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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

६५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हो तो मैं उन्हें रहने के लिये वैकुण्ठ में ले जाता हूँ। भक्त यदि सामिप्य चाहते हैं तो मैं उन्हें अपना प्रिय बनाता
हूँ। जिस प्रकार तुमसे मन की बात करने में मुझे अच्छा लगता है, उसी प्रकार हे उद्धव ! तुम मुझे जिस प्रकार
अच्छे लगते हो, उसी प्रकार मैं उससे प्रीति करता हूँ। भक्ति यदि सरूप माँगे तो मैं उसे चतुर्भुज बनाता हूँ और
शंख, चक्र आदि आयुध देकर उसे मेघ जैसा सुन्दर साँवला वर्ण देता हूँ। मुकुट, कुण्डल, करधनी पहनने के
लिये पीला पीताम्बर, बाजूबंद, पैर में पायल और गले में मेरे ही जैसा कौस्तुभमणि। आकारस्वरूप, गुणलक्षण,
वीर्य, शौर्य, पूर्ण गाम्भीर्य, रूप-लक्षण ठीक एक जैसे। लक्ष्मी यदि दोनों को एक साथ देख ले तो वह भी नहीं
जान पायेगी कि इनमें भगवान कौन हैं? सेवकों का सेवाकर्म रुक जाता है क्योंकि वे सेवा करें तो किसकी?
छत्रधारण करने वाला भी मन में विचार करता है कि मैं छत्र किसके ऊपर धारण करूँ? चँवरी हिलने वाला भी
चँवर किस पर हिलाये ? ब्रह्मादि देवतागण प्रणाम करने आते हैं, वे भी आश्चर्य करते हैं। दोनों में आदि देवता
कौन हैं, यह उनकी भी समझ में नहीं आता। जिस प्रकार एक दीप से दूसरा दीप जलाने के बाद यह समझ में
नहीं आता कि इनमें पहला दीप कौन-सा है, उसी प्रकार मेरी सरूपता प्राप्त होने के बाद दूसरे को वह भी नहीं
पहचान पाता। जिस प्रकार दर्पण में एक-सा प्रतिबिम्ब देखने पर वही असली बिम्ब मालूम होता है, उसी प्रकार
सरूपता की शोभा रहती है। दोनों का ठाठ एक जैसा। भगवान प्रसन्न होकर अपनी सारी सरूपता दे देता है लेकिन
हृदय पर अंकित वह ब्राह्मण का चरण वह अविनाशी श्रीवत्सलांछन कदापि नहीं देता। विष्णु स्वयं ही कहते हैं,
श्रीवत्सचरण देने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है। वह सामर्थ्य ब्राह्मणों के पैर में है। उन ब्राह्मणों के चरण हृदय में
धारण करने से ही वह मिलेगा। सरूपता में भगवान और भक्त को पहचानने की यही निशानी है। जिसके हृदय
पर श्रीवत्सलांछन रहता है, वही सबका स्वामी श्रीविष्णु है। इस प्रकार की सरूपता प्राप्त होने पर भी एक देवता
है तथा दूसरा भक्त है, यह भेदभाव उनमें रहता ही है। भगवान और भक्त इनमें जब तक भेद है तब तक सरूपता
करना भी उपयुक्त नहीं है क्योंकि जब तक अद्वयज्ञान नहीं होता, तब तक परमानन्द उत्पन्न नहीं होता। इसलिये
भिन्नत्व की बात न कर भक्त सायुज्यता ही माँगता है। उस निरूपण की कथा अत्यन्त मधुर है। वह कथा केवल
मैं ही जानता हूँ। सायुज्य की जो मिठास है, वह केवल मैं ही जानता हूँ। उद्धव ! उसे भी मैं तुम्हें विस्तारपूर्वक
बताऊँगा। सरूपता से देह की समानता भले ही प्राप्त हो जाय लेकिन हृदय में मैं और तुम वाला भेदभाव रहता
ही है। इसलिये ऐसी सरूपमुक्ति से भी ज्ञानी भक्त लुब्ध नहीं होते। मेरा स्वरूप प्राप्त कर मेरे भक्त मेरा स्वतः
सिद्ध भजन करना छोड़, मेरे भक्त मन से भी भेद का स्पर्श नहीं करते। देवता के साथ भक्त भी अनादि सिद्ध हैं।
वे मूलतया भेदरूप हैं। ऐसा होते हुए जो जान-बूझ कर भेद मानता है उसे भक्तिहीन तथा मायिक समझना
चाहिये। आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी ये सारे भेद मायिक भक्ति ने किये हुए हैं। किन्तु अभेदभाव से जो मेरा
भजन करते हैं, उन्हें सायुज्यता-मुक्ति प्राप्त होती है। राजा और रंक जिन्हें एक जैसे हैं, उनका मन किसी को वंद्य
और किसी को निंद्य नहीं मानता, जिनमें देहाभिमान नहीं होता, उन्हें सायुज्यता प्राप्त होती है। जिस प्रकार हमारी
परछाईं मिथ्या ही हमसे चिपकी रहती है, उसी प्रकार जो इस देहबुद्धि को मिथ्या समझता है, उसे ही सायुज्यता
प्राप्त होती है। छाया हमारे ही साथ जन्म लेकर हमारे ही साथ बड़ी होती है, फिर भी उसके प्रति मेरी जैसी
ममता किसी के मन में उत्पन्न नहीं होती। उसी प्रकार जिसे देह के दुःख की बाधा नहीं होती, उसे ही निश्चित
रूप से सायुज्यता प्राप्त होती है। देह की विषयासक्ति भूलकर जो मन से अभेदभक्ति करता है, उसे ही हे उद्धव!
सायुज्ययुक्ति प्राप्त होती है। अपनी देह में जिसमें 'मैं' पन उत्पन्न नहीं होता, किसी प्राणी में जो 'तू' के भाव से
नहीं देखता उसे पूर्णरूप से सायुज्ययुक्ति प्राप्त होती है। उद्धव ! जितना मेरे आत्मा का विस्तार है, उतनी ही उसे

चौबीसवाँ अध्याय ६५९
आत्मप्रतीति होती है। इसलिये उसे सहज ही सायुक्त मुक्ति प्राप्त होती है। मेरा देह विष्णुस्वरूप है ऐसा
देहाभिमान उसमें कदापि उत्पन्न नहीं होता। वह विष्णु के देह को और अपने देह को मिथ्या ही समझता है।
इसलिए वह सरूपता की कामना नहीं करता। अपनी ही जगह यदि विचार किया जाय तो देह के रूप में जो भी
कुछ है, वह सब मिथ्या है ऐसा लगता है। तो फिर सरूपता कहाँ रही ? सायुज्यता प्राप्त होने के बाद ब्रह्म के
सिवाय कोई रीता स्थान दिखाई ही नहीं देता। समस्त प्राणिमात्र में एकात्मता होना, इसी का नाम वास्तव में
सायुज्यता है। अनेक प्रकार के रूपों से संसार भरा है, उसे वह अपना ही अंग समझता है, मैं ही अभंग सर्वात्मा
हूँ, ऐसी जिसकी भावना होती है, उसी को पूर्ण सायुज्यता प्राप्त होती है। अंतर्बाह्य मैं ही व्याप्त हूँ, सभी स्थावर-
जंगम में मैं अकेला ही व्याप्त हूँ, चराचर का आत्मा मैं ही हूँ, ऐसा जो मानता है, उसके घर में सायुज्यता चाकरी
करती है। सर्वत्र मैं एक अकेला ही एकत्त्व से भरा हुआ हूँ, ऐसी जिसकी समझ रहती है, जिसका द्वैतभाव नष्ट
हुआ रहता है वही सचमुच सायुज्यता प्राप्त करता है। सारांश, भावपूर्वक जो मेरे भक्त जिस किसी भी वस्तु की
इच्छा करते हैं, उसकी आपूर्ति मैं श्रीपति करता हूँ। इस प्रकार भक्तों को चारों मुक्ति प्राप्त होती है। इसके
अतिरिक्त भी मेरे और प्रिय भक्त हैं। अपनी भक्ति के प्रताप से वे अत्यन्त प्रतापी रहते हैं। उनके भजन का शौर्य
विचित्र रहता है। वे निरन्तर इच्छारहित होकर मेरे भजन में ही मग्न रहते हैं। आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी इन बातों का
विचार न कर वे निरन्तर इच्छारहित होकर अत्यन्त प्रेमपूर्वक मेरा भजन करते हैं। वे सलोकता, समीपता और
सरूपता बिलकुल स्वीकार नहीं करते और सायुज्यता भी नहीं माँगते। वे इच्छारहित होकर भगवान का भजन
करते रहते हैं। इसी का नाम है सच्ची भक्ति। भजन के सामर्थ्य का एक बहुत बड़ा चमत्कार है। वह यह कि
चाह से ही चाह उत्पन्न होती है और अधिक से अधिक उत्कर्ष से क्षण-प्रतिक्षण प्रेम की नयी माधुरी उत्पन्न होती
है। सचमुच, मेरे प्रति रुचि के कारण वह अपना सर्वस्व मुझे अर्पण करता है, फिर भी उसके अंतःकरण में कोई
परिवर्तन नहीं होता। भक्तिभाव से वह भजन के प्रति इतना अधिक आश्वस्त रहता है। देवाधिदेव एक मैं हूँ,
समस्त प्राणियों में मेरा आत्मा है, ऐसी जिसकी भावना हो जाती है, उसके मन में कोई कितने ही विकल्प,
विकृति अथवा संशय उत्पन्न करने का प्रयत्न क्यों न करे लेकिन उनका प्रयास सार्थक नहीं होता। भक्ति की
महत्ता आश्चर्यजनक है। वह भक्त सारे पुरुषों-स्त्रियों में मुझे ही देखता है। श्वान, शूकर आदि में मेरा ही रूप
देखकर उनको प्रणाम करता है। उसके भजन की महत्ता आश्चर्यजनक है। ऐसे भक्त सायुज्यादि चारों मुक्ति मुझ
पर न्योछावर कर देते हैं। इतनी असीम उनकी भक्ति रहती है। कितना ही बड़ा संकट क्यों न आ जाय लेकिन वे
दूसरे के पास मिन्नत करने नहीं जाते। वे जानते हैं कि रामनाम के सामने वह विघ्न कुछ नहीं कर पायेगा। चाहे
बिजली की गर्जना से आकाश नीचे गिरता सा मालूम पड़े अथवा पृथ्वी उलटने लगे, लेकिन वह श्रीहरि का
नामस्मरण करता रहता है। ऐसी एकनिष्ठ प्रीति देखकर मैं लक्ष्मीपति उसके मोह में पड़ जाता हूँ और फिर कुल
और जाति का विचार न कर उसके घर की ओर दौड़ पड़ता हूँ। ऐसे भक्त वैकुण्ठ की राह नहीं खोजते, वरन्
उनके घर को ही मैं वैकुण्ठ बना देता हूँ। फिर वहाँ ज्ञान की भोर होती है, और संतों का समुदाय एकत्र होने
लगता है। उपनिषद उनके पास आते हैं; स्वधर्म आनन्दपूर्वक उनके पास रहने के लिये आता है और नारद,
सनकादिक आदि को उस घर से लगाव-सा हो जाता है। वे नाम के माहात्म्य का घोष करते हैं। बड़ी चाह से
मेरी यशोगाथा का गान करते हैं। मेरे रामनाम के आगे सुख-दुःख के द्वंद्वों की कष्टदायक स्थिति शेष ही नहीं
रहती। मेरी ऐसी भक्ति देखकर आत्मशान्ति अत्यन्त प्रेम से उनके पास दौड़ती चली आती है और वहाँ आकर
जब वह प्रसन्न हो जाती है तो जाने की बात ही भूल जाती है। जो भी दूषण उनका छल करने के लिये आते हैं,

