श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पिता, पुत्र इस परम्परा से संसार अत्यन्त विशाल बन गया है। यह बिलकुल अखण्ड निरन्तर रहने वाला
तथा अत्यन्त असाध्य रूप में बढ़ा हुआ है। यह कैसे हुआ ? उसके सम्बन्ध में भी श्रीकृष्ण बता रहे हैं। विषयों
की आसक्ति से वृत्ति वासनानिष्ठ हो जाती है और वह देवभावना से अत्यन्त प्रेम से संसार का स्वरूप बढ़ाती है।
जो देहाभिमान उफन रहा होता है, वह उस परब्रह्म में जीवत्व उत्पन्न करता है और नाना प्रकार की योनियों में
जन्म-मरण मुख्य रूप से बढ़ाता रहता है। इस प्रकार ब्रह्मदेव की आयु तक ऐसे ही कायम रहता है और
महाप्रलय के समय सृष्टि का संहार होता है। एक नित्य प्रलय चल रहा है और एक दैनंदिन प्रलय है। उसी
प्रकार एक कर्मजन्य प्रलय होता रहता है और एक अन्य प्रलय होता है। लेकिन इन सारे प्रलयों से अधिक श्रेष्ठ
ब्रह्मप्रलय है। वह सारी सृष्टि का संहार करता है और संसार में कुछ भी शेष नहीं रहने देता। ब्रह्मप्रलय में सृष्टि
का विनाश करना और फिर नये कल्प के प्रारम्भ में सृष्टि की रचना के लिये ऊँच-नीच नाना प्रकार की योनियों
के लिये तैयार करना, इसका क्या तात्पर्य है ? ब्रह्म प्रलय में सृष्टि का विलय अवश्य होता हे लेकिन पूरी तरह
विनाश नहीं होता। वासनारूप बीज कुछ शेष रह जाता है जो अविद्या के अंग में पूर्ण रूप से रच-बस गया होता
है। उसी वासनारूप बीज से कल्प का प्रारम्भ होता है। ब्रह्मदेव के रूप में मैंने स्वयं ही मुझसे अनुग्रह कर वह
सूक्ष्म कारण दिखलाने को बाध्य किया। जिस प्रकार वर्षारृतु में नानाप्रकार की घास बढ़कर शरद ऋतु में अपने
पूर्णत्व पर पहुँचती है और उसके ही बीजकण गर्मियों में पृथ्वी से मिल जाते हैं। वे चारों ओर बिखरे रहते हैं
लेकिन किसी को दिखायी नहीं देते उसी प्रकार प्रलय के अन्त में संसार वासना बीज के रूप में अव्यक्त शेष
रहता है। जिस प्रकार गर्मियों में इधर-उधर बिखरे हुए बीज वर्षाकाल में बारिश होते ही जोर से बढ़ते हैं और
नाना प्रकार की घास पहले की ही तरह बढ़ती रहती है। उसी प्रकार उत्पत्ति काल में सूक्ष्म वासनारूप बीजांकुरों
से अनेक योनियों में चराचर और स्थावर-जंगमात्मक संसार बढ़ता जाता है। ब्रह्मदेव के प्रलय में भी सृष्टि का
पूर्ण रूप से विनाश नहीं होता। इसीलिये संसार अनंत है ऐसा वेदशास्त्रों ने प्रतिपादन किया है। लेकिन इस प्रकार
संसार अनंत होते हुए भी इसका निःशेष विनाश हो सकता है इसी अर्थ का श्लोक का शब्दार्थ श्रीकृष्ण ने
सुनाया। 'ईक्षण' का अर्थ 'सद्गुरु की पूर्ण कृपादृष्टि' है। जिनके योग से ब्रह्मज्ञान प्रकट होता है, वही मेरा
कृपावलोकन है। यदि ब्रह्मज्ञान पूर्ण प्रकट हो जाय तो संसार का अस्तित्व ही मानो समाप्त हो जाता है। फिर ब्रह्म
ही ब्रह्मरूप से, पूर्ण स्वरूप से रहता है। 'मैं' 'तू' की बात समाप्त हो जाती है। फिर ध्रुव मण्डल की बात ही
समाप्त हो जाती है। 'मैं' 'तू' पन खो जाता है, देवता, भक्त और भजन यह भेद नष्ट हो जाता है। सगुण भक्ति
का भान उड़ जाता है और सदा सर्वदा ब्रह्म ही शेष रहता है। प्रपंच नाम की कोई बात भी मिथ्या लगने लगती
है। या आगे कभी होगा ऐसा कल्पांत में भी नहीं घट सकता। यह अत्यन्त प्रलय का लक्षण है, वह भाग्य के
बिना कभी समझ में नहीं आएगा। जिन्हें सचमुच ही सद्गुरुचरणों का लाभ हुआ है, वे भाग्यवान लोग ही उसे
समझ सकते हैं। अत्यन्त प्रलय की गति सबकी समझ में नहीं आती क्योंकि, उद्धव ! वह वास्तव में परमनिर्वाण
की ही गति है। जिसका अहंकार समाप्त हो जाता है, उसकी कल्पना भी निःशेष होती है और उसी को
आत्मस्वरूप का बोध होने के कारण अत्यन्त प्रलय का लाभ होता है। देहावसान होते ही प्रलय हुआ यह कहना
बिलकुल असत्य है। यदि आत्मनिष्ठा हो तो जीवित अवस्था में ही यह प्रलय प्राप्त हो सकता है। जीवित
अवस्था में यह प्रलय हो जाय तो उसके कारण संसार का बीज ही जल जाता है। अब ब्रह्मप्रलय के सम्पूर्ण
लक्षण बताता हूँ, सुनो। ब्रह्माण्ड प्रलय का जो क्रम है, उसमें अन्त में पूर्ण ब्रह्म शेष रहता ही है। उद्धव को जानने
के लिये पुरुषोत्तम यह मर्म बतलाते हैं।