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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 674, कुल 869 में से

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पृष्ठ 674

६५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हो तो मैं उन्हें रहने के लिये वैकुण्ठ में ले जाता हूँ। भक्त यदि सामिप्य चाहते हैं तो मैं उन्हें अपना प्रिय बनाता
हूँ। जिस प्रकार तुमसे मन की बात करने में मुझे अच्छा लगता है, उसी प्रकार हे उद्धव ! तुम मुझे जिस प्रकार
अच्छे लगते हो, उसी प्रकार मैं उससे प्रीति करता हूँ। भक्ति यदि सरूप माँगे तो मैं उसे चतुर्भुज बनाता हूँ और
शंख, चक्र आदि आयुध देकर उसे मेघ जैसा सुन्दर साँवला वर्ण देता हूँ। मुकुट, कुण्डल, करधनी पहनने के
लिये पीला पीताम्बर, बाजूबंद, पैर में पायल और गले में मेरे ही जैसा कौस्तुभमणि। आकारस्वरूप, गुणलक्षण,
वीर्य, शौर्य, पूर्ण गाम्भीर्य, रूप-लक्षण ठीक एक जैसे। लक्ष्मी यदि दोनों को एक साथ देख ले तो वह भी नहीं
जान पायेगी कि इनमें भगवान कौन हैं? सेवकों का सेवाकर्म रुक जाता है क्योंकि वे सेवा करें तो किसकी?
छत्रधारण करने वाला भी मन में विचार करता है कि मैं छत्र किसके ऊपर धारण करूँ? चँवरी हिलने वाला भी
चँवर किस पर हिलाये ? ब्रह्मादि देवतागण प्रणाम करने आते हैं, वे भी आश्चर्य करते हैं। दोनों में आदि देवता
कौन हैं, यह उनकी भी समझ में नहीं आता। जिस प्रकार एक दीप से दूसरा दीप जलाने के बाद यह समझ में
नहीं आता कि इनमें पहला दीप कौन-सा है, उसी प्रकार मेरी सरूपता प्राप्त होने के बाद दूसरे को वह भी नहीं
पहचान पाता। जिस प्रकार दर्पण में एक-सा प्रतिबिम्ब देखने पर वही असली बिम्ब मालूम होता है, उसी प्रकार
सरूपता की शोभा रहती है। दोनों का ठाठ एक जैसा। भगवान प्रसन्न होकर अपनी सारी सरूपता दे देता है लेकिन
हृदय पर अंकित वह ब्राह्मण का चरण वह अविनाशी श्रीवत्सलांछन कदापि नहीं देता। विष्णु स्वयं ही कहते हैं,
श्रीवत्सचरण देने का सामर्थ्य मुझमें नहीं है। वह सामर्थ्य ब्राह्मणों के पैर में है। उन ब्राह्मणों के चरण हृदय में
धारण करने से ही वह मिलेगा। सरूपता में भगवान और भक्त को पहचानने की यही निशानी है। जिसके हृदय
पर श्रीवत्सलांछन रहता है, वही सबका स्वामी श्रीविष्णु है। इस प्रकार की सरूपता प्राप्त होने पर भी एक देवता
है तथा दूसरा भक्त है, यह भेदभाव उनमें रहता ही है। भगवान और भक्त इनमें जब तक भेद है तब तक सरूपता
करना भी उपयुक्त नहीं है क्योंकि जब तक अद्वयज्ञान नहीं होता, तब तक परमानन्द उत्पन्न नहीं होता। इसलिये
भिन्नत्व की बात न कर भक्त सायुज्यता ही माँगता है। उस निरूपण की कथा अत्यन्त मधुर है। वह कथा केवल
मैं ही जानता हूँ। सायुज्य की जो मिठास है, वह केवल मैं ही जानता हूँ। उद्धव ! उसे भी मैं तुम्हें विस्तारपूर्वक
बताऊँगा। सरूपता से देह की समानता भले ही प्राप्त हो जाय लेकिन हृदय में मैं और तुम वाला भेदभाव रहता
ही है। इसलिये ऐसी सरूपमुक्ति से भी ज्ञानी भक्त लुब्ध नहीं होते। मेरा स्वरूप प्राप्त कर मेरे भक्त मेरा स्वतः
सिद्ध भजन करना छोड़, मेरे भक्त मन से भी भेद का स्पर्श नहीं करते। देवता के साथ भक्त भी अनादि सिद्ध हैं।
वे मूलतया भेदरूप हैं। ऐसा होते हुए जो जान-बूझ कर भेद मानता है उसे भक्तिहीन तथा मायिक समझना
चाहिये। आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी ये सारे भेद मायिक भक्ति ने किये हुए हैं। किन्तु अभेदभाव से जो मेरा
भजन करते हैं, उन्हें सायुज्यता-मुक्ति प्राप्त होती है। राजा और रंक जिन्हें एक जैसे हैं, उनका मन किसी को वंद्य
और किसी को निंद्य नहीं मानता, जिनमें देहाभिमान नहीं होता, उन्हें सायुज्यता प्राप्त होती है। जिस प्रकार हमारी
परछाईं मिथ्या ही हमसे चिपकी रहती है, उसी प्रकार जो इस देहबुद्धि को मिथ्या समझता है, उसे ही सायुज्यता
प्राप्त होती है। छाया हमारे ही साथ जन्म लेकर हमारे ही साथ बड़ी होती है, फिर भी उसके प्रति मेरी जैसी
ममता किसी के मन में उत्पन्न नहीं होती। उसी प्रकार जिसे देह के दुःख की बाधा नहीं होती, उसे ही निश्चित
रूप से सायुज्यता प्राप्त होती है। देह की विषयासक्ति भूलकर जो मन से अभेदभक्ति करता है, उसे ही हे उद्धव!
सायुज्ययुक्ति प्राप्त होती है। अपनी देह में जिसमें 'मैं' पन उत्पन्न नहीं होता, किसी प्राणी में जो 'तू' के भाव से
नहीं देखता उसे पूर्णरूप से सायुज्ययुक्ति प्राप्त होती है। उद्धव ! जितना मेरे आत्मा का विस्तार है, उतनी ही उसे