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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 696, कुल 869 में से

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पृष्ठ 696

६८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वधर्म का आचरण कर जो नाना प्रकार के फलों की इच्छा करता है, वह उसका कर्म काम्य है, यह जान
लो। उसे राजस धर्म कहते हैं। जो अंतःकरण में अत्यन्त लोभी होता है वह जो भी कर्म-धर्म-आचरण करता है
वह सब लोभवश ही होता है क्योंकि उस कर्म का फल मिले यही उद्देश्य रहता है। कर्म के मूल स्वरूप में
काम्यत्व बिलकुल नहीं होता। कामना उस कर्म को काम्य बनाती है। सुवर्ण वास्तव में अपने मूल स्वरूप में स्थिर
रहता है किन्तु हम बड़े परिश्रम से उसके अलंकार बनाते हैं। उसी प्रकार स्वकर्म स्वभाव से पवित्र ही है। स्वधर्म
से मेरा शुद्ध भजन घटता है लेकिन उसमें फल की इच्छा कर हम स्वयं ही उसे काम्य बना देते हैं। फल की इच्छा
से मेरी जो उपासना की जाती है, वह मेरा भजन नहीं बल्कि केवल मेरे फल का भजन है। इस प्रकार जो सकाम
स्वधर्माचरण किया जाता है, वह प्रकृति राजस है यह मान लो। इस प्रकार की प्रकृति का खेल जहाँ दिखायी दे,
फिर वह स्त्री हो या पुरुष हो, वे सारे लोग राजस हैं, यह समझ लो। अब तामस की गुणवृत्ति सुनो। अंतःकरण
क्रोध से भरा होता है और उसी से उसका स्वधर्माचरण होता है इसलिये वह अपने शत्रु के लिये मृत्यु के फल की
ही इच्छा करता है। वह प्रकृति तामस है। जिसके अंतःकरण में द्वेष ने घर बनाया होता है, जिसके मन में असीम
क्रोध रहता है, जो प्राणिमात्र के प्रति निष्ठुर होता है, जिसकी प्रकृति सदा क्रूर रहती है, ऐसे स्वभाव का पुरुष हो
या स्त्री हो, उद्धव! वे लोग संसार में तामसी हैं यह निश्चयपूर्वक जान लो। देखो, "जीव यदि स्वरूपतः ब्रह्म ही
है, तो फिर भगवान उसे 'मेरी (भगवान की) भक्ति करो' ऐसा क्यों कहते हैं ? जीव ही सेवक क्यों बन गया ?
और भगवान ही 'सेव्य' (जिसकी सेवा की जाती है) कैसे बन गया ?'' यह शंका नष्ट हो इसलिये श्रीकृष्ण इसी
अर्थ का निरूपण करते हैं कि यह सेव्य-सेवक भाव गुण सम्बन्धों के कारण उत्पन्न हुआ है।
सत्वं रजस्तम इति गुणा जीवस्य नैव मे।
चित्तजा यैस्तु भूतानां सज्जमानो निबध्यते ॥ १२ ॥
जिस प्रकार छाया देह के साथ बँधी न होने पर भी सदा देह के साथ ही रहती है, उसी प्रकार माया
भगवान के अधीन रहकर, उसे स्पर्श किये बिना ही वह अपने साथ चलाता रहता है। सचमुच माया को साथ
चलाने वाला और उसे अदृश्य करने वाला प्रभु भगवान ही है। लेकिन वेद उसे ही माया का नियंता कहते हैं।
सूर्य अँधेरे को नष्ट करता है, किन्तु वह अँधेरा जिस प्रकार उसके सामने कभी नहीं आता, उसी प्रकार माया का
नियंता यद्यपि हरी है, फिर भी माया भगवान को नहीं दिखायी देती। मेरा केवल देखना यही माया का मुख्य
लक्षण है। मेरे पास माया अपने गुणाभिमान के साथ नहीं रहती। माया में प्रतिबिम्बित जो चैतन्य होता है उसे ही
जीवत्व कहते हैं। तीन गुणों ने उसे देह को आबद्ध कर देहाभिमान को दृढ़ कर दिया है। जीव को यदि
देहाभिमान चिपका हुआ हो तो वह माया के अधीन होता है। अतः माया का नियंता मैं नारायण, वही जीव का
भी स्वामी हो गया यह समझ लो। जीव गुणों के अभिमान से बद्ध रहता है इसलिये वह सेवक हो गया और
आत्मा गुणों से अलिप्त अर्थात् निर्मल होने के कारण, वही जीव को जन्म-मरण के बन्धन से छुड़ाने वाला हो
गया। देखो ! इस प्रकार सेव्य सेवक भाव का विभाग दिखाकर तीन गुणों का सम्बन्ध भगवान स्वयं स्पष्ट करके
बता रहे हैं। तीन गुण समान ही हैं किन्तु उनमें जिन-जिन गुणों का क्षोभ होकर वे अधिक बढ़ जाते हैं उनका
स्वरूप श्रीहरि बताते हैं। ब्रह्म अपनी पवित्रता के लिये प्रसिद्ध है। कर्म भी अपनी निर्मलता के कारण अत्यन्त
शुद्ध है। फिर भी कर्म में जो कर्म का बन्धन उत्पन्न होता है वह गुण क्षोभ के योग से विकृत हुए चित्त का संबंध
है। कर्म और ब्रह्म में कोई दोष नहीं है। दोष चित्तवृत्ति में है और वह भी गुणक्षोभ के कारण होता है। वही पुरुष