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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 683, कुल 869 में से

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पृष्ठ 683

चौबीसवाँ अध्याय ६६७
विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पकः।
पञ्चत्वाय विशेषाय कल्पते भुवनैः सह॥ २१॥
चौदह लोकों के साथ इस प्रचण्ड ब्रह्माण्ड की रचना काल ने कल्पना से की है। उसके अस्तित्व के समय
से ही उसका पालन-पोषण कर उसके विनाश का प्रयत्न भी काल ही करता है। ऐसा वह काल कौन है? यदि
तुम यह प्रश्न पूछते हो तो समझ लो कि उस काल का आत्मा मैं ही हूँ। उसी कालस्वरूप से मैं सृष्टि की ओर
संहार की दृष्टि से देखता हूँ। पंचमहाभूतों के जो भिन्न-भिन्न विभाग हैं, उनकी रक्षा काल ने ही की है। उस सत्ता
को जब मैं समेट लेता हूँ तो पंचमहाभूतों में अफरातफरी व्याप्त हो जाती है। जिस प्रकार उत्पत्ति का क्रम है,
उसी प्रकार प्रलय का भी क्रम है। भूतों में ही भूतों का सहज विलय हो जाता है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
अन्ने प्रलीयते मर्त्यमन्नं धानासु लीयते।
धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते॥ २२॥
प्रलय की दृष्टि से देखें तो अनावृष्टि छा जाती है और सृष्टि में अन्न की कमी हो जाती है, अन्न क्षीण होने
से शरीर भी क्षीण होता है। यहाँ 'अन्नमय प्राण' होता है यह वचन प्रत्यक्ष है ही। अन्न कम होने पर प्राणियों के
प्राण भी निकल जाते हैं। अन्न की बाढ़ रुक जाने से वह स्वयं बीज रूप में ही रहता है। किन्तु उद्धव! वह
तत्काल पृथ्वी में ही एकरूप हो जाता है। इतने में बारह सूर्यों का समुदाय सूर्यमण्डल में एकत्र होता है। वह
पर्वत, पत्थर आदि को भी भस्म कर देता है और घास को भी शेष नहीं रहने देता। उसके कारण सप्त पाताल
तप्त हो जाते हैं और शेष का मस्तक झुलसने लगता है। वह विषाग्नि की ज्वाला उगलने लगता है और उसकी
ज्वाला भड़कने लगती है। शेष के मुख से निकली उस अग्नि से पृथ्वी पर की सभी वस्तुएँ जल जाती हैं।
तत्काल सारा ब्रह्माण्ड जल जाता है और पृथ्वी पूरी तरह भस्म हो जाती है। उस समय पृथ्वी का अस्तित्व समाप्त
हो जाता है और वह केवल गन्धस्वरूप से शेष रहती है। फिर वह गन्ध भी पानी में घुल जाता है, यही बात
श्रीकृष्ण बताते हैं।
अप्सु प्रलीयते गन्ध आपश्च स्वगुणे रसे।
लीयते ज्योतिषि रसो ज्योती रूपे प्रलीयते॥ २३॥
उस समय प्रलय मेघों के विराट समुदाय सूँड़ जैसे विशाल धाराओं से भयानक वृष्टि करते हैं। इस प्रकार
सौ वर्ष तक अखण्ड वर्षा होने के कारण सात समुद्रों का समुदाय एकत्र होता है। चारों ओर जल ही जल एकत्र
हो जाता है और उसमें पृथ्वी का बचा-खुचा अंश गन्ध में घुल जाता है। उस समय चारों ओर एकत्र जल प्रलय
की सार्थकता को सिद्ध करता है। सांवर्तक मेघों की पहचान यह है कि वे प्रलयकाल में सभी समुद्र एकत्र करते
हैं और पृथ्वी को उसमें घोलकर स्वयं भी घुल जाते हैं। उस समय अत्यन्त भीषण सांवर्त अग्नि क्षुब्ध होता है
और वह सभी जगह का पानी सुखाकर केवल रस शेष रखता है। फिर रस के रूप में जो पानी शेष रहता है, वह
भी तेज में विलीन हो जाता है और फिर वही तेज दसों दिशाओं में व्याप्त हो जाता है। उस सांवर्ताग्नि का क्या
वर्णन किया जाय? वह केवल पृथ्वी के जल का शोषण कर शान्त नहीं बैठता, अपितु वह अपनी दाहक शक्ति
को स्वयं जलाता है, जिसके कारण उसे सांवर्ताग्नि यह नाम प्राप्त हुआ है। इतना होने के बाद उसी काल के योग
से जोर की हवा चलती है और वह उस तेज को सोख लेती है। उस तेज का पूरी तरह शोषण हो जाने के बाद,
केवल रूप शेष रह जाता है।