वे सब उनके भूषण हो जाते हैं। इसी का नाम है मेरी भक्ति की प्रसन्नता। सायुज्यादि जो चार मुक्तियाँ हैं, वे सब
वहाँ उनकी सेवा में उपस्थित रहती हैं, वे जहाँ विषय सेवन करने लगते हैं, वहाँ सायुज्य मुक्ति ही उनकी सेवा
करती है। ऋद्धि-सिद्धि उसके घर की दासी बन कर रहती हैं, फिर भी वह उनकी इच्छा नहीं करता। उसकी
सारी दारोमदार मेरी भक्ति पर ही रहती है। निश्चयपूर्वक की हुई ऐसी भक्ति देखकर मैं भी उस पर अनन्य प्रीति
करता हूँ। भक्त जहाँ मेरी बाट जोहते हैं, वहाँ मैं लक्ष्मीकांत स्वयं ही प्रकट होता हूँ। भक्त सहज ही जो बात
करता है, वह बात मैं स्वयं ही बन जाता हूँ। उसकी बातों में अंतर्बाह्य मैं ही शब्दार्थरूप में रहता हूँ। वह मौज में
कंकड़ से खेलने लगता है तो वह कंकड़ भी मुझे ही बनना पड़ता है। वह कृपालु होकर जिसकी ओर देखता है,
उसके मजबूत सांसारिक बन्धन मैं तोड़ देता हूँ। वह जिधर दृष्टि घुमाता है, उधर मैं सुखों की सृष्टि बना देता हूँ।
वह जिसका उद्धार करने के लिये कहे, उसे मैं अपने पद पर आसीन कर देता हूँ। उस पर जरा सा भी संकट आ
जाय तो उसे समाप्त करने के लिये मैं दौड़ पड़ता हूँ। जो भी उसका नाम लेते हैं, उनका मैं पूर्णरूप से उद्धार
करता हूँ। नन्हे बालक की चिन्ता जिस प्रकार उसकी माँ को होती है, उसी प्रकार मुझे भक्तों की चिन्ता रहती है।
उनकी सेवाचाकरी करने में मैं जरा भी नहीं शरमाता। माँ जिस प्रकार अपने बच्चों का लाड़-प्यार करती है, उसी
प्रकार मैं उनसे लाड़-प्यार करता हूँ। उनका प्रेम ही मुझे प्यारा लगता है। अन्य उपचारों की मुझे इच्छा ही नहीं
है। मैं शरीर हूँ और वह मेरा आत्मा है। प्यारा भक्त ही हमें अच्छा लगता है। भक्ति की महिमा कितनी ही महान
क्यों न हो लेकिन प्रिय व्यक्ति पर उसकी मात्रा का प्रभाव नहीं होता। प्रेमी के पास ही भक्ति की मर्यादा समाप्त
होती है। शायद काल उसका संहार करेगा इसलिये उसके भीतर और बाहर मैं अपने शरीर का किला ही तैयार
करता हूँ। प्रेमियों का मुझ पर इतना अधिक प्रेम है। ऐसी स्थिति में काल के ही भय से मैं अपने भक्तों को
ब्रह्मस्वरूप के मार्ग पर लगाता हूँ और अत्यन्त ध्यानपूर्वक उन्हें अपने स्वरूप में पूर्णरूप से आत्मसुखी बनाकर
रखता हूँ। ऐसे भक्तों का जो स्वाभाविक कृत्य है, वही मेरी प्रीति की पूजा है। वह जो देखता है, वही मेरा दर्शन
है और वह जो कुछ बोलता है वही मेरा वास्तविक स्तोत्र है। वह स्वयं जो भोजन करता है, वही मेरे लिये नैवेद्य
समर्पण है। उसकी निद्रा ही मेरी पूर्ण समाधि है। उसकी आँखों का खुलना बन्द होना मुझे बड़ा अच्छा लगता है।
उसका श्वासोश्वास मुझे अत्यन्त सुख प्रदान करता है। भक्तों के शरीर की जो स्वाभाविक स्थिति रहती है उससे
मैं लक्ष्मीपति अत्यन्त आनन्दित होता हूँ। ऐसे प्रेमी भक्त मुझे बहुत भाते हैं। मेरे भक्तों पर मेरी एकनिष्ठ प्रीति
रहती है। जो भक्त चारों पुरुषार्थों का स्पर्श नहीं करते और चारों मुक्तियों को दूर कर प्रेम से मेरी ही भक्ति करते
हैं, वे मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त करते हैं। गंगा समुद्र में मिलकर एकरूप से उसमें ऐसे मिल जाती है कि वह गंगा
ऐक्य रूप से उसकी ही होकर उस पर लोटने लगती है। उसी प्रकार मेरा भक्त भक्ति के सामर्थ्य से मुझसे
मिलकर मेरी भक्ति का सुख मुझमें ही भोगता है। युवा स्त्री यौवन के मद से सर्वांग से उस यौवन का उपभोग
करती रहती है, उसी प्रकार भक्त मुझसे मिलकर मेरी भक्ति का वैभव भोगता रहता है अथवा सत्रहवीं कला का
माधुर्य चन्द्रमा स्वयं ही जानता है, उसी प्रकार मैं बन कर मेरा भजन किस प्रकार किया जाय यह सज्ञानी भक्त
जानते हैं। वैसे जाति, स्वभाव के अनुसार सभी स्थानों का जल एक जैसा होता है किन्तु वही जल गंगा, यमुना
इन नामों से प्रयाग में एकत्र होता है और उस संगम पर लोगों का उद्धार करता है। उसी प्रकार मुझसे ऐक्य होने
पर भाविक भक्त भी बड़ी योग्यता प्राप्त करता है। उसके अनुसार मेरे भक्त मुझसे मिलकर एकनिष्ठ होकर मेरा
भजन करते हैं। ऐसे भजन से, मेरे साथ ऐक्य होने के कारण भाविक, सात्त्विक और अत्यन्त दीन लोगों का
उद्धार होता है। पृथ्वी तो सम्पदा से भरी हुई है ही लेकिन भाग्यवान के बिना उस द्रव्य की प्राप्ति नहीं होती।

चौबीसवाँ अध्याय ६६१

चारों पुरुषार्थों को छोड़कर जो चारों युक्तियों की उपेक्षा करते हैं और पाँचवें पुरुषार्थ की भक्ति करते हैं, वही
उद्धव ! मुझे प्रिय है। ऐसी ही भक्ति से मैं प्रेम करता हूँ। ऐसे ही भक्त मेरे लाडले रहते हैं। मुझ जैसे निरिच्छ को
उनका कौतुक होता है। उनका प्रेम मधुर होता है। हम प्रेम के अतिथि और भाव के सेवक हैं। मुझ एकनिष्ठ की
जीव प्राण से सर्वस्व सेवा करें। मेरा नाम आत्माराम है। मेरी सारी इच्छाएँ नष्ट हो चुकी हैं। फिर भी मैं अपने
प्रिय भक्तों की इच्छा मन में रखता हूँ क्योंकि मेरे प्रति उनका प्रेम अत्यन्त मधुर है। फिर मैं अपने प्रिय भक्त को
अपने साथ कर लेता हूँ और अन्त में उसे अपना ही सुख देता हूँ क्योंकि मुझे प्रेम से अत्यन्त प्रेम है। प्रेम मुझसे
भी अधिक मूल्यवान है। मैं उसकी बराबरी नहीं कर सकता इसलिये यदि मैं अपना सुख उसे नहीं दे पाता तो मैं
उसका ईमानदार सेवक बनकर रहता हूँ। प्रेम की सच्ची आत्मीयता और भावार्थ का लक्षण जानने वाला एक मैं
श्रीकृष्ण ही हूँ। अन्य लोग इसे नहीं जानते। मुझे गोपियों के सान्निध्य में सुख मानने का क्या कारण था ? लेकिन
उनका प्रेम अत्यन्त निर्मल था, इसीलिये उद्धव ! मेरे मन में उनके प्रति अतीव चाह उत्पन्न हो गयी। क्या कुब्जा
सुन्दर थी ? लेकिन मुझे उसके प्रेम की चाह थी। मैं वन में जाकर राधा की प्रार्थना करता था, वह क्या
विषयासक्ति के लिये ? गोपालों ने भी कितनी भक्ति की ! क्या वे छूत थे या अछूत थे ? लेकिन उनके जूठे कौर
मैंने खाये और उनके प्रेम में डोलता रहा। क्या मैं पाण्डवों का ऋणी था ? लेकिन उनके लिये मैंने अनेक कष्ट
सहे। मैंने सुदामा के चरण छुए। क्या मैं उसके उपकारों का ऋणी था ? क्या मेरे पास अन्न की कमी थी इसलिये
यज्ञपत्नियों के पास अन्न माँगने गया था ? मैं प्रेमभाव का भूखा हूँ इसलिये प्रेम का आतिथ्य लेने गया था। मुझे
गोपियों ने रस्सी से बाँध रखा था, उस समय क्या मेरी शक्ति बन्धन में रहने के लिये क्षीण हो गयी थी ? लेकिन
उनके प्रेम से ही मेरा पोषण हो रहा था। किसी का एक कौड़ी का भी कर्जदार न होते हुए मैं अर्जुन के घोड़ों को
नहलाता था। धर्म के घर की मैंने जूठन भी उठायी। इस प्रकार मुझे प्रेम की अत्यन्त चाह है। वह चाह मेरी
लौकिक दृष्टि से लाज लज्जा भी नष्ट करती है और मैं अपने बड़े-बड़े काम भी भूल जाता हूँ। उनकी सेवा
करने की मुझे इतनी लगन है। माँ सारे अलंकार पहनाकर बच्चे को अपने माथे पर बिठाती है। उसका लाड़
करती है और यदि इस बीच वह माँ पर थूकता है या पेशाब कर देता है तो उससे घृणा नहीं करती। उसी प्रकार
मेरे प्यारे भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय हैं, मैं श्रीकृष्ण अपने भक्तों का अंकित होकर रहता हूँ और प्रेमवश सदा उनके
आगे-पीछे खड़ा रहता हूँ। उद्धव ! मेरा यादवों का इतना बड़ा गोत्र है लेकिन केवल तुम ही मुझे इतने प्रिय लगते
हो। इसका कारण यही है कि तुम्हें मेरे प्रति अद्भुत प्रेम है ? भगवान का यह भाषण सुनकर उद्धव ने उनके पैर
पकड़ लिये। भगवान को भी अंतःकरण में अत्यन्त आनन्द हुआ और उन्होंने उद्धव को तत्काल आलिंगन दिया।
हृदय में हृदय एकरूप हुआ, देह का देह से आलिंगन हुआ, मन से मन मिला, तो आत्मानंद आकंठ भरकर बहने
लगा। देवता अपना देवत्त्व भूल गये और भक्त को अपना भक्तपन विस्मृत हो गया। दोनों का द्वैत नष्ट होकर वे
आत्मानन्द में पूर्णरूप से मग्न हो गये। सेव्य और सेवक का भेद ही समाप्त हो गया। द्वैतभाव की दृष्टि ही बन्द
हो गयी। आत्मा की एकता से भक्ति साम्राज्य के सिंहासन पर दोनों की भेंट हुई। स्थूलदेह, लिंगदेह और
कारणदेह इन्हीं से देखा चौथा महाकारण, लेकिन उस समय उसका स्मरण किसे होता ? इसलिये घना और
परिपूर्ण आनन्दमय स्वरूप, जिसे न आदि है न अन्त है वह साक्षात् प्रकट हुआ किन्तु भगवान की परिपूर्णता का
अद्भुत चमत्कार है। उसने वहाँ भी चमत्कार किया, उसने उद्धव को उसके अस्तित्व का भान नहीं जाने दिया
क्योंकि उसने मन ही मन कहा कि मुझे ऐसा भक्त नहीं मिलेगा। अपने मन की बात कहने के लिये मुझे उद्धव के
सिवा और कौन मिलेगा ? मेरे मन में जो मधुर बातें हैं उन्हें मैं आहिस्ता-आहिस्ता किसे सुनाऊँगा ? मेरे निजधाम

६६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत

जाने के बाद मेरा जो अपार आत्मज्ञान है, उसके लिये उद्धव एक अच्छा संग्रह का स्थान है। इसलिये उसने
उद्धव का भान कायम रखा। उद्धव आत्मानंद में निमग्न हो गया था। उसे श्रीकृष्ण ने अपने हाथों से थपकी देकर
होश में लाया। तब कहीं उसे अपने भक्त होने का विश्वास हुआ। उसने कहा, "हे श्रीकृष्णनाथ ! तुम्हारी जय हो।
तुमने अभी जो आत्मसुख मुझे दिखाया वह निरन्तर कायम रह सके ऐसी कृपा कीजिये। तब श्रीकृष्ण ने कहा,
"उद्धव! यह मेरे गुप्त ज्ञान की गुप्त निधि है। इसी का नाम 'पाँचवां पुरुषार्थ' है। यह वेदशास्त्रों के लिये दुरूह
और देवताओं के लिये दुर्गम है। जिसके कारण मैं पुरुषोत्तम लुब्ध हो जाता हूँ, वह यह भक्तप्रेम का रहस्य है।
मुझे वश में करने का मर्म यही है कि अंतःकरण में भक्तिप्रेम रखे जिससे चारों मुक्तियों का भ्रम नष्ट हो जाता है
और पुरुषार्थ काम भी कम हो जाता है। जिसे मेरी सप्रेम भक्ति है, उसका नाम सुनते ही सारे विघ्न भाग जाते हैं
उसे मेरी प्राप्ति के अलावा दूसरी गति प्राप्त कराना किसका सामर्थ्य है ? जिसे मेरी अनन्यभक्ति होती है, उस पर
मेरी पूर्ण कृपा रहती है। मेरे भक्तों को मेरे सिवाय अन्य कोई गति कल्पांत में भी नहीं हो सकती। भक्तों को यदि
वेदविधि से अड़चन उत्पन्न करें तो वह वेद मेरे ही उच्छ्वास से उत्पन्न हुआ है। जो मेरे सकाम भक्त हैं वे भी
फल भोगने के बाद निष्काम ही हो जाते हैं और वे भी मेरे ही निजधाम पर आते हैं क्योंकि भक्तों को अन्य कोई
स्थान ही नहीं है। जिसके पास मेरी एकनिष्ठ भक्ति है उसके चरणों की सेवा स्वकर्म करता है। विधिनिदर्शक वेद
उसके आँगन में खड़े रहते हैं। मेरे भक्त के लिये मेरे अलावा कोई स्थान नहीं है। जिसके अंतःकरण में मेरे प्रति
सप्रेम भक्ति नहीं है, उसे कर्म निश्चित रूप से बाधक होते हैं। उद्धव! जो अभक्त होते हैं उन्हें कर्म के ही कारण
दूसरी गति प्राप्त होती है। जहाँ मेरी सच्ची भक्ति रहती है वहाँ कर्म की गति नहीं चलती। मेरे भक्तों को इसी
कारण से मेरी प्राप्ति होती है। भक्तों के मन में समस्त प्राणिमात्र के प्रति जब मेरा ही भाव रहता है तो फिर उनके
पास कर्मबन्धन के लिये स्थान ही कहाँ है? कर्म की गति उनके पास जाकर रुक जाती है। मेरे भक्तों को
स्वयमेव ही मेरी प्राप्ति होती है। भक्त जमीन पर पैर रखता है लेकिन वह पैर मैंने रखा ऐसा मन में नहीं सोचता।
सब कुछ करने वाला भगवान है इसी सत्य को मानता है, इसलिये वह कर्म के बन्धन से भी नहीं बँधता। भक्तों
को मेरे सिवा और कहीं गति नहीं है क्योंकि मेरे भक्तों को मेरे ही प्रति एकनिष्ठ प्रीति रहती है। उन भक्तों के
भावार्थ की बातें स्वयं श्रीकृष्ण ने ही स्पष्ट करके बतलायीं। 'न मे भक्तः प्रणश्यति' (गीता ९.३१) ऐसा श्रीकृष्ण
ने अर्जुन से कहा। वही श्रीकृष्ण का बाना है। वह भक्तों को दूसरी गति होने ही नहीं देता। भक्त को शाप देने की
बात सुनकर भगवान उस भक्त का पक्ष लेकर तत्काल उठा और सुदर्शन पीछे लगाकर दुर्वासा को त्रस्त कर
दिया। अकेले अंबरीष के लिये उसने दस गर्भवास भोगे, वह एकनिष्ठ भक्तों को कोई कमी नहीं होने देता। भक्त
का रखवाला श्रीकृष्ण है, यही भक्ति रहस्य की प्रमुख बात है। एकनाथ जनार्दन की शरण में है क्योंकि भक्ति के
लिये भावना ही प्रमुख साधन है। शुद्ध भाव के बिना जो भक्ति होती है, वह ढोंग है, ऐसा समझ लो। जिस प्रकार
अनाज के न सीझने वाले दाने अपक्व रह जाते हैं, उसी प्रकार वह दंभयुक्त भक्ति अपक्व ही रहती है।
'भक्तियोगस्य मद्गतिः' ऐसा मूल श्लोक का पद है। उसे अत्यन्त बढ़ा दिया है, ऐसा श्रोतागण न कहें। 'मद्गति'
इस पद का अर्थ कितना है, कौन जाने ? उसका रहस्य जाननेवाला पुरुष पृथ्वी पर विरला ही होगा। इसलिये
श्रोतागण क्षमा करें। भक्ति मेरी माता है। जिसने प्रेम की धार पिला कर मुझे बड़ा किया और भगवद्जनों में मेरा
महत्त्व बढ़ाया, उस भक्ति का महत्त्व यहाँ बहुत कम ही बताया गया है क्योंकि भगवद्भक्ति की महिमा मैं
अज्ञानी कैसे जान सकता हूँ? मैंने जो वर्णन किया है वह बहुत ही कम है। इसलिये श्रोतागण मुझे क्षमा करें।
भक्ति मेरी सगी माँ है। मैंने अपने तोतले बोलों से, प्रेमवश होकर केवल ग्रन्थों के आधार पर उसके गौरव का

