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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 695, कुल 869 में से

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पृष्ठ 695

पच्चीसवाँ अध्याय ६७९
जिसकी रुचि नहीं होती, अधर्मप्रवृत्ति ही अच्छी लगती है, क्रोध और लोभ ने जिसका उत्साह निगल लिया रहता
है, वह सचमुच तामस है, ऐसा समझ लो। इस प्रकार पुरुष का कर्माचरण देखकर उसका लक्षण पहचानना चाहिये।
इसका नाम है अनुमान। विचारशील पुरुष इसे जानते हैं। सामान्य ढंग से इन तीनों गुणों का निरूपण किया। लेकिन
यदि यह भी समझ में न आ रहा हो तो उन्हीं गुणों की भिन्न-भिन्न वृत्तियों का श्रवण करो।
यदा भजति मां भक्त्या निरपेक्षः स्वकर्मभिः।
तं सत्त्वप्रकृतिं विद्यात् पुरुषं स्त्रियमेव वा॥१०॥
स्वकर्म का आचरण करते समय फल की इच्छा करना यही माया का परदा है लेकिन जो फल की आशा
छोड़, मुझसे मत्स्वरूप होकर मेरे ही भजन में निमग्न रहते हैं, फल की आशा छोड़ स्वधर्म से ही मेरा भजन
करते हैं, फिर वे पुरुष हों या स्त्री हों उन्हें सत्त्वगुण सम्पन्न समझना चाहिये। देह के अवयवों का जो स्वरूप होता
है उसके अनुसार उसे स्त्री या पुरुष यह नाम प्राप्त होता है। लेकिन स्त्री-पुरुषों में आत्मा या आत्मी यह भेद नहीं
होता। उनमें जीवभाव एक ही जैसा होता है। चित्त को एकाग्र कर जिस क्रिया का आचरण होता है, उसका नाम
है कर्म। उसमें निरपेक्ष दृष्टि से मेरा भजन करना यही सम्पूर्ण स्वधर्म है। यहाँ ऐसी आशंका उत्पन्न होती है कि
यदि कर्म करते समय फल की आशा बढ़ती चली जाय तो उस फल का भोग भोगना पड़ता है। फिर ऐसे स्वकर्म
से भक्ति कैसे होगी ? अर्थात् वह फल अत्यन्त खराब है। कर्म करने पर उसका फल बाधक होता है और न करने
पर नरक भोगना पड़ता है। इस प्रकार इस संसार में कर्म से ही लोग बँधे हुए हैं। जो जीव स्वतंत्र था, उसे कर्म ने
ही पराधीन किया। इस कर्म का चरित्र इतना विचित्र और अत्यन्त बाधक है। तब स्वकर्म से ही भक्ति किस
प्रकार सम्भव है ? इस शंका के उत्तर के रूप में भगवान उसका ही प्रकार बताते हैं यदि दौड़ कर सर्प का मुँह
पकड़ा जाय तो वह पूरे शरीर को घेर लेता है और उससे बचने के लिये यदि उसका मुँह छोड़ दें तो वह दंश कर
अपने प्रखर विष से प्राणनाश कर देता है। उस सर्प दंश का निवारण जिस प्रकार मंत्रवादी अथवा मदारी करता
है, उसी प्रकार कर्म में ही उत्पन्न कर्म की बाधा गुरुराज तत्काल नष्ट कर देता है। सद्गुरु की शरण जाने से वह
सारा कर्म ब्रह्मार्पण करा देता है और उद्धव! निष्काम बुद्धि से भगवत्सेवा करने का यही सच्चा लक्षण है, यह
जान लो। ब्रह्म ही कर्म का प्रकाशक है अतः सारा कर्म ब्रह्मात्मक ही है। ऐसी भावना धारण करना यही सचमुच
मुझे कर्म अर्पण करना है। इसी ढंग से मेरा भजन करना चाहिये। सारी इन्द्रियों में ज्ञान की स्फूर्ति होना, यही
ब्रह्मा की ब्रह्मशक्ति है। ऐसे निश्चय से कर्म का आचरण करना, इसी का नाम स्वकर्म भक्ति है। इस प्रकार के
स्वकर्म से स्वाभाविक रूप से जो भक्त मेरा भजन करते हैं वे सारे लोग हे उद्धव! शुद्ध सात्त्विक हैं, ऐसा
निश्चयपूर्वक समझो। जो लोग स्वधर्म को पूरी तरह निष्फल मानते हैं, वे केवल मूर्ख हैं। स्वधर्म ही चित्त के
मैल को स्वच्छ करता है और सारे कर्मों को समूल नष्ट करता है। स्वधर्म से होने वाले ऐसे लाभ को छोड़ जो
लोग विषय माधुरी की इच्छा करते हैं वे बेचारे राजस हैं। वे विषयसुख में ही पागल दिखायी देते हैं। विषय फल
की इच्छा करने से उसके लिये देह धारण करना पड़ता है और देहधारण करना दुःखदायी होने के कारण उसके
योग से स्वर्ग, नरक आदि फल भोगने पड़ते हैं। इस प्रकार संसार में राजस और तामस प्रकृति दुःखदायक ही है।
उन दोनों प्रकारों की गुणवृत्ति सुनो। तुम्हें स्पष्ट करके बताता हूँ।
यदा आशिष आशास्य मां भजेत स्वकर्मभिः।
तं रजःप्रकृतिं विद्याद्धिंसामाशास्य तामसम्॥११॥