सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 707, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 707

पच्चीसवाँ अध्याय ६९१
होने पर सबको भक्ति अवश्य करनी चाहिये। भागवत का यही अत्यन्त गुप्त ज्ञान है। वह मुख्यरूप से भक्तिप्रधान
है। भक्तिभाव से मेरा भजन करने से स्त्रियों तथा शूद्रों का भी उद्धार होता है। इसलिये नरदेह प्राप्त होने पर ज्ञाता
लोग मेरी ही भक्ति करते हैं और मेरे भजन से ही गुणों को जीत कर स्वयं परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। पूर्ण
ब्रह्म की प्राप्ति के लिये मेरी निरपेक्ष भक्ति करें। भजन का वही प्रकार श्रीकृष्ण बार-बार लोकार्थ से दृढ़ कर
दिखलाते हैं।
निःसङ्गो मां भजेद् विद्वानप्रमत्तो जितेन्द्रियः।
रजस्तमश्चाभिजयेत् सत्वसंसेवया मुनिः॥ ३४ ॥
विषयों के प्रति विरक्ति रखें और अन्तःकरण में मुक्ति की इच्छा न रखें। इस प्रकार मेरी निरपेक्ष भक्ति
अधिक से अधिक प्रेमपूर्वक करें। इससे अपार प्रेमशुद्धि होती है और समस्त प्राणिमात्र के प्रति भगवद्भक्ति
बढ़ती जाती है। साधकों के लिये ही भजनसिद्धि है। इस प्रकार मेरा भजन करने से विस्मरण की ही मृत्यु हो
जाती है, और सभी इन्द्रियों में सजगता आ जाती है। उस समय रज और तम ये दोनों गुण पूरी तरह नष्ट हो जाते
हैं और उस योग से शुद्ध सत्व की स्फूर्ति से साधकों को पूर्ण आत्मानंद प्राप्त होता है। जब केवल शुद्ध सत्वगुण
शेष रहता है तो साधक को ऐसा स्फुरण होने लगता है कि संसार में एक मैं ही पावन और धन्य हूँ। मुझे शुद्ध
आत्मज्ञान प्राप्त हो गया, मुझमें परमानंद प्रकट हो गया यह सुख सत्व का बोध होने वाले सात्त्विकों को होता है।
लेकिन ऐसा जो सत्वगुण शेष रहता है