चौबीसवाँ अध्याय ६६३
वर्णन किया है। प्रेम की जाति कैसी होती है? तो वह स्मरण का स्मरण नहीं होने देती। इसलिये उस प्रेम के मूल
हेतु की विस्मृति होकर मुझसे भक्ति का रहस्य कहलवाया। जिस प्रकार माँ अपने बालक को बोलना सिखाती है,
उसी प्रकार यहाँ भक्ति ने मुझे सवाक् बनाया। इसलिये मैं यहाँ दोष किसे दूँ? जो माँ के वात्सल्य लोभ को प्रकट
करे वह मूर्ख है। बल्कि मैंने ही अज्ञानवश गलती की यही सच लगता है। उड़द का काला रंग अपनी जगह है,
उसी प्रकार मैंने यहाँ जो गलती की है उसे गलती ही माना जाय। लेकिन इससे भी गुरुनाथ ने मना किया है
क्योंकि गलती स्वीकार कर मैं कवि या कर्ता बनना चाहता हूँ, यही सिद्ध होता है। लेकिन गुरुनाथ को 'मैंपन'
जरा भी नहीं भाता। कथा परिपूर्ण होने पर भी उस अभिमान से आत्मस्तुति कर मैं 'मैंपन' न लूँ यही लक्षण
बताकर गुरु ने 'मैं' 'तू' पन नष्ट कराया। लेकिन यह भाषण देने वाला भी मैं नहीं ही हूँ। मैं कवि भी नहीं हूँ
और ग्रन्थकर्त्ता भी नहीं हूँ। यह बात गुरु भी जानते हैं। इस पर श्रोताओं ने कहा, कैसा चमत्कार है! भक्तिसुख
का सुखदायी रहस्य—भक्ति परमामृत समुद्र तुमने सचमुच प्रकट कर दिया। भागवत मुख्य रूप से भक्ति प्रधान
है। भक्ति का जो सनातन सुख है, उसे पूर्णरूप से करतलामलकवत् खोल कर प्रकट कर दिया। तुमने यह बहुत
बड़ा उपकार किया है। स्त्रियों और शूद्रों के उद्धार के लिये और संसार को भजनतत्पर बनाने के लिये तुमने
भागवत का सारतत्त्व निकाल दिया है। भागवत का जो गुप्त अमृत है वही भक्तिसुख है, यह तुमने स्पष्ट कर
दिया है। इससे समस्त संतगण प्रसन्न हो उठे और श्रोतागण तृप्त हो गये। श्रीकृष्ण ने ही प्रसन्न होकर तुम्हें अपनी
भक्ति प्रदान की। इसीलिये तुमने भक्ति की कीर्ति का यथार्थ ढंग से वर्णन किया। तुम्हारी भक्ति का प्रत्येक शब्द
ब्रह्मानन्द से भी अधिक गम्भीर है और उसमें भी प्रेम की आर्द्रता होने के कारण ज्ञानानंद का ज्वार आ जाता है।
तुम जब आत्मभक्ति का वर्णन करते हो तो तुम्हारा अंतःकरण प्रेमपूर्ण होकर बहने लगता है। ग्रन्थ की बात भूल
कर तुम भक्ति के माहात्म्य का ही वर्णन कर रहे हो। अपनी ही इच्छा और उत्कंठा से भक्ति के माहात्म्य का
वर्णन करते समय तुम्हें अगला-पिछला कुछ स्मरण नहीं रहता। तुम्हारा अवर्णनीय प्रेम हम जान चुके हैं। जैसे-
जैसे भक्ति का निरूपण आगे बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे तुम्हारा स्फुरण बढ़ने लगता है। भक्तिसुख का निरूपण
होते समय श्रोता और वक्ता दोनों ही उसमें लोलुप हो गये हैं। अमृत प्राशन करते समय तृप्ति की बात कौन
करेगा? लेकिन अब स्फूर्ति को बीच ही मैं रोक कर ग्रन्थार्थ आगे बढ़ायें। संतों का यह वचन सुनकर एकनाथ ने
उन्हें साष्टांग नमस्कार किया और कहा, “अच्छा हुआ, आपने स्मरण दिलाया नहीं तो यह निरूपण समाप्त न
होता।” ‘भक्तियोगस्य मद्भक्ति’ इस पद का अर्थ बताते समय, जिस भक्ति से भगवत्प्राप्ति अत्यन्त सुलभ होती
है, उसका निरूपण किया। यदि यह भगवद्भक्ति न की जाय तो त्रिगुणरूपी डोर से जीवों की अनेक पंक्तियाँ बँध
जाती हैं और संसार में जन्म लेती हैं। उस स्थिति का वर्णन श्रीकृष्ण करते हैं।
मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत्।
गुणप्रवाह एतस्मिन्नुन्मज्जति निमज्जति॥ १५॥
संसार को मुख्य रूप से धारण करने वाला मैं हूँ, ब्रह्मदेव के रूप में उत्पत्ति करने वाला मैं ही हूँ, विष्णु के
रूप में पालन करने वाला मैं ही हूँ और रुद्ररूप से संहार करने वाला भी मैं ही हूँ। ये तीन गुण यही काल की
सत्ता है, वही मैं सचमुच निजकाल हूँ तथा गुण के स्वरूप के अनुसार उत्पन्न करने वाला, पालन करने वाला तथा
संहार करने वाला हूँ। लोगों का वासनाकर्म विचित्र है। वही कालसत्ता का आत्मसूत्र है। उसी से, यह गुणों से
बद्ध चराचर संसार खड़ा है। जीव गुणकर्मों के योग से स्वर्ग प्राप्त करता है, और गुणकर्मों के कारण ही नरक में

६६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पहुँचता है। अनेक प्रकार की योनियों के संकट उसे गुणकर्मों के ही कारण भोगने पड़ते हैं। वह बड़े आनन्द से
स्वर्ग के सुखोपभोग भोग कर तथा महर्जन तपोलोक भोग कर आगे सत्यलोक तक प्रयाण करता है। इसी का
नाम 'उन्मज्जन' है। पशु, पक्षी, स्थावर, वृक्ष, पाषाण, कीट आदि का जन्म लेते-लेते महानरक में अधःपतन
होता है, इसी को 'निमज्जन' कहते हैं। ऊँचाई तक पहुँच कर नीचे गिरना, इस उलटफेर में जिन नानाप्रकार के
जन्म-मरण का भोग भोगना पड़ता है वह प्रकृति पुरुषों का कार्य है। वही जीवबंधन भोगने को बाध्य करता है।
अणुर्बृहत् कृशः स्थूलो यो यो भावः प्रसिध्यति।
सर्वोऽप्युभयसंयुक्तः प्रकृत्या पुरुषेण च॥१६॥
अणु का अर्थ है अत्यन्त सूक्ष्म; बृहत् का अर्थ है अत्यन्त बड़ा; कृश का अर्थ है साधारण; और स्थूल का
अर्थ है पूरी तरह जड़ अवयवों से युक्त, ऐसा जो भी दिखायी देता है, प्रसिद्ध होता है, वह सब प्रकृति और पुरुष
के संयोग से बना है। जो दो पदार्थों के संयोग से बना है, जिसे संसार कहते हैं वह मूर्तिमंत प्रकृतिपुरुषमय ही
है। तीसरा स्वरूप होता ही नहीं है। अब इन दोनों के अलावा जो अवयवरहित है, जहाँ से इन दोनों का भी उद्भव
होता है, वही सर्वत्र सभी दृष्टियों से व्याप्त परब्रह्म देवाधिदेव बता रहे हैं।
यस्तु यस्यादिरन्तश्च स वै मध्यं च तस्य सन्।
विकारो व्यवहारार्थो यथा तैजसपार्थिवाः ॥ १७॥
प्रकृतिपुरुष के साथ जो यह साकार चराचर दिखाई देता है, वह जिस प्रकार आदि और अन्त में नश्वर है,
उसी प्रकार वह मध्य में भी नश्वर है। आभूषण बनाने के पहले जो सुवर्ण होता है वह अलंकार तोड़ने के बाद
भी सुवर्ण ही रहता है और मध्य में भी वही शुद्ध सुवर्ण अलंकार के रूप में सुशोभित रहता है। मिट्टी का
गोकुल बनाने से पहले मिट्टी ही रहती है, और गोकुल तोड़ने के बाद भी शुद्ध मिट्टी ही रहती है। वही मिट्टी
गोकुल के रूप में भी मिट्टी ही रहती है। उसी प्रकार आदि, मध्य और अन्त में अविनाशी ब्रह्मतत्त्व ही रहता है।
तीन गुणों के प्रभाव से विकृत जो यह साकार चराचर दिखायी देता है वह स्वप्न की बातों की ही तरह मायिक
होता है। समस्त विकारों का कारण अविद्या ही है। उन विकारों की सत्यता स्थापित करने में अविद्या ही उजागर
होने लगती है। यह मर्म ज्ञाता जानते हैं किन्तु अज्ञानी लोग इसे न जानकर अविद्या को ही सत्य मानते हैं।
अविद्या अविद्याकत्त्व के कारण मिथ्या है और ब्रह्म अपने ब्रह्मत्व के कारण सदा सम्पन्न है। इसी बात का निरूपण
स्वयं श्रीकृष्ण करते हैं।
यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुतेऽपरम्।
आदिरन्तो यदा यस्य तत् सत्यमभिधीयते ॥ १८ ॥
जिस प्रकार निद्रा के योग से हम स्वप्न से एक से अनेक हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रकृति को अंगीकार
करने के कारण ब्रह्मा से अनेक लोग हो जाते हैं। जिस प्रकार तंतु से करोड़ों वस्त्र बनते हैं, फिर भी करोड़ों वस्त्रों
में तंतु एक जैसा एक ही रहता है; वस्त्र का आदि, मध्य और अन्त देखने पर उसमें तंतु के अतिरिक्त और कोई
भी दूसरी चीज नहीं दिखायी देती उसी प्रकार प्रकृति पुरुषादि सारे लोक परब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं। इसलिये वो
आदि, मध्य और अन्त में एक परब्रह्मस्वरूप के ही हैं। उसमें द्वैत की बात ही नहीं रहती। तंतु वास्तविकता है
किन्तु वस्त्र मायिक है। उसी प्रकार परब्रह्म सत्य और माया झूठी है। उद्धव! जो आदि, मध्य और अन्त में एक

