श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 697, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंपच्चीसवाँ अध्याय ६८१
को अनर्थ में फँसाता है। इस अर्थ का निरूपण कर मैंने गुणों का मिश्र लक्षण बताया। अब प्रत्येक गुण बढ़ने पर
उस गुण का स्वरूप कैसा हो जाता है, सुनो। जो गुण अत्यधिक बढ़ता है, उसकी आज्ञा में अन्य गुण विचरण
करते हैं। उस समय पुरुष की स्थिति कैसी रहती है वह श्रीहरि उद्धव को बताते हैं।
यदेतरौ जयेत् सत्त्वं भास्वरं विशदं शिवम्।
तदा सुखेन युज्येत धर्मज्ञानादिभिः पुमान् ॥ १३॥
जो पुरुष फल की आशा समूल छोड़कर निर्विकल्प, अभिमानरहित होकर स्वधर्माचरण करने लगता
है,उसका सत्त्वगुण रज और तम इन दोनों गुणों पर विजय प्राप्त करता है। जब भाग्य का भण्डार खुलता है, उस
समय हरिकथा श्रवण का सुअवसर प्राप्त होता है, मुख से हरिनाम कीर्ति का वर्णन करना अच्छा लगता है और
इस प्रकार अत्यन्त शुद्ध सत्त्व की वृद्धि होती है अथवा यदि ईश्वरकृपा से सत्संगति का लाभ प्राप्त हो जाय तो
भगवान के गुणानुवाद सुनने के लिये कान आतुर हो उठते हैं और वाणी अत्यन्त प्रेम से रात दिन भगवान की
नामकीर्ति का वर्णन करने में लीन हो जाती है। इस प्रकार के आचरण से रज और तम ये दोनों गुण क्षीण हो जाते
हैं और सत्त्वगुण अत्यन्त उत्साह से बढ़ता है। उस सत्त्व की साद्यंत स्थिति सुनो। तेजरूप से अत्यन्त प्रकाशयुक्त,
स्वच्छता से अत्यन्त निर्मल, शिव का अर्थ है शांत और सरल, यह सत्व का प्रमुख स्वरूप है। सत्व की यह
सत्त्ववृत्ति जिसके हाथ लगती है, उस साधक पुरुष की स्थिति उस समय कैसी होती है, सुनाता हूँ। उसे उस
समय विवेक की नौका मिल जाती है। उसे वैराग्य का आत्मरहस्य प्राप्त होता है। समस्त इन्द्रियों पर प्रकाश
पड़ता है और स्वधर्म तो अपने शिखर पर पहुँच जाता है। उस समय लोग उसे ज़बर्दस्ती से अधर्म, अहंकार,
अभिमान, झूठ आदि की शिक्षा भले ही देते हों लेकिन वह अधर्म के कृत्य बिलकुल नहीं करता। दुःख का
साधन सन्त्रिकट होने पर भी सात्त्विक वृत्ति का पुरुष सदा सुखसम्पन्न ही रहता है। सात्त्विक का मन बलात्कार से
क्षुब्ध होने पर भी क्षुब्ध नहीं होता। ऐसी आत्मसत्त्व की दृष्टि से सुख ही सुख से मिलने आने पर, सारी सृष्टि
आत्मानंद से भर गयी है ऐसा उसे लगता है। यही शुद्ध सत्व की बाढ़ है। जिसके पास ऐसा शुद्ध सत्त्व रहता है,
उसकी सेवा शम और दम करते हैं। वैराग्य उनके चरणों पर गिर पड़ता है। उद्धव! ऐसा सात्त्विक पुरुष मानों
सत्त्व गुण का भण्डार ही है। उसी प्रकार सत्व और तम को जीत कर जब रजोगुण बढ़ता है, उस समय का
राजस का लक्षण सुनो। इतना कहकर श्रीकृष्ण आगे कहने लगे।
यदा जयेत्तमः सत्त्वं रजः सङ्गं भिदा बलम्।
तदा दुःखेन युज्येत कर्मणा यशसा श्रिया॥ १४॥
रजोवृद्धि का कारण है, देह में ज्ञानाभिमान उत्पन्न होना। ऐसा पुरुष पग-पग पर दूसरों के गुण और दोषों
को देखता रहता है और सम्मान तथा प्रतिष्ठा की इच्छा करता है। रजोगुण की कीर्ति अद्भुत है। ऐसे मनुष्य को
ज्ञान होते हुए भी कामासक्ति रहती है। वह मन में अनेक प्रकार के भोगों की इच्छा रखता है। इससे रज की बाढ़
अमर्यादित हो उठती है। इस प्रकार रजोगुण की बाढ़ प्रबल होकर वह सत्त्व और तम को जमीनदोस्त कर देती
है। अब, जिससे रज का भी स्वरूप नष्ट हो जाता हो, ऐसी बात बताता हूँ। मूल श्लोक में रजोगुण 'सङ्ग-भिदा-
बलम्' इन तीन शब्दों में कहे गये तीन प्रकार से प्रबल होता है, यह केवल रजोगुण का वर्णन है। उसे ही
श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं। संग का अर्थ है—देहाभिमान। भेद का अर्थ है 'मैं और मेरा' यह भेदभाव। बल
का अर्थ है प्रबल इच्छा और प्रवृत्ति का पूर्व आग्रह। देहाभिमान से दुःख उत्पन्न होता है। भेद से भय पीछा करता