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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 702, कुल 869 में से

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पृष्ठ 702

६८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अनुसार आचरण कर, इन्द्रादि देवताओं को यज्ञयाग कर सन्तुष्ट करता है और उससे ऐहिक और पारलौकिक
फलों की इच्छा करता है, उसका यह कर्म 'राजस' है। जिस कर्म में प्रत्यक्ष हिंसा घटती है अथवा जारणमारणादि
प्रयोग करना आवश्यक रहता है और कर्म का स्वरूप ही घृणित मालूम होता है वह कर्म स्पष्ट ही तामस है।
जिस कर्म में ढोंग ही दिखाई देता है, जिसमें साधुओं के प्रति ईर्ष्या की जाती है, जिसमें दूसरों की पर्याप्त निन्दा
की जाती है, वह कर्म तामस है। अब तीन गुण और निर्गुण इन चार प्रकारों का लक्षण श्रीकृष्ण आगे के श्लोक
में स्वयं बताते हैं।
कैवल्यं सात्विक ज्ञानं रजो वैकल्पिकं च यत्।
प्राकृतं तामसं ज्ञानं मन्निष्ठं निर्गुणस्मृतम् ॥ २४॥
देह में रहते हुए हम देह से भिन्न हैं, समस्त प्राणिमात्र में भगवान परमात्मा के रूप में अंतर्बाह्य व्याप्त है,
यह ज्ञान सचमुच सात्विक है। भिन्न जाति, भिन्न आकार, भिन्न नाम, भिन्न क्रिया इन सबमें ब्रह्म को अभिन्न
स्वरूप समझना, यह ज्ञान सचमुच ही सात्विक है। वेदशास्त्र पठन कर, आत्मज्ञान का विचार करते समय जो
विकल्प के कारण सन्देह करता है, उसके वे विकल्प पूरी तरह राजस हैं। वार्तिक का अध्ययन करने पर भी
जिसके चित्त में अद्वैत का निश्चय नहीं हो पाता, अपने ही तर्क से उसमें विकल्प खोजता है, यह उसका ज्ञान
राजस है। वेदशास्त्र श्रवण करने पर भी जो शिश्नोदर परायण होता है, इन्द्रियों की संतुष्टि के प्रति ही जिसकी
चाह रहती है, वह पूर्णरूप से राजस है। मन का कोई निश्चय न हो और अनेक विकल्प उत्पन्न होते हों, यह
रजोगुण की ज्ञानवृत्ति है। अब तमोगुण के बारे में सुनो। ज्ञान की जितनी भी स्फूर्ति होती है उसे महामोह ग्रस
लेता है। मैं जड़-अंध हूँ यही सच मानता है। क्षणभंगुर पदार्थों पर आसक्ति धरता है। उसका वह ज्ञान सचमुच
ही तामस है। आहार, निद्रा, भय और मैथुन यही पशुतुल्य ज्ञान सचमुच तामस है, इसे ध्यान में रखो। अब निर्गुण
के बारे में सुनो। उद्धव! कार्य, कर्त्ता और कारण यह त्रिकुटी तीन गुणों को शून्य कर चैतन्यस्वरूप में रहती है,
वह निर्गुण ज्ञान है। सत्व के उल्हास से सर्वेन्द्रियों में जो ज्ञान प्रकट होता है, उसे वह व्यर्थ समझता है क्योंकि
वह कहता है कि ज्ञानरूप में मैं अनादि हूँ। समुद्र के पानी से ही नदियाँ बहती हैं। वे नदियाँ समुद्र में आकर
मिलती हैं, लेकिन इससे समुद्र इतराता नहीं है। उसी प्रकार ज्ञान की स्फूर्ति होने से उसे उसका महत्त्व नहीं
मालूम होता। रजोगुण के कारण यदि उसके मन में कोई इच्छा उत्पन्न हो तो भी वह उसे क्षुब्ध नहीं कर सकती।
वह कहता है कि मेरे कारण ही काम्य कर्म चलता है, किन्तु अन्त में मैं स्वयं निष्काम ही हूँ। जिस प्रकार सूर्य
को ग्रीष्म ऋतु की बाधा नहीं होती उसी प्रकार काम्य कर्म का विधि होते समय उस कर्म में मेरा सम्बन्ध नहीं
होता। किन्तु मेरे ही कारण काम सवेग और सोज्वल होता है। तमोगुण बढ़ने पर महामोह का घेरा जकड़ लेता
है। लेकिन उस मोह की परवाह न कर वह मोह का सच्चा स्वरूप अच्छी तरह जानता रहता है। जहाँ सूर्य नहीं
दिखायी देता, वहाँ अन्धकार छा जाता है, उसी प्रकार स्वरूप निष्ठा के कारण मोह का संकट कभी बाधक नहीं
होता। तीनों गुण भले ही शरीर पर क्यों न गिर पड़ें लेकिन वह अपना सन्तुलन नहीं खोता। उद्धव! वही सचमुच
निर्गुण की आत्मनिष्ठा है, इसे ध्यान में रखो। अज्ञान के प्रसंग में जो ज्ञान की इच्छा नहीं करता, अथवा विषयों में
प्रवृत्त होकर निष्कामता की इच्छा नहीं करता अथवा मोह की झड़ी लगने पर भी जिसके ज्ञान में कोई परिवर्तन
नहीं होता, ऐसा मेरा भक्त मेरी श्रद्धा के कारण त्रिगुण में ही निर्गुणत्व से रहता है। तीन गुणों का तीन प्रकार से
रहना और निर्गुणत्व से रहना, इसके सम्बन्ध में भी श्रीकृष्ण स्पष्टीकरण करते हैं।