चौबीसवाँ अध्याय ६६५
रहता है वही शुद्ध सत्य है। जिस प्रकार लकड़ी की गुड़िया लकड़ी के ही अवयवों से शोभा देती है उसी प्रकार
ब्रह्म ब्रह्मस्वरूप से एक ही है तथा संसार के रूप में शोभायमान होता है। जिस प्रकार देह एक होकर भी अनेक
प्रकार के अवयवों के कारण भिन्न दिखायी देता है, उसी प्रकार ब्रह्म भी एक ही होने पर भी वह अनेक स्वरूपों
में भासित होता है। जिस प्रकार पानी में ही क्रीड़ा करते हुए पानी तरंगों की अनेक मालिकायें उत्पन्न करता है,
उसी प्रकार परब्रह्म की लीला से ही संसार आदि वस्तु समुदाय प्रकट होता है। तरंगों के आदि, मध्य और अन्त
में जिस प्रकार पानी के रूप में पानी ही रहता है, उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और लय में ब्रह्म ब्रह्मरूप से
अविनाशी रहता है। इसलिये ब्रह्म सत्य है और प्रपंच मिथ्या है यह विचार साधकों के समझने के लिये
कार्यकारणों में अभिन्नभाव है, ऐसा देवाधिदेव ने कहा। कार्य यदि कारण से अभिन्न (एकरूप) है तो फिर ब्रह्म
में माया भिन्न कैसे हुई ? इस शंका के समाधान के लिये ही ब्रह्म स्वयं ही जगद्रूप से परिपूर्ण सजा हुआ है, यह
बता दिया है। ब्रह्म, माया और काल की गति अनादि है, ऐसा कहते हैं लेकिन वह भी तर्कसंगत नहीं है। इसी
उद्देश्य से श्रीकृष्ण बताते हैं।
प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधारः पुरुषः परः।
सतोऽभिव्यञ्जकः कालो ब्रह्म तत्त्रितयं त्वहम्॥१९॥
माया कभी ब्रह्म से अलग नहीं दिखायी देती। वह ब्रह्म के ही आश्रय में बढ़कर गुणों का कार्य बढ़ाती है।
माया का नियंता स्वयं परब्रह्म ही है अतः उसके पास पुरुषत्व है। माया उस पुरुष की अत्यन्त प्रिय है। इसीलिये
उसे प्रकृति कहते हैं। ब्रह्म से पुरुष भिन्न है, यह कहना गलत है। ब्रह्म और पुरुष एक ही के नाम हैं। माया और
प्रकृति ये जो दो नाम हैं, उन दोनों का अर्थ 'माया' ही समझना है। वह माया कुछ अलग ही प्रकार का
अविद्यात्मक कार्य प्रकट करती है, इसलिये उसे 'अविद्या' कहते हैं। यह ध्यान में रखो की माया ब्रह्म की शक्ति
है। लेकिन वह भी ब्रह्म से एकरूप हो चुकी है। वह क्षणार्ध के लिये भी उससे अलग नहीं रहती। वह सदा ब्रह्म
में ही लीन रहती है। शूरों का शौर्य जिस प्रकार शूरों से अलग नहीं होता, उसी प्रकार ब्रह्म में यह मायाशक्ति सदा
एकरूप रहती है। माया ब्रह्म में ही रहती है लेकिन जब तक उसका क्षोभ नहीं होता तब तक वह दृष्टिगोचर नहीं
होती। माया को क्षुब्ध करने वाला काल है। इस काल से ही लोगों की उत्पत्ति होती है। ब्रह्म की सत्ता ही काल
है। वह काल स्वयमेव प्रकृति को क्षुब्ध करता है और उत्पत्ति, स्थिति और लय का दर्शन कराता है। वह काल भी
ब्रह्म से एकरूप है। जिस प्रकार राजा के लड़के को राजा ही वश में रख सकता है उसी प्रकार प्रकृति से जो काल
जन्म लेता है उसे वह अपनी सत्ता से नष्ट करती है। वैचारिक दृष्टि से देखें तो काल और परमात्मा दोनों एकरूप
हैं। इसीलिये प्रकृति, पुरुष और काल में एकरूपता रहती है। ब्रह्म, काल और माया का सम्बन्ध ऐसा है कि ये
तीनों मूलरूप से ही एकरूप हैं। उनमें व्यावहारिक दृष्टि से जो भेद है, वह मिथ्यत्व के कारण असंबद्ध ही है।
ब्रह्म एक ही है। प्रकृति और पुरुष के स्वरूप कालरूप से अलग मालूम होते हैं। यदि उन्हें अखण्डत्व से देखें तो
मैं श्रीकृष्ण परमात्मा ही हूँ। उत्पत्ति से पूर्व पूर्ण ब्रह्म मैं हूँ, उत्पत्ति का आदिकारण जो ब्रह्म है वह मैं हूँ और
स्थिति काल में ब्रह्मरूप में मैं ही हूँ। इस प्रकार मैं स्वयं ही एक में अनेक रूप दिखाता हूँ। अपनी ही लीला से
सृष्टि के अन्त में, प्रलयके बाद मैं परिपूर्ण ब्रह्म ही शेष रहता हूँ। इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं करते हैं।
सर्गः प्रवर्तते पौर्वापर्यण नित्यशः।
महान् गुणविसर्गार्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम्॥२०॥

६६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पिता, पुत्र इस परम्परा से संसार अत्यन्त विशाल बन गया है। यह बिलकुल अखण्ड निरन्तर रहने वाला
तथा अत्यन्त असाध्य रूप में बढ़ा हुआ है। यह कैसे हुआ ? उसके सम्बन्ध में भी श्रीकृष्ण बता रहे हैं। विषयों
की आसक्ति से वृत्ति वासनानिष्ठ हो जाती है और वह देवभावना से अत्यन्त प्रेम से संसार का स्वरूप बढ़ाती है।
जो देहाभिमान उफन रहा होता है, वह उस परब्रह्म में जीवत्व उत्पन्न करता है और नाना प्रकार की योनियों में
जन्म-मरण मुख्य रूप से बढ़ाता रहता है। इस प्रकार ब्रह्मदेव की आयु तक ऐसे ही कायम रहता है और
महाप्रलय के समय सृष्टि का संहार होता है। एक नित्य प्रलय चल रहा है और एक दैनंदिन प्रलय है। उसी
प्रकार एक कर्मजन्य प्रलय होता रहता है और एक अन्य प्रलय होता है। लेकिन इन सारे प्रलयों से अधिक श्रेष्ठ
ब्रह्मप्रलय है। वह सारी सृष्टि का संहार करता है और संसार में कुछ भी शेष नहीं रहने देता। ब्रह्मप्रलय में सृष्टि
का विनाश करना और फिर नये कल्प के प्रारम्भ में सृष्टि की रचना के लिये ऊँच-नीच नाना प्रकार की योनियों
के लिये तैयार करना, इसका क्या तात्पर्य है ? ब्रह्म प्रलय में सृष्टि का विलय अवश्य होता हे लेकिन पूरी तरह
विनाश नहीं होता। वासनारूप बीज कुछ शेष रह जाता है जो अविद्या के अंग में पूर्ण रूप से रच-बस गया होता
है। उसी वासनारूप बीज से कल्प का प्रारम्भ होता है। ब्रह्मदेव के रूप में मैंने स्वयं ही मुझसे अनुग्रह कर वह
सूक्ष्म कारण दिखलाने को बाध्य किया। जिस प्रकार वर्षारृतु में नानाप्रकार की घास बढ़कर शरद ऋतु में अपने
पूर्णत्व पर पहुँचती है और उसके ही बीजकण गर्मियों में पृथ्वी से मिल जाते हैं। वे चारों ओर बिखरे रहते हैं
लेकिन किसी को दिखायी नहीं देते उसी प्रकार प्रलय के अन्त में संसार वासना बीज के रूप में अव्यक्त शेष
रहता है। जिस प्रकार गर्मियों में इधर-उधर बिखरे हुए बीज वर्षाकाल में बारिश होते ही जोर से बढ़ते हैं और
नाना प्रकार की घास पहले की ही तरह बढ़ती रहती है। उसी प्रकार उत्पत्ति काल में सूक्ष्म वासनारूप बीजांकुरों
से अनेक योनियों में चराचर और स्थावर-जंगमात्मक संसार बढ़ता जाता है। ब्रह्मदेव के प्रलय में भी सृष्टि का
पूर्ण रूप से विनाश नहीं होता। इसीलिये संसार अनंत है ऐसा वेदशास्त्रों ने प्रतिपादन किया है। लेकिन इस प्रकार
संसार अनंत होते हुए भी इसका निःशेष विनाश हो सकता है इसी अर्थ का श्लोक का शब्दार्थ श्रीकृष्ण ने
सुनाया। 'ईक्षण' का अर्थ 'सद्गुरु की पूर्ण कृपादृष्टि' है। जिनके योग से ब्रह्मज्ञान प्रकट होता है, वही मेरा
कृपावलोकन है। यदि ब्रह्मज्ञान पूर्ण प्रकट हो जाय तो संसार का अस्तित्व ही मानो समाप्त हो जाता है। फिर ब्रह्म
ही ब्रह्मरूप से, पूर्ण स्वरूप से रहता है। 'मैं' 'तू' की बात समाप्त हो जाती है। फिर ध्रुव मण्डल की बात ही
समाप्त हो जाती है। 'मैं' 'तू' पन खो जाता है, देवता, भक्त और भजन यह भेद नष्ट हो जाता है। सगुण भक्ति
का भान उड़ जाता है और सदा सर्वदा ब्रह्म ही शेष रहता है। प्रपंच नाम की कोई बात भी मिथ्या लगने लगती
है। या आगे कभी होगा ऐसा कल्पांत में भी नहीं घट सकता। यह अत्यन्त प्रलय का लक्षण है, वह भाग्य के
बिना कभी समझ में नहीं आएगा। जिन्हें सचमुच ही सद्गुरुचरणों का लाभ हुआ है, वे भाग्यवान लोग ही उसे
समझ सकते हैं। अत्यन्त प्रलय की गति सबकी समझ में नहीं आती क्योंकि, उद्धव ! वह वास्तव में परमनिर्वाण
की ही गति है। जिसका अहंकार समाप्त हो जाता है, उसकी कल्पना भी निःशेष होती है और उसी को
आत्मस्वरूप का बोध होने के कारण अत्यन्त प्रलय का लाभ होता है। देहावसान होते ही प्रलय हुआ यह कहना
बिलकुल असत्य है। यदि आत्मनिष्ठा हो तो जीवित अवस्था में ही यह प्रलय प्राप्त हो सकता है। जीवित
अवस्था में यह प्रलय हो जाय तो उसके कारण संसार का बीज ही जल जाता है। अब ब्रह्मप्रलय के सम्पूर्ण
लक्षण बताता हूँ, सुनो। ब्रह्माण्ड प्रलय का जो क्रम है, उसमें अन्त में पूर्ण ब्रह्म शेष रहता ही है। उद्धव को जानने
के लिये पुरुषोत्तम यह मर्म बतलाते हैं।

चौबीसवाँ अध्याय ६६७
विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पकः।
पञ्चत्वाय विशेषाय कल्पते भुवनैः सह॥ २१॥
चौदह लोकों के साथ इस प्रचण्ड ब्रह्माण्ड की रचना काल ने कल्पना से की है। उसके अस्तित्व के समय
से ही उसका पालन-पोषण कर उसके विनाश का प्रयत्न भी काल ही करता है। ऐसा वह काल कौन है? यदि
तुम यह प्रश्न पूछते हो तो समझ लो कि उस काल का आत्मा मैं ही हूँ। उसी कालस्वरूप से मैं सृष्टि की ओर
संहार की दृष्टि से देखता हूँ। पंचमहाभूतों के जो भिन्न-भिन्न विभाग हैं, उनकी रक्षा काल ने ही की है। उस सत्ता
को जब मैं समेट लेता हूँ तो पंचमहाभूतों में अफरातफरी व्याप्त हो जाती है। जिस प्रकार उत्पत्ति का क्रम है,
उसी प्रकार प्रलय का भी क्रम है। भूतों में ही भूतों का सहज विलय हो जाता है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
अन्ने प्रलीयते मर्त्यमन्नं धानासु लीयते।
धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते॥ २२॥
प्रलय की दृष्टि से देखें तो अनावृष्टि छा जाती है और सृष्टि में अन्न की कमी हो जाती है, अन्न क्षीण होने
से शरीर भी क्षीण होता है। यहाँ 'अन्नमय प्राण' होता है यह वचन प्रत्यक्ष है ही। अन्न कम होने पर प्राणियों के
प्राण भी निकल जाते हैं। अन्न की बाढ़ रुक जाने से वह स्वयं बीज रूप में ही रहता है। किन्तु उद्धव! वह
तत्काल पृथ्वी में ही एकरूप हो जाता है। इतने में बारह सूर्यों का समुदाय सूर्यमण्डल में एकत्र होता है। वह
पर्वत, पत्थर आदि को भी भस्म कर देता है और घास को भी शेष नहीं रहने देता। उसके कारण सप्त पाताल
तप्त हो जाते हैं और शेष का मस्तक झुलसने लगता है। वह विषाग्नि की ज्वाला उगलने लगता है और उसकी
ज्वाला भड़कने लगती है। शेष के मुख से निकली उस अग्नि से पृथ्वी पर की सभी वस्तुएँ जल जाती हैं।
तत्काल सारा ब्रह्माण्ड जल जाता है और पृथ्वी पूरी तरह भस्म हो जाती है। उस समय पृथ्वी का अस्तित्व समाप्त
हो जाता है और वह केवल गन्धस्वरूप से शेष रहती है। फिर वह गन्ध भी पानी में घुल जाता है, यही बात
श्रीकृष्ण बताते हैं।
अप्सु प्रलीयते गन्ध आपश्च स्वगुणे रसे।
लीयते ज्योतिषि रसो ज्योती रूपे प्रलीयते॥ २३॥
उस समय प्रलय मेघों के विराट समुदाय सूँड़ जैसे विशाल धाराओं से भयानक वृष्टि करते हैं। इस प्रकार
सौ वर्ष तक अखण्ड वर्षा होने के कारण सात समुद्रों का समुदाय एकत्र होता है। चारों ओर जल ही जल एकत्र
हो जाता है और उसमें पृथ्वी का बचा-खुचा अंश गन्ध में घुल जाता है। उस समय चारों ओर एकत्र जल प्रलय
की सार्थकता को सिद्ध करता है। सांवर्तक मेघों की पहचान यह है कि वे प्रलयकाल में सभी समुद्र एकत्र करते
हैं और पृथ्वी को उसमें घोलकर स्वयं भी घुल जाते हैं। उस समय अत्यन्त भीषण सांवर्त अग्नि क्षुब्ध होता है
और वह सभी जगह का पानी सुखाकर केवल रस शेष रखता है। फिर रस के रूप में जो पानी शेष रहता है, वह
भी तेज में विलीन हो जाता है और फिर वही तेज दसों दिशाओं में व्याप्त हो जाता है। उस सांवर्ताग्नि का क्या
वर्णन किया जाय? वह केवल पृथ्वी के जल का शोषण कर शान्त नहीं बैठता, अपितु वह अपनी दाहक शक्ति
को स्वयं जलाता है, जिसके कारण उसे सांवर्ताग्नि यह नाम प्राप्त हुआ है। इतना होने के बाद उसी काल के योग
से जोर की हवा चलती है और वह उस तेज को सोख लेती है। उस तेज का पूरी तरह शोषण हो जाने के बाद,
केवल रूप शेष रह जाता है।

