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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 678, कुल 869 में से

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पृष्ठ 678

६६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत

जाने के बाद मेरा जो अपार आत्मज्ञान है, उसके लिये उद्धव एक अच्छा संग्रह का स्थान है। इसलिये उसने
उद्धव का भान कायम रखा। उद्धव आत्मानंद में निमग्न हो गया था। उसे श्रीकृष्ण ने अपने हाथों से थपकी देकर
होश में लाया। तब कहीं उसे अपने भक्त होने का विश्वास हुआ। उसने कहा, "हे श्रीकृष्णनाथ ! तुम्हारी जय हो।
तुमने अभी जो आत्मसुख मुझे दिखाया वह निरन्तर कायम रह सके ऐसी कृपा कीजिये। तब श्रीकृष्ण ने कहा,
"उद्धव! यह मेरे गुप्त ज्ञान की गुप्त निधि है। इसी का नाम 'पाँचवां पुरुषार्थ' है। यह वेदशास्त्रों के लिये दुरूह
और देवताओं के लिये दुर्गम है। जिसके कारण मैं पुरुषोत्तम लुब्ध हो जाता हूँ, वह यह भक्तप्रेम का रहस्य है।
मुझे वश में करने का मर्म यही है कि अंतःकरण में भक्तिप्रेम रखे जिससे चारों मुक्तियों का भ्रम नष्ट हो जाता है
और पुरुषार्थ काम भी कम हो जाता है। जिसे मेरी सप्रेम भक्ति है, उसका नाम सुनते ही सारे विघ्न भाग जाते हैं
उसे मेरी प्राप्ति के अलावा दूसरी गति प्राप्त कराना किसका सामर्थ्य है ? जिसे मेरी अनन्यभक्ति होती है, उस पर
मेरी पूर्ण कृपा रहती है। मेरे भक्तों को मेरे सिवाय अन्य कोई गति कल्पांत में भी नहीं हो सकती। भक्तों को यदि
वेदविधि से अड़चन उत्पन्न करें तो वह वेद मेरे ही उच्छ्वास से उत्पन्न हुआ है। जो मेरे सकाम भक्त हैं वे भी
फल भोगने के बाद निष्काम ही हो जाते हैं और वे भी मेरे ही निजधाम पर आते हैं क्योंकि भक्तों को अन्य कोई
स्थान ही नहीं है। जिसके पास मेरी एकनिष्ठ भक्ति है उसके चरणों की सेवा स्वकर्म करता है। विधिनिदर्शक वेद
उसके आँगन में खड़े रहते हैं। मेरे भक्त के लिये मेरे अलावा कोई स्थान नहीं है। जिसके अंतःकरण में मेरे प्रति
सप्रेम भक्ति नहीं है, उसे कर्म निश्चित रूप से बाधक होते हैं। उद्धव! जो अभक्त होते हैं उन्हें कर्म के ही कारण
दूसरी गति प्राप्त होती है। जहाँ मेरी सच्ची भक्ति रहती है वहाँ कर्म की गति नहीं चलती। मेरे भक्तों को इसी
कारण से मेरी प्राप्ति होती है। भक्तों के मन में समस्त प्राणिमात्र के प्रति जब मेरा ही भाव रहता है तो फिर उनके
पास कर्मबन्धन के लिये स्थान ही कहाँ है? कर्म की गति उनके पास जाकर रुक जाती है। मेरे भक्तों को
स्वयमेव ही मेरी प्राप्ति होती है। भक्त जमीन पर पैर रखता है लेकिन वह पैर मैंने रखा ऐसा मन में नहीं सोचता।
सब कुछ करने वाला भगवान है इसी सत्य को मानता है, इसलिये वह कर्म के बन्धन से भी नहीं बँधता। भक्तों
को मेरे सिवा और कहीं गति नहीं है क्योंकि मेरे भक्तों को मेरे ही प्रति एकनिष्ठ प्रीति रहती है। उन भक्तों के
भावार्थ की बातें स्वयं श्रीकृष्ण ने ही स्पष्ट करके बतलायीं। 'न मे भक्तः प्रणश्यति' (गीता ९.३१) ऐसा श्रीकृष्ण
ने अर्जुन से कहा। वही श्रीकृष्ण का बाना है। वह भक्तों को दूसरी गति होने ही नहीं देता। भक्त को शाप देने की
बात सुनकर भगवान उस भक्त का पक्ष लेकर तत्काल उठा और सुदर्शन पीछे लगाकर दुर्वासा को त्रस्त कर
दिया। अकेले अंबरीष के लिये उसने दस गर्भवास भोगे, वह एकनिष्ठ भक्तों को कोई कमी नहीं होने देता। भक्त
का रखवाला श्रीकृष्ण है, यही भक्ति रहस्य की प्रमुख बात है। एकनाथ जनार्दन की शरण में है क्योंकि भक्ति के
लिये भावना ही प्रमुख साधन है। शुद्ध भाव के बिना जो भक्ति होती है, वह ढोंग है, ऐसा समझ लो। जिस प्रकार
अनाज के न सीझने वाले दाने अपक्व रह जाते हैं, उसी प्रकार वह दंभयुक्त भक्ति अपक्व ही रहती है।
'भक्तियोगस्य मद्गतिः' ऐसा मूल श्लोक का पद है। उसे अत्यन्त बढ़ा दिया है, ऐसा श्रोतागण न कहें। 'मद्गति'
इस पद का अर्थ कितना है, कौन जाने ? उसका रहस्य जाननेवाला पुरुष पृथ्वी पर विरला ही होगा। इसलिये
श्रोतागण क्षमा करें। भक्ति मेरी माता है। जिसने प्रेम की धार पिला कर मुझे बड़ा किया और भगवद्जनों में मेरा
महत्त्व बढ़ाया, उस भक्ति का महत्त्व यहाँ बहुत कम ही बताया गया है क्योंकि भगवद्भक्ति की महिमा मैं
अज्ञानी कैसे जान सकता हूँ? मैंने जो वर्णन किया है वह बहुत ही कम है। इसलिये श्रोतागण मुझे क्षमा करें।
भक्ति मेरी सगी माँ है। मैंने अपने तोतले बोलों से, प्रेमवश होकर केवल ग्रन्थों के आधार पर उसके गौरव का