श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विचारशील, वेदशास्त्र जानने वाला और मुमुक्षु जैसा पुरुष होना चाहिये और ऐसा पुरुष वेद, शास्त्र, विवेक आदि
में सम्पन्न होकर मेरा भजन भी करता हो और अनन्य भाव से पूरी तरह मेरी शरण में आता हो तो ऐसे भक्तों पर
मेरी पूर्ण कृपा रहती है। मेरी ही कृपा से वह मेरा ज्ञान प्राप्त कर मेरे भजन में रममाण रहता है। ऐसे गुणों के
सम्बन्ध में विचार करने पर, ऐसा सर्वगुणसम्पन्न एक उद्धव ही दिखाई देता है। इसीलिये यदुकुलश्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने
'पुरुषश्रेष्ठ' इस संबोधन से उद्धव पर पुरुषत्व का अभिषेक किया। इस प्रकार उद्धव को सम्बोधित कर, तीन गुणों
का स्वभाव बताते समय श्रीकृष्ण पहले सत्वगुण का प्रतिपादन करने लगा। सत्वगुण के लक्षण अनेक हैं, किन्तु
उनमें से केवल पन्द्रह ही श्रीकृष्ण ने बतलाये। वे लक्षण जो श्रीकृष्ण ने अपने निरूपण में सुनाये, उन्हें सुनें।
शमो दमस्तितिक्षेक्षा तपः सत्यं दया स्मृतिः।
तुष्टिस्त्यागोऽस्पृहा श्रद्धा ह्रीर्दयादिः स्वनिर्वृतिः ॥ २ ॥
बाह्य स्फूर्ति को छोड़ अपनी चित्तवृत्ति अखण्ड आत्मा में केन्द्रित करना इसी का नाम 'शम' है। बाह्य
इन्द्रियों की चड़फड़ का शान्ति से ऐक्य कराकर विषय की इच्छा को काबू में रखना यही दम का सच्चा स्वरूप
है। उद्धव! जितने आनन्द से हम सुख भोगते हैं, उतनी ही संतोषवृत्ति से दुःख भी सहन करना, इसी का नाम
शुद्धसत्वात्मक तितिक्षा है। मैं कौन हूँ? कहाँ का हूँ? मेरा क्या स्वरूप है? मैं निष्कर्म हूँ या कर्मबद्ध हूँ इस
प्रकार आत्मविचार करने का नाम है ईक्षापरिपाक ! जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों स्थितियों में भगवत्प्राप्ति
के लिये अंतःकरण का कुढ़ना इसी का नाम 'तप' है। कोई चाह कर विष प्राशन नहीं करता, उसी प्रकार प्राणांत
होने पर भी जो झूठ नहीं बोलता, सदा सत्य ही बोलता है, यही सात्विक का सत्य है। उद्धव ! जो स्वयं स्वप्न में
भी प्राणिमात्र पर निष्ठुर नहीं होता वही उसकी सच्ची परिपूर्ण भूतदया है, ऐसा समझ लो। मेरा हित किस बात में
है? मैं कौन-सा धर्माचरण करता हूँ? ऐसा जो पूर्वस्मरण है, इसी का नाम स्मृति है। हे संसार के भक्तश्रेष्ठ
उद्धव ! अत्यधिक प्रयास किये बिना जो कुछ भी मिले, उतने से ही अंतःकरण में सुखी रहना, इसी का नाम
आत्मतुष्टि है। उपजीविका के लिये अन्न आदि जो कुछ प्राप्त हुआ हो, उसमें से कुछ सत्पात्र को दान देना तथा
सारी विषयममता छोड़कर रहना इसी का नाम है त्याग। अर्थ और स्वार्थ में इच्छा बढ़ती ही जाती है, धन मिलने
पर तो वह और भी अधिक बढ़ती है। ऐसी इच्छा का यदि मन से ही त्याग कर दिया जाय तो इससे निस्पृहता
बढ़ती है। जहाँ पूर्णरूप से सर्वलक्षणयुक्त निस्पृहता रहती है उसी का नाम दृढ़ वैराग्य है। यही परमार्थ का सच्चा
भाग्य है और इसी के योग से श्रीहरि की प्राप्ति होती है। जो गुरु के वचन पर विश्वास करता है, जो अंतर्बाह्य
उसके ही प्रति समर्पित रहता है, उसकी ही देवब्राह्मणों के प्रति भक्ति जड़ती है और उसके मन में पूर्ण श्रद्धा का
वास रहता है। नरदेह में ही परब्रह्म की प्राप्ति होती है। ऐसा होते हुए भी जो उसके लिये सत्कर्म नहीं करता,
विषय के लिये धर्म-अधर्म का जैसा भी मन चाहे वैसा आचरण करता है, उसकी यह कृति अत्यन्त निंद्य और
लज्जास्पद है। जिससे हमें दुःख होता है वह दूसरे को न दे, बल्कि दुःख के स्थान पर सुख ही दे, यही दया मैं
श्रीकृष्ण वंदनीय मानता हूँ। दूसरे को दुःख न देकर स्वयं सारे प्राणियों को सुख प्रदान करना, इसी का नाम
पारमार्थिक दया है। इसीलिये इसका दूसरी बार उल्लेख किया। जिस प्रकार पहले चीनी खाने के बाद कोई घास
खाये तो वह अच्छी नहीं लगती उसी प्रकार जो विषयों को गौण समझ कर ब्रह्मानंद में निमग्न हो जाता है,
उसकी उस वृत्ति को आत्मनिवृत्ति कहते हैं। कोई भिखारी जब पालकी में बैठता है तो वह अपने पहले के फटे-
पुराने वस्त्र उपेक्षा से फेंक देता है, उसी प्रकार वह विषयों की उपेक्षा कर ब्रह्मसुख को पकड़े रहता है। अन्न कण