६६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
रूपं वायौ स च स्पर्शे लीयते सोऽपि चाम्बरे।
अम्बरं शब्दतन्मात्र इन्द्रियाणि स्वयोनिषु ॥ २४ ॥
तेज का जो रूप शेष रह जाता है उसका वायु शोषण कर उसे निराकार बना देता है, उस समय चारों ओर
केवल वायु ही भर जाता है। फिर उस चारों ओर भरे हुए वायु को आकाश वहीं निगल लेता है, तब वायु स्पर्श
के रूप में प्रवेश कर केवल स्पर्श के ही रूप में शेष रहता है। वायु के उस शेष बचे हुए स्पर्श स्वरूप का लय
आकाश में तत्काल हो जाता है। फिर आकाश शब्द में प्रवेश करता है और वह शब्दतन्मात्र शेष रहता है। मुट्ठी
बन्द करने पर जिस प्रकार पाँचों उँगलियाँ उसमें लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार दस इन्द्रियों का यह समुदाय जो
राजसगुण से उत्पन्न होता है, वह अपने गुण में जाकर लुप्त हो जाता है।
योनिवैकारिके सौम्य लीयते मनसीश्वरे।
शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभुः ॥ २५ ॥
जो वैकारिक सत्त्वगुण है, वह देवता तथा अंतःकरण भी उत्पन्न करता है। वह भी प्रलय के स्वभाव धर्म
के अनुसार स्वयं मन में प्रवेश करता है। मन सभी इन्द्रियों का राजा है। 'जीवत्व' और 'शिवत्व' भी मन की ही
कल्पना है। श्लोक में वर्णित 'मनसीश्वर' शब्द से श्रीकृष्ण पूर्ण रूप से मन के ही विषय में बोल रहे हैं।
मनोदेवता अंतःकरण के साथ सत्वगुण में प्रविष्ट होती है। कार्य-विशेष का जो कारण होता है वहीं वे जाते हैं।
फिर पहले से बचे हुए शब्दतन्मात्र, तामस में जाकर एकरूप होते हैं। उद्धव! वास्तव में कारण में ही कार्य का
विलय होता है, इसे ध्यान में रखो। तीन गुणों से युक्त अहंकार एकत्र होकर अत्यन्त प्रबल हुआ रहता है। उसकी
महत्ता भी सुन लो। संसार में वह महाकठिन है। वह शिव का महत्त्व बढ़ाता है। जीव को देहात्मा में उलझा देता
है और अहंता से सारे संसार पर मोहिनी डालता है। उसके इस सामर्थ्य के कारण ही उसका महत्त्व है। ऐसा है
अहंकार! वह यदि परमार्थ में सहायक बन जाय तो सोहंभाव (ब्रह्म मैं ही हूँ उस भावना के) के योग से तत्काल
संसार का विनाश कर दे। चोर ही जब विश्वासपात्र मित्र बन जाता है तो वह चोर ही अन्य चोरों का निवारण
करता है। उसी प्रकार जब अभिमान ही सहायक बनता है तो संसारभय की बाधा नहीं होती। उद्धव! इस प्रकार
अभिमान सामर्थ्य सम्पन्न होने के कारण ही मैंने उसकी महत्ता का वर्णन किया। तीन गुणों से उत्पन्न यह
गुणाभिमान, पूर्णरूप से एकत्र होकर महत्तत्त्व में विलीन होता है और उससे एकात्मता प्राप्त करता है।
स लीयते महान् स्वेषु गुणेषु गुणवत्तमः।
तेऽव्यक्तेसम्प्रलीयन्ते तत् काले लीयतेऽव्यये ॥ २६ ॥
इस समय वह महत्तत्त्व भी कारणगुणों में लीन था और गुण साम्य के कारण सचमुच ही अव्यक्त में (मूल
माया में) लीन था। उस समय जब समस्त आकार-विकार नष्ट हो जाते हैं, तब केवल बीज शेष रह जाता है।
उसे ही 'अव्यक्त' कहते हैं। वट का न आकार है न विकार है, न अग्र है, न मूल है, न पत्र है न पुष्प है, अवशेष
केवल बीज रहता है, उसी प्रकार यह संसार अव्यक्त में ही रहता है। वट का यह बीज आँखों को दिखायी भी
नहीं देता। उसी प्रकार संसार का बीज भी अव्यक्त ही रहता है, वह जीव को सरलता से दिखायी नहीं देता।
अनेक प्रकार के तृण के बीज गर्मी में काल जमींदोज कर देता है, उसी प्रकार अव्यक्त रहने वाला संसार बीज
भी काल से एकरूप हो जाता है। देखिये इसी को अव्यक्त का काल में विलय कहते हैं। काल को ही महाबाहु
कहते हैं। उसका विलय पुरुष में होता है।

चौबीसवाँ अध्याय ६६९
कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे।
आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः ॥ २७॥
पुरुष की क्षुब्धावस्था को ही वास्तव में काल कहते हैं। उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय ये तीनों अवस्थाएँ काल
की ही हैं। ये तीनों अवस्थाएँ समाप्त होने पर काल का वहाँ कोई काम नहीं रहता। इसलिये वह स्वाभाविक
व्यापार से ही जीव में एकरूप होता है। जो अचेतन को चेतना देने वाला है और जड़ को सजीव करने वाला है,
उस पुरुष को इसी गुण के कारण 'जीव' कहा गया है। प्रकृति के योग से शुद्ध को ही जीव कहते हैं, उसे ही
'पुरुष' की संज्ञा देते हैं। यदि प्रकृति के बारे में विचार करें तो वह केवल मृगजल की तरह है। वह प्रत्यक्ष
दिखायी देती है लेकिन उसमें 'सत्यता' बिलकुल नहीं है। मृगजल में जो गिरेगा, वहाँ जब 'पानी' है ही नहीं तो
वह डूबेगा कैसे ? उसी प्रकार प्रकृति के न होने पर 'जीवत्व' किससे जुड़ेगा ? समुद्र की ओर देखें तो पानी में
आकाश डूबा हुआ दिखायी देता है लेकिन उसे सच मानना मूर्खता है। उसी प्रकार रूप, नाम, गुण, कर्म यह सब
माया का भ्रम है। उद्धव ! प्रकृति के अस्तित्व काल में भी 'जीवत्व' सत्य नहीं है। उस सम्बन्ध की सत्यता भी
पूर्णरूप से बताता हूँ। जब हम दर्पण में देखते हैं तो वहाँ हम स्वयं देखते हैं। लेकिन फिर भी हम अलग से हैं
ही ऐसा हम समझते हैं। उसी प्रकार उद्धव ! प्रकृति के अनुरोध से कर्म करते समय यद्यपि मैं उसके भीतर
दिखायी देता हूँ, फिर भी मैं प्रकृति से भिन्न हूँ, यह ध्यान में रखो। आकाश पानी में डूबा हुआ दिखायी देता है
फिर भी वह गीला नहीं होता। उसी प्रकार प्रकृति का कर्म मैं भले ही करूँ लेकिन उसमें मेरा अंग लिप्त नहीं
होता। इस प्रकार विचार करने से प्रकृति का ही अभाव हो जाता है और उसके कारण 'जीव' और 'शिव' ये नाम
भी व्यर्थ हो जाते हैं क्योंकि जो 'जीव' है वही परमात्मा है, इसे ध्यान में रखो। 'जीव' का 'जीवत्व' समाप्त होने
पर सहज ही 'शिवत्व' भी समाप्त हो जाता है और दोनों ही आत्मस्वरूप से परिपूर्ण हो जाते हैं। जीव को
आत्मस्वरूप का स्मरण होना इसी का नाम है जीव का परब्रह्म में विलीन हो जाना। वह परमात्मा अजन्मा,
अव्यय, अविनाशी, अद्वय और अनन्त है। ब्रह्म में जब ब्रह्मस्वरूप में ही स्फुरण नहीं होता तो वहाँ 'मैं' और 'तू'
कहेगा कौन ? उद्धव ! उस समय परिपूर्ण परमानन्द ही शेष रहता है। ऐसा परमानन्द कौन है ! जो अज, अव्यय,
आनन्दस्वरूप ऐसा जो श्रीकृष्ण मैं हूँ, वही परमानन्द स्वरूप है, यह जान लो। उस परमानन्द को मेरे सिवा कोई
स्थान ही नहीं है। उद्धव ! और जिस स्वानंद का नाम श्रीकृष्ण है, वही तुम्हारा भी स्वरूप है। उसमें 'मैं' या 'तू'
वाला भाव नहीं है। केवल परमकारण ही शेष रहता है। उद्धव ! तुम्हारे जीव का जो जीव है वह मैं श्रीकृष्ण ही
हूँ। मुझमें और तुझमें कोई अलगाव नहीं है। इसीलिये जीव का परम कारण यह मेरी पहचान मैंने तुम्हें बतायी।
मैं श्रीकृष्ण सारे संसार का आत्मा हूँ और मेरा पूर्ण आत्मा, उद्धव तुम हो। श्रीकृष्ण का यह भाषण सुनकर उद्धव
भौंचक्का हो गया। कृष्ण मुझे अपना आत्मा कहता अवश्य है किन्तु कृष्ण की महिमा भी मैं नहीं जानता।
पुरुषोत्तम की लीला अगाध है। वह हमारी समझ में कैसे आयेगी? व्यर्थ का ही उद्धवपन मुझमें आ गया है।
लेकिन कृष्ण की दृष्टि से देखें तो मुझे मेरा 'मैं' पन नहीं दिखायी देता। मैं अपना उद्धवपन छोड़ दूँ तो कृष्ण
सचमुच निजधाम को चले जायेंगे। वह दुःखद प्रेमावस्था मैं सहन नहीं कर पाऊँगा। उद्धव की यह स्थिति
श्रीकृष्ण की समझ में आ गयी इसलिये उससे सम्बन्धित कथा वह सुनाने लगा।
एवमन्वीक्षमाणस्य कथं वैकल्पिको भ्रमः।
मनसो हृदि तिष्ठेत व्योम्नीवार्कोदये तमः ॥ २८॥

