श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीभगवानुवाच
मल्लक्षणमिमं कायं लब्ध्वा मद्धर्म आस्थितः ।
आनंदंपरमात्मानमात्मस्थं समुपैति माम् ॥ १ ॥
ब्रह्म को पूरी तरह जानना यही इस नरदेह का प्रमुख कर्तव्य है। वह यह मानव शरीर तीनों लोकों में पवित्र
है। इस मनुष्य देह को पा कर अधर्म करने से परब्रह्म हाथ नहीं लगता। इसलिये जो परम पावन भागवत धर्म है,
उसका आचरण करना चाहिये। भागवत धर्म के अनुसार भक्ति करने से चित्तवृत्ति निर्मल होती है और जीव ही
ब्रह्म है यह ज्ञान निश्चयपूर्वक मन में अंकित हो जाता है। ब्रह्मस्फूर्ति मन में अंकित होते ही, उससे साधक
परमानन्द में लीन हो जाते हैं। यही मेरी सच्ची प्राप्ति है। मेरी प्राप्ति होने का लक्षण है, प्रत्यक्ष देह में होते हुए भी
विषय का बिलकुल स्मरण न होना। उसी का निरूपण श्रीकृष्ण करते हैं।
गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया ।
गुणेषु मायामात्रेषु दृश्यमानेष्ववस्तुतः ।
वर्तमानोऽपि न पुमान् युज्यतेऽवस्तुभिर्गुणैः ॥ २ ॥
जो मूल अज्ञान की खान है, जो संसार प्रवाह की पंक्ति है, जो तीन गुणों की माँ है, वह अनादि मायारानी
है। अरे देखो! इस मायागुणों के योग से सोलह कलाओं युक्त (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच विषय और
मन को मिलाकर कुल सोलह) वासनात्मक लिंगदेह, वही जीव से चिपक कर बैठ जाता है। जिस लिंगदोह के
कारण ही वह जीव नानाप्रकार के सुख-दुःख भोगता है, स्वर्ग-नरक के भवँरे में फँसता है और मिथ्या जन्म-
मरण के फेरों को सहता है, वह संसार जीव के लिये बाँझ के बच्चे के गृहस्थाश्रम जैसा है। देहाभिमान ने उसे
अपार तथा असीम बढ़ाया है। परन्तु गुरुपदेश के कारण ज्ञान का अनुभव आने पर माया का अभाव होता है,
लिंगदेह मिथ्या लगने लगता है और जीव का जीवत्व भी मिथ्या लगने लगता है। जिस प्रकार सूर्योदय होते ही
अन्धकार के साथ रात्रि समाप्त होती है, उसी प्रकार गुरुपदेश से ज्ञानप्राप्ति होने पर माया का स्वरूप धुँधला पड़ने
लगता है। इस प्रकार गुणों का विकार नष्ट होने पर पुरुष जीवन्मुक्त होता है। जिस प्रकार कुम्हार का पहिया पूर्व
प्राप्त गति से घूमता रहता है, उसी प्रकार पूर्वप्रारब्ध की बची हुई वृत्ति से ज्ञाता भी अपने देह में विचरण करते
रहते हैं। लेकिन इस प्रकार देह में विचरण करते हुए भी उन्हें देह का अभिमान नहीं होता। जिस प्रकार यदि कोई
अपनी छाया को कष्ट दे अथवा उसकी पूजा करे तो किसी को उसमें रुचि नहीं होती, उसी प्रकार ज्ञाता को भी
देह के विचरण में कोई रुचि नहीं होती। वह भले ही देह के ही भाग्य से विषयों में लिप्त हो, लेकिन उसकी
वृत्ति उस विकार के साथ मलिन नहीं होती। उसके लिये विषयों का दर्शन पूर्णतया मिथ्या रहता है। मृगजल पीने
से किसी के हाथ गीले नहीं होते। यदि आकाशकमल के मकरंद और सुवास का सेवन भ्रमर करेगा तभी ज्ञाता के
शरीर को विषय का स्पर्श होगा। अस्तु। मुक्तों की स्थिति अतर्क्य है। किन्तु श्रीकृष्ण मुमुक्षुओं को आत्मप्राप्ति के
लिये उससे सम्बन्धित नियम बता रहे हैं।
सङ्गं न कुर्यादसतां शिश्नोदरतृपां क्वचित् ।
तस्यानुगस्तमस्यन्धे पतत्यन्धानुगान्धवत् ॥ ३ ॥
कामविषय भोग तथा उदरभरण इसी में आसक्त होकर, स्वधर्म का त्याग कर अधर्म में मग्न रहने वाले जो