श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 711, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंछब्बीसवाँ अध्याय ६९५
विषयासक्त होते हैं, उन्हें सचमुच असाधु ही समझो। ऐसे जो भी असाधु हों, उनके साथ कभी भी काया, वाचा,
मन के साथ संगत नहीं करनी चाहिये। आवारा मवेशियों के संगत में यदि कोई अच्छी गौ चली जाय तो उस
संगत से उसके गले में जीवनभर के लिये मोटा लक्कड़ पड़ जाता है। इस प्रकार दुर्जनों की क्षणभर की संगत से
भी अनर्थ हो जाता है। मुमुक्षुओं को ऐसे स्थान पर क्षणभर के लिये भी नहीं जाना चाहिये। लोहार की भट्टी से
कोई भी सहज ही झुलस सकता है, उसी प्रकार दुर्जनों की संगत भावुक लोगों को भ्रम में डालती है। गलती से
भी यदि असाधु की संगति हो जाय तो विषयासक्ति बढ़ती है जिससे विवेक स्फूर्ति को नष्ट करने वाले अधर्म की
प्रीति होती है। विवेकवृत्ति का अस्त होते ही ज्ञानस्फूर्ति अन्धी होकर मेघों से व्याप्त अमावस्या की रात्रि की तरह
हो जाती है और अपनी ही गति नहीं दिखायी देती। अन्धा यदि अन्धे का हाथ पकड़ता है तो दोनों ही खड्ग में
गिर जाते हैं, उसी प्रकार अविवेक की स्थिति के कारण विषयांध लोग 'अंधतम' नामक नरक में गिरते हैं।
कुसंगति से नरकवास प्राप्त होता है। उससे छुड़ाने वाला एक पश्चात्ताप ही है। उस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण
'ऐलगीत' सुनाते हैं।
ऐलः सम्राडिमां गाथामगायत् वृहच्छ्रवाः।
उर्वशीविरहान्मुह्यन् निर्विण्णः शोकसंयमे ॥ ४॥
समुद्र से घिरी हुई पृथ्वी का पालन करने वाला, सभी राजाओं का मुकुटमणि चक्रवर्ती राजा पुरुरवा की
कीर्ति पुराणों में प्रसिद्ध है। तेज, प्रभाव, महाशौर्य, उचित दातृत्व, गांभीर्य, मस्ती, पराक्रम तथा धार्मिक धैर्य आदि
गुणों से राजा पुरूरवा पूरी तरह युक्त था। राजधर्म की नीति के अनुसार वह स्वधर्म से पृथ्वी का पालन करता
था। ब्राह्मण जितना था उतना ही ब्रह्म की मूर्ति था। चाहे प्राण चला जाय लेकिन वह ब्राह्मण की निन्दा नहीं
करता था। गौ के लिये तो प्राण देने के लिये भी तत्पर था। दीनों का रखवाला था। पुरुरवा का दूसरा नाम 'ऐल'
था। ऐसा वह धार्मिक चक्रवर्ती राजा उर्वशी के फेर में अपनी स्थिति भूल गया। उस समय उसने पश्चात्तापपूर्वक
गीत गाया, उसके बारे में तुम्हें सुनाता हूँ। लेकिन उसकी पूर्व कथा तथा कामासक्तता के बारे में सुनो। वह अपना
बड़प्पन भूलकर, लंपट होकर वेश्या के आगे दीन बन गया। काम मनुष्य को किस प्रकार पागल बना देता है यह
श्रीकृष्ण ऐला के इतिहास से बताते हैं। ऐल (अर्थात् इला से बुध को हुआ पुत्र) पुरुरवा राजा उर्वशी के प्रति
कितना लंपट था और उसे किस प्रकार पश्चात्ताप होकर विरक्ति हुई, यह कथा वेदों में भी बतायी गयी है। उर्वशी
और पुरुरवा का सम्बन्ध नौवें स्कन्ध में विस्तार से आया है। इसे ध्यान में रखकर श्रीकृष्ण ने वह कथा विस्तार
से नहीं बतायी। उर्वशी, को स्वर्ग के भूषण स्वरूप नारायण ने स्वयं स्वर्ग में भेजा था; लेकिन वहाँ वह स्वयं को
श्रेष्ठ समझ कर अहंकार से फूल गयी। उसी अहंकार में शान से नृत्य करते समय ताल पर पैर गलत पड़ गया
और ब्रह्मदेव ने उसे शाप दिया कि तुम मृत्युलोक में जाओगी और मनुष्य तुम्हारा उपभोग करेंगे। इस पर उसने
उःशाप माँगा। इस पर ब्रह्मदेव ने कहा कि यदि तुम पुरुरवा को नग्न देख लो तो तुम स्वर्ग में आ सकोगी। ऐसा
शाप प्राप्त कर उर्वशी मृत्युलोक में आयी। उसका स्वरूप देखकर राजा पुरुरवा उस पर लट्टू हो गया। अपनी
महानता भूलकर वह उस वेश्या के वश में हो गया। उसके रूप पर वह इतना पागल हो गया कि उसे विचार
करने तक का भान नहीं हुआ। राजा को नग्न स्थिति में देखने के बाद, उर्वशी उसे छोड़कर चली जाय यह करार
मानकर राजा उसे अपने उपभोग के लिये ले आया। वह अपने शाम के परिहार के लिये अपने साथ दो भेड़ ले
आयी थी। उनका पुत्रवत पालन किया जाय इस सम्बन्ध में उसने राजा को कसम दिलाई थी। इस प्रकार उर्वशी