६७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकृति पुरुषों का विवेचन कर मैंने तुम्हें आदि, मध्य और अन्त इन तीनों अवस्थाओं का ऐक्य दिखला
दिया। फिर उनमें व्यर्थ ही भिन्नता क्यों मानते हो ? उत्पत्ति के पूर्व भी पूर्ण ब्रह्म ही रहता है। उत्पत्ति का कारण
वही होता है और यह जो संसार आकार रूप में प्रकट हुआ है, वह भी ब्रह्मस्वरूप ही है, यह भी तुम्हें दिखा
दिया है और प्रलय के अन्त में ब्रह्म जैसा का तैसा शेष रह जाता है, उस सम्बन्ध का अनुभव भी तुम्हें बता
दिया। प्रकृति से पुरुष भिन्न है। प्रकृति को अलग से देखें तो वह मिथ्या है। प्रकृति पुरुष का यह ज्ञान जिसे हो
जाता है उसे 'मैं' और 'तू' पन का आभास नहीं होता। जहाँ 'मैं' पन और 'तू' पन नहीं है, वहाँ विकल्प की
कल्पना कौन करेगा.? सृष्टि के आदि और अन्त में परब्रह्म परिपूर्ण है यह ज्ञान जिसे प्राप्त होता है, प्रकृति पुरुष
का विचार और उनका वह सांख्य दर्शन जिसके मन में जागृत रहता है, उसके मन में हे उद्धव ! कल्पांत में भी
विकल्प की उत्पत्ति नहीं होती। जिसके मन में प्रकृति पुरुषों का विचाररूपी सूर्य पूरी तरह उदित हो चुका है,
वहाँ विकल्परूप अँधेरी रात कैसे रह पायेगी ? जिसे प्रकृतिपुरुष का अत्युत्तम ज्ञान है, उसका मन विकल्प भूल
ही जाता है। उसके अंतःकरण में ज्ञानरूपी सूर्य अज्ञानरात्रि पूर्ण रूप से नष्ट कर उदित होता है। जहाँ का अज्ञान
ही नष्ट हो जाता है वहाँ विकल्प को स्थान कहाँ ? इस प्रकार यह सांख्यतत्त्व विचार साधकों का बहुत उपकार
करने वाला है। उद्धव ! यह सार का भी सार, यह गुप्त ज्ञान का भण्डार, जो विचाररत्नों का समुद्र है, वही सच्चा
सांख्यशास्त्र है।
एष सांख्यविधिः प्रोक्तः संशयग्रन्थिभेदनः ।
प्रतिलोमानुलोमाभ्यां परावरदृशा मया ॥ २९ ॥
मैं विचारों का विचार हूँ मैं सूर्य का आदि सूर्य हूँ। मैं ज्ञानियों का ज्ञानरूपी मुकुटमणि. हूँ, मेरी वह
पूर्णावस्था, वही सांख्य मत है। मैं वेदों का आदिवेद, मैं उपदेश का आद्य उपदेश और मैं आनन्द का आत्मानंद
हूँ। मेरा ज्ञानोपदेश ही सांख्यतत्त्वज्ञान है। उस श्रीकृष्ण ने आत्मज्ञान स्पष्ट कर सांख्ययोग के साधन से अव्यय
होकर ब्रह्म भी दिखला दिया। जिस प्रकार हथेली पर गोल आँवला स्पष्ट रूप से दिखायी देता है, उसी प्रकार
सांख्ययोग के साधन से साक्षात परब्रह्म तुम्हें तुम्हारी आँखों से दिखा दिया। जो आँखों से ब्रह्म देखने जाता है वह
सर्वांग से ही देखने वाला (तन्मय) हो जाता है, यही सांख्ययोग की चाभी है। यह सांख्ययोग अनुक्रम अन्वय
व्यतिरेक से विचार करके देखें तो ब्रह्म अखण्ड तथा अद्वय है यह रहस्य मालूम हो जाता है। उत्पत्ति, स्थिति
अथवा प्रलय में ब्रह्म अखण्ड एवं स्वयं नित्य है, यही ज्ञान साधकों को सच्चे सांख्ययोग से प्राप्त होता है। जिन्हें
ब्रह्मज्ञान का शौक रहता है उनका वह शौक सांख्ययोग पूरा करता है और लिंगदेह के विशाल और प्रबल वृक्ष को
समूल गिरा देता है। लिंगदेह अत्यन्त कठिन अवश्य है, लेकिन जिस प्रकार अग्नि में घास गिर जाय, उसी प्रकार
सांख्य योग के सामने वह भस्म हो जाता है। लिंगदेह नमक का एक प्रचण्ड पर्वत है तो सांख्य प्रलयकाल का
तूफानी समुद्र है। वह समुद्र जब क्षुब्ध होता है तो अपने जल में उस पर्वत को घोल देता है और अपनी ही तरह
सारा पानी एकाकार कर देता है। उद्धव ! यह ज्ञानसागर जब क्षुब्ध होता है तो संशय के लिये कोई स्थान शेष नहीं
रहता। हे उद्धव ! जो ज्ञान सारे संशयों को काटता है, लिंगदेह का भेद करता है, वह सांख्ययोगज्ञान है इसे
निश्चित रूप से जान लो। अनुलोम तथा प्रतिलोम का विवेचन करना कठिन मालूम होगा लेकिन यह विवेचन
किये बिना ही सांख्य सुलभ ढंग से समझ में आ जाय ऐसी युक्ति बताता हूँ, सुनो। विभिन्न आकारों में दिखायी
देने वाले भेद छोड़कर, समस्त प्राणिमात्र में भगवत्स्वरूप ही भरा हुआ है, इस भाव से जो देखेगा उसे समूल

सांख्य प्राप्त होगा। अथवा कर्माचरण जैसा भी हो रहा हो, उसे होने दीजिये। लेकिन मैं कर्ता हूँ, ऐसा मत कहो।
इतना कर देने से ही तुम पूर्णब्रह्म हो जाओगे। इससे अधिक सुलभ मार्ग मुझे नहीं दिखायी देता। उद्धव! तुम्हारे
आत्मकल्याण के लिये मैंने यह कहा। मेरा यही भाषण पूरी तरह मनन कर अपने कल्याण के लिये हम उसका
आचरण अवश्य करें। देवाधिदेव की इन बातों पर उद्धव की भक्ति स्थिर हो गयी। जरा देखिये। निःशेष अहंता
छोड़ देने से मनुष्य स्वयं ब्रह्म हो जाता है। सांख्यज्ञान का विचार करने से दिखायी देता है कि अहंकार ही संसार
को डुबोता है। 'अहं' भाव के साथ ही जन्म-मरण रहता है। अहंभाव के पास भयंकर दुःख भी रहता है। इस
प्रकार अहंभाव नितान्त कठिन है। उसे छोड़ने का प्रयत्न करने पर भी वह स्वयं नहीं छूटता। लेकिन उसके इस
उलझन का कारण क्या है, यह समझ में नहीं आता। यदि भगवान से पूछने जाओ तो उन्होंने सांख्यशास्त्र को
स्पष्ट करके बतला दिया है। इसीलिये श्रीकृष्ण पचीसवें अध्याय में सगुण और निर्गुण इन दोनों प्रकारों से भेद का
मधुर निरूपण करेंगे। वह कथा सुबोध, रसपूर्ण और मधुर है। जहाँ श्रीकृष्ण जैसा सुनानेवाला और उद्धव जैसा
श्रोता हो, वहाँ स्वाद तो निरुपम होगा ही। उस स्वाद के माधुर्य का वर्णन करने के लिये श्रीकृष्ण समर्थ हैं और
उस माधुरी का सेवन करने के लिये अत्यन्त ज्ञानसम्पन्न श्रोता उद्धव उपस्थित हैं। भगवान और भक्त के बीच
संवाद का माधुर्य वेदशास्त्रों से भी नहीं प्राप्त होगा। करोड़ों ग्रन्थों का अवलोकन करने पर भी वह माधुर्य प्राप्त
नहीं होगा। वह माधुर्य तभी प्राप्त होगा जब भाग्य से भावार्थ हाथ लग जाय क्योंकि भावार्थ की चाह से भगवान
अपने अंतःकरण का माधुर्य भक्तों को देता है। सारांश, भगवान को भावार्थ के सिवा और कुछ भी प्रिय नहीं है।
वह भाव ही जिनके पास नहीं है वे केवल मूर्ख और अज्ञानी हैं। जो बालक कंकड़ बिछा कर उन्हें भगवान
कहते हैं, उन बालकों की भक्ति भी धन्य है और वहाँ भी विश्वास करने पर ईश्वर प्रकट होता है। बालक
उपमन्यु जब दूध के लिये भावार्थ से भगवान से हठ करने लगा तो उन्होंने क्षीरसागर को ही कटोरी की तरह
उसके मुँह से लगा दिया। सारांश, जो भाविक है वही भगवान का लाडला होता है और भगवान भी भाविकों का
सेवक होता है। बिना भाव के भगवान कभी किसी से नहीं मिलता। इसलिये जहाँ भावार्थ होता है, वहीं सुख का
लाभ होता है। जहाँ भावार्थ होता है, वहीं परमार्थ भी पूर्णरूप से प्राप्त होता है। इस प्रकार भावार्थ बढ़ाने से
निर्गुण प्राप्ति की इच्छा भी तृप्त होती है। इसी अर्थ का वृतांत श्रीकृष्ण अगले अध्याय में सुनायेंगे। उस कथा के
रसपूर्ण वर्णन के माधुर्य से लोग अमृत की मधुरता भी भूल जायेंगे। श्रीकृष्ण का कथामृत श्रोताओं के श्रवणरूपी
मुख में पड़ेगा। एकनाथस्वरूपी जनार्दन को भी अत्यन्त हर्ष होगा और वह बड़े कौतुक से उसका व्याख्यान
करेंगे। श्रीभागवत ने बड़े सम्मान के साथ श्रीकृष्ण कथा के विस्तार का उत्तम उपहार दिया है और परमार्थरूपी
अलंकार से उसे सुशोभित किया है। उस उपहार के श्रवण के प्रति उत्पन्न सम्मान कर मैं अपने आप्त संत सज्जनों
का गौरव करूँगा। जनार्दन ने एकनाथ पर इतनी कृपा की इसलिये वे अपना सामर्थ्य प्रकट कर रहे हैं। केवल
सम्बन्धी सज्जनों का आदर किया और अन्य लोगों की उपेक्षा की हो ऐसी बात नहीं है। श्री भागवत का जो
ध्यानपूर्वक श्रवण करेगा उसका गौरव परमार्थ से ही होगा। वास्तव में, भावार्थ ही गौरव है। उसे एकनाथस्वरूपी
जनार्दन जानते हैं, इसलिये एकनाथ भी जनार्दन की शरण में जाकर स्वयं ही गौरवान्वित हो रहे हैं।
इति श्रीमद्भागवते एकादश स्कंधे श्री कृष्णोद्धव संवादे एकाकार टीकायां
प्रकृति पुरुष सांख्य योग नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः॥ २४॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु।

पच्चीसवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप निर्गुण देव! तुम्हें नमस्कार है यह कहना चाहें तो गुण कहीं दिखायी नहीं पड़ता और गुण
के बिना निर्गुणपन तो कभी नहीं आयेगा। इसलिये निर्गुणपन कभी नहीं होता। लेकिन सगुणपन भी तुम स्वीकार
नहीं करते। इस प्रकार तुम गुण अथवा अगुण को स्पर्श नहीं करते। इसलिये हे गुरुराया! तुम पूर्णतयः अगुणी हो।
उसी प्रकार तुम अगुणी के विपरीत गुणी हो। लेकिन तुम त्रिगुण के गुणों का विनाश कर देते हो। संसार में
पंचमहाभूतों से मुक्ति दिलानेवाला एक जनार्दन ही है। जिसके योग से दुष्टजनों का संहार होता है, जिसके योग
से लिंगदेह का नाश होता है, जो जीव को जीव से ही जान से मारता है वह जनार्दन कृपालु कैसे होगा? लेकिन
जनार्दन का कृपालुपन लोग बिलकुल नहीं जानते। न समझने का कारण यही है कि वे देहाभिमान नहीं छोड़ते।
जननी के पेट से जन्म होता है इसलिये मनुष्य को 'जन' कहते हैं। उस 'जन' के जन्म का ही संहार करता है,
इसलिये उसे जनार्दन कहते हैं। मृत्यु को ही मारकर आयु बढ़ाता है, जीव को मारकर उसे जीवन प्रदान करता है
और देह में ही विदेह की स्थापना करता है ऐसी जनार्दन की कृपा है। जन जो भी इच्छा करता है, उसे जनार्दन
पूरा करता है। जो पूर्ण समाधान चाहता है, उसका देहाभिमान नष्ट कर डालता है। लेकिन जनार्दन के सामने
अहंकार आया ही कब था? अगर आ जाय तो वह हाथ में शस्त्र लेकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर देगा। जिस
प्रकार सूर्य के प्रकाश से अन्धकार के साथ रात्रि समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार जनार्दन के नाम के सामने
अहंकार कब तक टिक पायेगा? गुरुनाम का घोष होते ही अहंकार पूर्णरूप से विलीन हो जाता है। फिर ऐसे
गुरुनाम के सामने दुःखदायी संसार कब तक टिक पायेगा? इच्छा से जिसके नाम का स्मरण करें तो वह संसार
का बाँध तोड़ डालता है, जीव का जीवबन्धन तोड़ देता है, उसके उस नाम का माधुर्य मोक्ष को भी लज्जित
करता है। जिसका नाम मोक्ष से भी ऊँचा पद दिलाता है उसकी कृपा के बारे में मैं यहाँ क्या कहूँगा? लेकिन वह
नामप्रताप भी जिसकी बराबरी नहीं कर सकता उस सद्गुरु की महिमा हमें किस प्रकार मालूम होगी? निरूपम
को कौन-सी उपमा दी जाय? गुरु की कीर्ति अगाध और गहन है। उसके गुणों की गिनती करना चाहें तो वे
अनंत हैं। वह स्वयं नित्य निर्गुण है। उससे हम क्या लें? यदि दौड़कर उसके पास जाना चाहें तो उसका न कोई
गाँव है न कोई स्थान है। एक सद्भाव के अतिरिक्त उसका लाभ उठाने का अन्य कोई उपाय नहीं है। यदि सद्भाव
से उसका नामस्मरण करें तो उस स्मरण के साथ ही गुरु प्रकट होता है और जिस प्रकार समुद्र स्वयमेव नमक से
मिलने आया और इसलिये सागर को आलिंगन देने के साथ ही जिस प्रकार नमक का पानी हो जाता है, उसी
प्रकार सद्गुरु की पूर्ण कृपा होने पर जन ही जनार्दनस्वरूप हो जाता है। उस समय जन, वन अथवा विजन में
भिन्नता नहीं दिखायी देती। इसलिये जो जन है, वही जनार्दन है और जनार्दन ही सारे जन है। यह उपनिषद् का
सारांश है और यही जनार्दन का सच्चा स्वरूप है। इसी अभेदभाव से यहाँ भगवान ने सांख्यशास्त्र बताया। वह
यही है कि परब्रह्म उत्पत्ति, स्थिति और लय इनमें निरन्तर परिपूर्ण ही रहता है। यह सांख्यमत सुनकर उद्धव मन
ही मन विचार करने लगा कि यदि अहम्भाव ही संसार को बढ़ाता है तो क्यों न उसे छोड़ दिया जाय? लेकिन जो
अहंकार अंतःकरण से चिपका हुआ है उसे छोड़ने जाओ तो वह जल्दी नहीं छूटता। यह बात यदि श्रीकृष्ण से
पूछी जाय तो उसने इसीलिये सांख्य शास्त्र बताया है। समस्त प्राप्ति का रहस्य जो सांख्य है उसी का वर्णन

