करता है लेकिन पर्याप्त उत्साह नहीं होता। पूरा आलस का गोला बना गठरी की तरह पड़ा रहता है। तमोगुण की
ग्लानि की पीड़ा ऐसी होती है। उसके कारण चित्तवृत्ति की दृष्टि पर परदा पड़ा रहता है। मनोवृत्ति सदा संकल्पों
और विकल्पों की कल्पना कर ऊँची उड़ान भरती है किन्तु तमोगुण के कारण उस मन की स्थिति जड़ हो जाती
है और संकल्प का उत्साह भी नहीं रहता। इस प्रकार मनोवृत्ति का लय करने वाली ऐसी तमोवृत्ति की वृद्धि होती
है। इस प्रकार जब तम का बाल बढ़ जाता है उस समय अज्ञान ही मन को खा जाता है। मन नष्टप्राय होकर मूढ़
होकर बेहोश पड़ा रहता है। लेकिन मन यदि पूरी तरह नष्ट ही हो जाता तो फिर महादुःख कौन भोगता ?
इसलिये तम से ही एकरूप होकर मन जड़मूढ़ होकर पड़ा रहता है। उद्धव! इस प्रकार की जो स्थिति होती है
वह अत्यन्त दुःखदायी होती है। इसी को तम की स्थिति समझ लो। गुणों की वृद्धि बढ़ाते समय किस गुण से
कौन सी वृद्धि बढ़ती है इसका निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं करते हैं।
एधमाने गुणे सत्वे देवानां बलमेधते।
असुराणां च रजसि तमस्युद्धव रक्षसाम्॥ १९॥
दैवी, आसुरी और राक्षसी यही तीन प्रकार के गुणों की सम्पत्ति है। इन्द्रियों की जो स्थिति ब्रह्माण्ड में रहती