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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 704, कुल 869 में से

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पृष्ठ 704

६८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
होने के कारण वह भी मैं नहीं हूँ, प्राण चपल होने के कारण वह भी मैं नहीं हूँ और मन चंचल होने के कारण
वह तो मैं हूँ ही नहीं। चित्त चिन्ता करता है, इसलिये वह भी मैं नहीं हूँ, जिसका धर्म है बोध का होना, तो वह
बुद्धि भी मैं नहीं हूँ, अहं बाधक होने के कारण वह भी मैं नहीं हूँ, तो फिर 'मैं' नाम से जो भी कुछ है, वह
अनादिसिद्ध है। इस प्रकार जो बुद्धि से चतुर रहता है वह 'मैंपन' का सार क्या है, इसका विचार कर सकता है।
यही श्रेष्ठ अध्यात्मश्रद्धा है। सात्विक लोग इसी श्रद्धा को पास में रखते हैं और जो 'मैं' नहीं कहता रहता है, वह
सचमुच वही रहता है; इसलिये मेरे 'मैंपन' के चरण पकड़ने से, चारों ओर मैं ही मैं रह जाता हूँ। यही शुद्ध
अध्यात्म श्रद्धा है। वह सदा सात्विक के पास रहती है। अब हे बुद्धिमते! राजस की श्रद्धा कैसी होती है, वह भी
सुनो। वर्णाश्रम के अनुसार रहने वाला एक मैं हूँ, आश्रमधर्म का आचरण करने वाला एक मैं हूँ, कर्म करने वाला
एक मैं ही हूँ, यही भावना मन में दृढ़ करना और इसी हेतु से कर्म का आडम्बर फैलाना; दर्भ, मृत्तिका आदि
साहित्य बड़ी आस्था से एकत्र करना; शुचिता का महत्त्व इतना अधिक बढ़ाना कि उसके चारों ओर विधि निषेधों
का चक्र सदा घूमता रहता है। दोष दृष्टि के आँगन में गुणदोषों की तो ढेर सारी राशियाँ पड़ी रहती हैं। पवित्रता
के अभिमान के साथ शुचिता के मामले में वह ब्रह्मदेव को भी तुच्छ मानता है। उद्धव! देहाभिमान को कंधे पर
बिठाकर कर्मबाधा को ही सत्य मानना। यही राजस श्रद्धा है, उद्धव! अविचार जैसे-जैसे बढ़ता जाता है, हाथ से
अकर्म घटता है और अधर्म का लाभ होता है, यह श्रद्धा तामस को अच्छी लगती है। जिसमें स्वैराचार, अपेय का
पान तथा मनचाहा अभक्ष्य भक्षण होता है, अथवा अगम्यागमन की घटना होती है, तो वह सारी श्रद्धा तामसी है।
अधर्म को ही धर्म मानना, यही तामसी श्रद्धा का प्रमुख रहस्य है। अब जो सबसे उत्तम निर्गुण श्रद्धा है, उसके
बारे में सुनो। समस्त प्राणिमात्र में परमेश्वर ही भरा हुआ है, ऐसी श्रद्धा से जो एकनिष्ठा से प्राणिमात्र का ही
निर्गुण है। पत्नी, बच्चे, धन दौलत तथा प्राण भी जो मुझ पर न्योछावर कर देते हैं और एकनिष्ठा से मेरा भजन
करते हैं, वह श्रद्धा सचमुच ही निर्गुण है। चारों पुरुषार्थ छोड़, चारों मुक्तियों को दूर कर जो ऐक्य भाव से मेरा
भजन करते हैं, वह श्रद्धासम्पत्ति निर्गुण है। उद्धव! निष्काम होकर नामस्मरण करना, निर्लोभ वृत्ति से हरिकीर्तन
करना, ऐसी भक्तिभावना से जो मेरा भजन करता है, वही निर्गुण श्रद्धा है। तीन गुणों का आहार भी तीन प्रकार
का है। उसे श्रीकृष्ण बताते हैं और साथ में निर्गुण आहार के बारे में भी बताते हैं जिसका विचार गहन है।
पथ्यं पूतमनायस्तमाहार्यं सात्विकं स्मृतम् ।
राजसं चेन्द्रियप्रेष्ठं तामसं चार्तिदाशुचि ॥ २८ ॥
पवित्र होते हुए भी जो हलका हो, सत्ववृद्धि के लिये उपयुक्त और विशेष प्रयास न कर प्राप्त होने वाला
जो अन्न होता है वही सात्विक आहार है। अल्पाहार का ही नाम है पथ्य। पवित्र का अर्थ है धर्म से सम्पादित
किया हुआ और वह भी विशेष प्रयत्न के बिना मिला हुआ जो अन्न हो वही सात्त्विक आहार है। आम्ल, कतरा
या मधुर, तीखा, तला, मसालेदार, चटपटा या ऊष्ण, बार-बार भुना हुआ, एक रस में दूसरा रस मिलाकर, पन्हा,
कढ़ी या सारण, पापड़ आदि नमकीन सामग्री यह सब राजस आहार है। नाना प्रकार के प्रयास कर, कष्ट सह
कर राजस भोजन करते हैं। अब तामस का भोजन सुनो। खाना खाते समय जो मादक और दुर्गन्धियुक्त हो ऐसा
आहार वह मूर्ख करता है। अमंगल और दुःखदायी ऐसा जो आहार हो उसे तामस ही समझना चाहिये। भगवान्
का जूठा प्रसाद, साधु-सज्जनों की बची हुई पवित्र अन्न, यह निर्गुण का आहार तो प्रसिद्ध ही है। इस प्रकार
श्लो में 'च' अक्षर से ही भगवान ने उच्चार करके बतलाया। हर ग्रास पर 'गोविंद', 'गोविंद' कहने से अन्न शुद्ध
होता है। यही प्रसिद्ध निर्गुण का आहार है। अन्न भी ब्रह्म, मैं भी ब्रह्म और पंगत में उपस्थित रहने वाला भी