पच्चीसवाँ अध्याय ६७३
भगवान ने किया है और उसी में अहंभाव छोड़ दिया जाय यह निश्चित किया है। सचमुच, मेरे सामर्थ्य से मेरा
'मैं'पन नहीं जाएगा और निर्लज्ज की तरह श्रीकृष्ण से कितनी बार पूछें? उद्धव के मन की यह चिन्ता श्रीकृष्ण ने
जान ली। श्रीकृष्ण अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त कृपालु होने के कारण वह अहंता नष्ट करने के उपाय बताने
लगा। आज उद्धव का भाग्य पूर्णरूप से प्रकट हो गया। संसार में उद्धव ही अत्यन्त धन्यवाद का पात्र है। जिस
पर श्रीकृष्ण प्रसन्न हो उठा उसे प्रश्न किये बिना ही अपना रहस्य बताने लगा। क्या बालक बताता है कि उसे
भूख लगी है? और तब माँ उसे स्तनपान कराती है? नहीं। वह तो अपने अंतःकरण की व्यथा से स्वयं ही
दौड़कर उसके पास जाती है और उसे स्तनपान कराने लगती है। लेकिन श्रीकृष्ण के मन में उद्धव के प्रति
व्याकुलता उससे कई गुना अधिक थी। अपने भक्तों के भक्ति का महत्त्व मन में आते ही श्रीकृष्ण का अंतःकरण
व्याकुल हो उठता था। बच्चे को अपनी चिन्ता नहीं होती लेकिन माँ ही उसका हित करने की ओर प्रवृत्त होती
है। उसी प्रकार उद्धव का हेतु पूर्ण करने के लिए श्रीकृष्ण व्याकुल थे। उद्धव में जो कोई कमी हो उसे पूरा करने
के लिये श्रीकृष्ण तैयार थे। उसने उसे अपने निर्गुण का उपदेश किया। पचीसवें अध्याय में गुणों पर किस प्रकार
विजय प्राप्त की जाय इसका लक्षण बताकर वह अपना निर्गुण भी दिखला देगा। यही एकनिष्ठा का निरूपण है।
प्रकृति पुरुषों का बुद्धिपूर्वक विचार हो गया लेकिन जब तक गुणों पर विजय नहीं प्राप्त होती तब तक सुख-
दुःख और अहंभाव तो बढ़ेगा ही। तीनों गुणों से देह तैयार हुआ है। इसलिये देह में गुणों की विजय नहीं होती
क्योंकि अपने ही मूल का उच्छेद करने के लिये कोई तैयार नहीं होता। डंडा वृक्ष में ही उत्पन्न होता है लेकिन
वह कुल्हाड़ी के साथ मिलकर उससे वृक्ष का उच्छेद करवाता है। उसी प्रकार विवेक से सद्गुण मिलता है और
तीनों गुणों का समूल उच्छेद कर डालता है। इससे मूल का निर्गुणत्व अपने आप प्रकट होता है। तब गुणों का
छेदन भी मिथ्या ही है। तीनों गुण ही मिथ्या हैं और निर्गुणत्व ही नित्य और सत्य है। इसी अर्थ का निरूपण
श्रीकृष्ण स्वमुख से कर रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
गुणानामसमिश्राणां पुमान् येन यथा भवेत्।
तन्मे पुरुषवर्यैदमुपधारय शंसतः ॥ १ ॥
जिसके चरणस्पर्श से सारी पृथ्वी पवित्र होती है; जिसके नाम से त्रैलोक्य का उद्धार होता है, जिसके गुणों
की कीर्ति श्रवण करने से महापातकों का भी विनाश हो जाता है; जिनके मृदु, मधुर एवं विपुल नाम का उच्चार
करने से परम संतोष होता है, वह पुरुषोत्तम परम प्रीति से उद्धव से बात करने लगा। सत्व, रज और तम ये तीनों
गुण मिले बिना जब भिन्न-भिन्न रहते हैं उस समय पुरुष के पास जो भिन्न-भिन्न एक गुण होता है, उससे कौन-सा
चिह्न दिखायी पड़ता है, उसे सुनें। मेरा यह भाषण जो निःसन्देह, सावधान और निर्विकल्प होकर सुनेगा वह स्वयं
ही परिपूर्ण पुरुषोत्तम हो जायेगा। मेरे स्वरूप के प्रति सद्भावना रखना यही पुरुष की उत्तम अवस्था होगी। मेरे
भाषण पर विश्वास करने से पुरुषोत्तम स्वयं घर पर आते हैं। ऐसा यह उत्तम से उत्तम निरुपम और निर्गुण स्थान
को यदि तुम मुझ पर विश्वास करो तो मैं तुम्हें सौंपता हूँ। उद्धव भक्ति भावार्थ में अत्यन्त श्रेष्ठ, वचन पर विश्वास
करने में तो अग्रगण्य हैं इसलिये श्रीकृष्ण अपने मुख से उसे 'हे पुरुषश्रेष्ठ' कह कर बुलाने लगे। इस संसार में
अनेक योनियाँ हैं। उनमें मनुष्य सबसे उत्तम है। उसमें भी सुदृढ़, अव्यंग, सम्पूर्ण अवयवों से युक्त तथा किसी भी
प्रकार की कोई कमी न हो ऐसा देह होना चाहिये। ऐसे सारे देहों में पुरुष देह ही सबसे श्रेष्ठ हैं। उसमें भी

६७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विचारशील, वेदशास्त्र जानने वाला और मुमुक्षु जैसा पुरुष होना चाहिये और ऐसा पुरुष वेद, शास्त्र, विवेक आदि
में सम्पन्न होकर मेरा भजन भी करता हो और अनन्य भाव से पूरी तरह मेरी शरण में आता हो तो ऐसे भक्तों पर
मेरी पूर्ण कृपा रहती है। मेरी ही कृपा से वह मेरा ज्ञान प्राप्त कर मेरे भजन में रममाण रहता है। ऐसे गुणों के
सम्बन्ध में विचार करने पर, ऐसा सर्वगुणसम्पन्न एक उद्धव ही दिखाई देता है। इसीलिये यदुकुलश्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने
'पुरुषश्रेष्ठ' इस संबोधन से उद्धव पर पुरुषत्व का अभिषेक किया। इस प्रकार उद्धव को सम्बोधित कर, तीन गुणों
का स्वभाव बताते समय श्रीकृष्ण पहले सत्वगुण का प्रतिपादन करने लगा। सत्वगुण के लक्षण अनेक हैं, किन्तु
उनमें से केवल पन्द्रह ही श्रीकृष्ण ने बतलाये। वे लक्षण जो श्रीकृष्ण ने अपने निरूपण में सुनाये, उन्हें सुनें।
शमो दमस्तितिक्षेक्षा तपः सत्यं दया स्मृतिः।
तुष्टिस्त्यागोऽस्पृहा श्रद्धा ह्रीर्दयादिः स्वनिर्वृतिः ॥ २ ॥
बाह्य स्फूर्ति को छोड़ अपनी चित्तवृत्ति अखण्ड आत्मा में केन्द्रित करना इसी का नाम 'शम' है। बाह्य
इन्द्रियों की चड़फड़ का शान्ति से ऐक्य कराकर विषय की इच्छा को काबू में रखना यही दम का सच्चा स्वरूप
है। उद्धव! जितने आनन्द से हम सुख भोगते हैं, उतनी ही संतोषवृत्ति से दुःख भी सहन करना, इसी का नाम
शुद्धसत्वात्मक तितिक्षा है। मैं कौन हूँ? कहाँ का हूँ? मेरा क्या स्वरूप है? मैं निष्कर्म हूँ या कर्मबद्ध हूँ इस
प्रकार आत्मविचार करने का नाम है ईक्षापरिपाक ! जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों स्थितियों में भगवत्प्राप्ति
के लिये अंतःकरण का कुढ़ना इसी का नाम 'तप' है। कोई चाह कर विष प्राशन नहीं करता, उसी प्रकार प्राणांत
होने पर भी जो झूठ नहीं बोलता, सदा सत्य ही बोलता है, यही सात्विक का सत्य है। उद्धव ! जो स्वयं स्वप्न में
भी प्राणिमात्र पर निष्ठुर नहीं होता वही उसकी सच्ची परिपूर्ण भूतदया है, ऐसा समझ लो। मेरा हित किस बात में
है? मैं कौन-सा धर्माचरण करता हूँ? ऐसा जो पूर्वस्मरण है, इसी का नाम स्मृति है। हे संसार के भक्तश्रेष्ठ
उद्धव ! अत्यधिक प्रयास किये बिना जो कुछ भी मिले, उतने से ही अंतःकरण में सुखी रहना, इसी का नाम
आत्मतुष्टि है। उपजीविका के लिये अन्न आदि जो कुछ प्राप्त हुआ हो, उसमें से कुछ सत्पात्र को दान देना तथा
सारी विषयममता छोड़कर रहना इसी का नाम है त्याग। अर्थ और स्वार्थ में इच्छा बढ़ती ही जाती है, धन मिलने
पर तो वह और भी अधिक बढ़ती है। ऐसी इच्छा का यदि मन से ही त्याग कर दिया जाय तो इससे निस्पृहता
बढ़ती है। जहाँ पूर्णरूप से सर्वलक्षणयुक्त निस्पृहता रहती है उसी का नाम दृढ़ वैराग्य है। यही परमार्थ का सच्चा
भाग्य है और इसी के योग से श्रीहरि की प्राप्ति होती है। जो गुरु के वचन पर विश्वास करता है, जो अंतर्बाह्य
उसके ही प्रति समर्पित रहता है, उसकी ही देवब्राह्मणों के प्रति भक्ति जड़ती है और उसके मन में पूर्ण श्रद्धा का
वास रहता है। नरदेह में ही परब्रह्म की प्राप्ति होती है। ऐसा होते हुए भी जो उसके लिये सत्कर्म नहीं करता,
विषय के लिये धर्म-अधर्म का जैसा भी मन चाहे वैसा आचरण करता है, उसकी यह कृति अत्यन्त निंद्य और
लज्जास्पद है। जिससे हमें दुःख होता है वह दूसरे को न दे, बल्कि दुःख के स्थान पर सुख ही दे, यही दया मैं
श्रीकृष्ण वंदनीय मानता हूँ। दूसरे को दुःख न देकर स्वयं सारे प्राणियों को सुख प्रदान करना, इसी का नाम
पारमार्थिक दया है। इसीलिये इसका दूसरी बार उल्लेख किया। जिस प्रकार पहले चीनी खाने के बाद कोई घास
खाये तो वह अच्छी नहीं लगती उसी प्रकार जो विषयों को गौण समझ कर ब्रह्मानंद में निमग्न हो जाता है,
उसकी उस वृत्ति को आत्मनिवृत्ति कहते हैं। कोई भिखारी जब पालकी में बैठता है तो वह अपने पहले के फटे-
पुराने वस्त्र उपेक्षा से फेंक देता है, उसी प्रकार वह विषयों की उपेक्षा कर ब्रह्मसुख को पकड़े रहता है। अन्न कण

पच्चीसवाँ अध्याय ६७५
का विकास भूसे में छिपा रहता है और भूसे के साथ ही वह पुष्ट होता रहता है। लेकिन उसी दाने को प्राप्त करने
के लिये भूसे को छाँट देना पड़ता है। उसी प्रकार ब्रह्मसुख की ही तरह देह का भी मोह होता है, लेकिन वही
ब्रह्मसुख जब हाथ तक पहुँचता है तो देह का विषयरूपी भूत खराब लगने लगता है। उसी प्रकार विषय प्रेम
छोड़कर जिसे ब्रह्मसुख में सुखप्राप्ति होती है, उसे ही हे उद्धव! सच्ची 'आत्मनिवृत्ति' कहते हैं। इन पन्द्रह
लक्षणों की स्थिति जिसमें रहती है, वही शुद्ध सत्त्व की मूर्ति है। अब 'आदि' शब्द से शोधित सत्त्व की सत्त्वृत्ती
भी श्रीकृष्ण बताते हैं। समस्त प्राणीमात्र के प्रति भगवान की भावना रखकर उनके प्रति निष्कपट बुद्धि रखना
इसी का नाम है सारे गुणों की अवस्था का छेदन करने वाली शुद्ध सात्त्विकता। इस प्रकार सात्त्विक के पास
सत्त्वगुण पूर्णरूप से रहता है। अब रज का लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
काम ईहा मदस्तृष्णा स्तम्भ आशीर्भिदा सुखम्।
मदोत्साहो यशः प्रीतिर्हास्यं वीर्यं बलोद्यमः ॥ ३ ॥
काम का अर्थ है विषयों की हवस। जिस प्रकार काष्ठ आदि से अग्नि बढ़ता है उसी प्रकार काम की इच्छा
पूरी करते-करते काम की हवस भी बढ़ती जाती है। इसका नाम काम है। काम की जो क्रिया हे, वही पूर्ण ईर्षा
है। सम्पादित विद्या का अत्यन्त गर्व होना ही मद का लक्षण है। अर्थप्राप्ति होने पर भी वासना की तृप्ति नहीं
होती। ऐसी निरन्तर बढ़ती जाने वाली आसक्ति का ही वास्तविक नाम तृष्णा है। उद्धव! अत्यन्त अहंकार से जो
स्तब्धता आती है, आँखों के सामने कोई दिखायी नहीं देता, इसी का नाम स्तंभावस्था है। पैसा प्राप्त करने के
लिये इष्टदेवता की प्रार्थना करना और उसके पास प्रापंचिक सुख माँगना इसी का नाम आशा है। भिदा का अर्थ
है, भेद। प्रपंच का भान होना और 'यह मेरा' और 'यह तेरा' इस भाषण का नाम भिदा है। राजस सुख की एक
बात अद्भुत है। वह यह कि विषयसुख के जो सारे भोग हैं उसे ही लोग उत्तम सुख मानते हैं। वीर को युद्ध में
वीरश्री का संचार होना अथवा साधारण मनुष्य का पुत्रप्राप्ति के कारण उत्साहित होना अथवा परिवारजनों के
विवाह आदि समारोहों में इष्टमित्रों का उत्साहित होना, इसे 'महोत्साह' कहते हैं। शास्त्रवाद में विजयी होना
अथवा युद्ध में शत्रु को पराजित करना और इससे लौकिक दृष्टि से प्रसिद्ध होना, इसी का नाम यश है। उद्धव!
चारणों के माध्यम से अपनी यशगाथा का दिगंत में प्रसार करना इसी का नाम यशःप्रीति है। उद्धव! कविताबद्ध
भाषण सुनकर, अथवा उपहास से विनोद चलता देख राजस को हँसी आ जाती है। वह 'हास्य' प्रसिद्ध ही है।
वीर्य अर्थात् अत्यन्त प्रबल शरीर-सामर्थ्य का प्रदर्शन, इसी का नाम वीर्यशाली होना है। राजा के बल पर व्यापार
करना, सीनाजोरी का व्यवहार करना, न्याय को छोड़ स्वार्थ साधना, इसी का नाम 'बलोध्यम्' अर्थात् सीनाजोरी
है। जिसके पास ये सभी पन्द्रह लक्षण हों, उसे जीवभाव से 'राजस' समझना चाहिये। जो केवल अविचार की
ही सम्पत्ति है, उसे 'तामस' की वृत्ति समझना चाहिये। सोलह लक्षणों में उसकी स्थिति बताता हूँ।
क्रोधो लोभोऽनृतं हिंसा याच्ञा दम्भः क्लमः कलिः।
शोकमोहौ विषादार्ती निद्राऽऽशा भीरनुद्यमः ॥ ४ ॥
क्रोध काम की परिपूर्ण तथा बढ़ी हुई स्थिति लोभ का अर्थ है कंजूसी। अमृत का अर्थ है मिथ्या भाषण।
हिंसा का अर्थ है, दूसरे को पीड़ा पहुँचाना। याच्ञा का अर्थ है जी हुजुरी करना। दंभ का अर्थ है अतिसम्मान प्राप्त
करने के लिये किया हुआ ढोंग। वलम का अर्थ है अत्यन्त परिश्रम के कारण आने वाली थकावट और बिना
किसी कारण के झगड़ा-बखेड़ा करने का अर्थ है कलि। शोक का अर्थ है हाहाकार। मोह का अर्थ है भ्रम की

६७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बाढ़। विषाद का अर्थ है ऐसे दुःख का संचार जिससे अंतःकरण को कष्ट हो। 'आर्ति' का अर्थ है, अत्यन्त
संताप। निन्दा का अर्थ है मिथ्या आरोप लगाना। आशा का अर्थ है अत्यन्त लोभ। भी का अर्थ है भय से शरीर
काँपना। अब निद्रा का मर्म सुनो। जो आलस्य का मायका है और जो असली लम्बी सुस्ती है, वही असीम
तामसी निद्रा है। सारे उद्योग त्याग कर सुखी रहना इसी का नाम 'अनुद्यम' है। 'तम' इसी में सुखपूर्वक रहता है।
इस तमोगुण की सोलह कलाएँ हैं। वे जिस व्यक्ति के शरीर में बसती हैं, वही उस तमोगुणी रात्रि का चन्द्रमा है।
वह तामस पुरुष अविचार से अन्धा हुआ रहता है। सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणों से परिचित कराने के लिये
उनका अलग-अलग वर्णन किया। अब उनके मिले-जुले लक्षण सुनो।
सत्त्वस्य रजश्चैतास्तमसश्चानुपूर्वशः।
वृत्तयो वर्णितप्रायाः संनिपातमथो शृणु॥५॥
तीन गुणों की स्थिति तुम्हें बतायी। प्रत्येक की अनंत वृत्ति है। वे भी अनंत प्रकार की होती हैं। इसीलिये
जीव को यहाँ गुणों की उलझन में फँसना पड़ता है। स्त्रियों के माथे पर केश एक-दूसरे में उलझे रहते हैं लेकिन
वे स्वयं उन्हें नहीं छुड़ा पातीं, उसी प्रकार यह त्रिगुणों की उलझन जीव नहीं छुड़ा पाता। सहेलियाँ, माँ, बहनें
एक साथ मिलकर तेल और कंघी लेकर उन उलझे बालों को छुड़ाने का प्रयत्न करती हैं, उसी प्रकार यह जीव
त्रिगुणों की चोटी है। यदि जीव के सामर्थ्य से ही त्रिगुणों के विभाग होते तो वह जीव शुद्ध सत्त्व में रहकर, बाद
में गुणातीत अवस्था में गया होता। लेकिन अपने ही इन गुणों को सुलझाना जीव के लिये संभव नहीं है इसलिये
जो भाग्यवान हैं वे गुरुचरणों पर ही एकनिष्ठ भक्ति रखते हैं। जो संसार में भाग्य से भाग्यवान बनते हैं, सद्गुरु
ही जिनकी वास्तविक माँ रहती है वे सद्गुरु विवेक वैराग्य की कंघी लेकर त्रिगुणों की चोटी सुलझाते हैं।
जिनके गुणों की उलझन एक बार सुलझ जाती है वे फिर कभी उलझन पैदा न हो इसलिये गुणों का समूल मुंडन
कर उन्हें संन्यासी बना देते हैं। कुछ का तो और ही चमत्कार होता है। उनके वैराग्य की स्थिति अत्यन्त प्रखर
होती है। वे उलझन छुड़ाने के फेर में फँसते ही नहीं। वे समूल पूरा मुण्डन करा देते हैं। विवेकरूपी कंघी जब
वैराग्यबल से चलने लगती है तो जब भक्तिबल में दुर्बल होते हैं वे बीच ही में उठकर भाग जाते हैं। ऐसे दुर्बल
लोगों को दूर भागते हुए देखने पर कितने ही अन्य लोग मोहरूपी अँधेरे में ही दौड़ने लगते हैं। कुछ तो केशों की
उलझन माथे पर वैसे ही रखकर उस उलझन में ही फँसे रहते हैं। कुछ जो बिल्कुल ही अभागे होते हैं उनकी
गुरु माँ से कभी भेंट ही नहीं होती। संसार में ऐसे अनेक बच्चे त्रिगुणों से उत्पन्न होने वाले दुःख भोगते रहते हैं।
जिनकी आयु दो परार्ध से भी अधिक है ऐसे ब्रह्मदेव भी गुणों के विभाग नहीं कर पाते। फिर गुणों का सच्चा
चयन करने का सामर्थ्य औरों में कैसे होगा? त्रिगुणों की ऐसी वृत्तियों का वर्णन मैं भी पूरी तरह नहीं कर पाता।
अतः वैसा ध्वनितार्थ निकलने वाले शब्दों में संक्षेप में वर्णन किया।
संनिपातस्त्वहमिति ममेत्युद्धव या मतिः।
व्यवहारः संनिपातो मनोमात्रेन्द्रियासुभिः ॥६॥
गुणसन्निपात का यह प्रकार है कि एक ही अहंकार गुणों की संगति से तीन प्रकार का हो जाता है। उसके
सम्बन्ध में भी सुनो। वर्णाश्रम के अनुसार व्यवहार करना, वेदाज्ञा का पालन अवश्य करना और मैं ही ज्ञानस्वरूप
आत्मा हूँ यह मानना, यह अहंकार सात्त्विक है। मैं स्वधर्म कर्म करने वाला, मैं स्वर्गादि सुखों का भोग करने
वाला, नानाप्रकार के सुख विलास मुझे ही प्राप्त होते हैं, यह समझना राजस अहंता का लक्षण है। मैं देहधारी

पच्चीसवाँ अध्याय ६७७
महान योद्धा हूँ, मैं ही शत्रु का संहारकर्त्ता हूँ, मैं सब में अजेय हूँ, यह समझना तामस अहंकार है। ममता का
स्फुरण गुणानुरूप तीन प्रकार के स्वरूपों से होता है। इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं। 'मेरे
हृदय में जो भगवान है, वही भगवान सभी प्राणियों के हृदय में है। समस्त प्राणी मेरे ही हैं' ऐसा समझना यही
शुद्ध सात्विक गुण की ममता है। उद्धव ! जो भक्त संत, साधु, सज्जन हैं, वही मेरे सगे सम्बन्धी हैं ऐसी जो पूर्व
ममता होती है वही सात्विक ममता है, यह जान लो। जीव से अधिक प्रेम सद्गुरुचरणों पर करना यह जो ममता
का प्रकार है वह भी सात्विक ही है। जिस देवता की उपासना करनी हो उसके अनुसार शैव अथवा वैष्णव की
दीक्षा लेना अथवा देवधर्मों पर परिपूर्ण ममता रखना, यह भी सात्विक ममता ही है। शैव अथवा वैष्णव धर्म पर
ढोंग न कर उस पर इच्छा रहित ममता रखना यह सात्त्विक ममता है। अब राजस की स्थिति सुनो। निवृत्ति मार्ग
को मिथ्या समझना, केवल लौकिक भाग को ही मानना, लौकिक में मान-सम्मान की इच्छा रखना, ऐसी ममता
राजसी है। प्रपंच से प्रेम रखना, लौकिक में चाह होना, नामरूप का झंडा फहराना, यह सच्ची राजसी ममता है।
पत्नी, बच्चे मेरे हैं, शरीर संबंधी आप्तजन एवं परिवारजन को अपना समझना, धन का लोभ करना, ऐसी बुद्धि
को राजस समझना चाहिये। जिन देवताओं की भक्ति करने से नाम, रूप और धन प्राप्त होता है, वे देवता अच्छे
लगते हैं ऐसी ममता रजोगुणी है। काम्यकर्मों की चाह रखना, सकाम कर्म करने वालों को अपना समझना,
स्वर्गादि विषय सुख को सच्चा मानना यह ममता राजस है। रजोगुण की यह ममता मैंने तुम्हें यथार्थ रीति से
समझायी। अब तमोगुण का जो स्वरूप है उसकी व्यवस्था भी बताता हूँ, सुनो। जो अपने देह का अपमान करता
है अथवा जो पूर्वजों से द्वेष करता है, उनके बाल-बच्चों से बैर करता है उसकी वह निष्ठुर बुद्धि तामस है। आगे
बच्चों के भी बच्चों से जो हमारी जमीन जायदाद की देखभाल कर अपनी उपजीविका चलायेंगे उनसे तामसी बैर
करता है, ऐसे मेरे पूर्व के शत्रुओं को मैं जान से मारूँगा और इसके लिये जारण मारण अभिचार कर्म करता है,
उसकी ममता सचमुच तामसी है। अभिचार कर्म का मंत्र जानने वालों को वह अपना इष्ट और सगा समझता है,
शाकिनी, डाकिनी आदि की उपासना करता है, यह पूर्णरूप से तामसी ममता है। यह वर्णन पर्याप्त हो गया।
प्रत्येक गुण में अनेक शक्ति है। ये तीनों गुण जहाँ मिल जाते हैं उसे 'सन्निपात वृत्ति' कहते हैं। कफ, वात और
पित्त जहाँ एकत्र होते हैं, वही सन्निपात उत्पन्न होता है। उसी प्रकार यहाँ भी तीन गुणों का सन्निपात होता है।
संकल्प विकल्पात्मक मन, पंचविषय, पंचप्राण आदि दशेन्द्रियों का सम्पूर्ण व्यवहार इसी में तीन गुणों का
सन्निपात होता है। उसी सन्निपात का निरूपण अर्थात् तीन गुणों का मिश्र लक्षण-जिसे मिश्रगुण सन्निपात कहते
हैं- उसे श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
धर्मे चार्थे च कामे च यदासौ परिनिष्ठतः।
गुणानां संनिकर्षोऽयं श्रद्धारतिधनावहः ॥७॥
पुरुष में क्षण-प्रतिक्षण, क्रिया, कर्म, स्वधर्म, काम धन प्राप्त करने का उद्योग जैसी भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों
का उद्भव होना, यही त्रिगुणों का सन्निपात है। गुणों का यह मिश्रण क्या करता है ? तो इन तीन गुणों से धर्म तीन
प्रकार का होता है, काम तीन प्रकार को होकर रहता है और अर्थ, स्वार्थ और निर्वाह ये भी तीन प्रकार के हो
जाते हैं। इसमें कर्म का दोष नहीं है। दोष कर्त्ता की बुद्धि में होता है। वह जो कुछ भी कल्पना करता है, उसका
फल स्वयं भोगता है। सुवर्ण अपने सोने के रूप में ही सम्माननीय है, यदि उसका श्वान बना दिया जाय तो वह
उसका उपहास होगा। उसी प्रकार स्वकर्म गुणबुद्धि से दूषित होता है। भूमि मूलतः शुद्ध है। उसमें जैसा बीज