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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 687, कुल 869 में से

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पृष्ठ 687

सांख्य प्राप्त होगा। अथवा कर्माचरण जैसा भी हो रहा हो, उसे होने दीजिये। लेकिन मैं कर्ता हूँ, ऐसा मत कहो।
इतना कर देने से ही तुम पूर्णब्रह्म हो जाओगे। इससे अधिक सुलभ मार्ग मुझे नहीं दिखायी देता। उद्धव! तुम्हारे
आत्मकल्याण के लिये मैंने यह कहा। मेरा यही भाषण पूरी तरह मनन कर अपने कल्याण के लिये हम उसका
आचरण अवश्य करें। देवाधिदेव की इन बातों पर उद्धव की भक्ति स्थिर हो गयी। जरा देखिये। निःशेष अहंता
छोड़ देने से मनुष्य स्वयं ब्रह्म हो जाता है। सांख्यज्ञान का विचार करने से दिखायी देता है कि अहंकार ही संसार
को डुबोता है। 'अहं' भाव के साथ ही जन्म-मरण रहता है। अहंभाव के पास भयंकर दुःख भी रहता है। इस
प्रकार अहंभाव नितान्त कठिन है। उसे छोड़ने का प्रयत्न करने पर भी वह स्वयं नहीं छूटता। लेकिन उसके इस
उलझन का कारण क्या है, यह समझ में नहीं आता। यदि भगवान से पूछने जाओ तो उन्होंने सांख्यशास्त्र को
स्पष्ट करके बतला दिया है। इसीलिये श्रीकृष्ण पचीसवें अध्याय में सगुण और निर्गुण इन दोनों प्रकारों से भेद का
मधुर निरूपण करेंगे। वह कथा सुबोध, रसपूर्ण और मधुर है। जहाँ श्रीकृष्ण जैसा सुनानेवाला और उद्धव जैसा
श्रोता हो, वहाँ स्वाद तो निरुपम होगा ही। उस स्वाद के माधुर्य का वर्णन करने के लिये श्रीकृष्ण समर्थ हैं और
उस माधुरी का सेवन करने के लिये अत्यन्त ज्ञानसम्पन्न श्रोता उद्धव उपस्थित हैं। भगवान और भक्त के बीच
संवाद का माधुर्य वेदशास्त्रों से भी नहीं प्राप्त होगा। करोड़ों ग्रन्थों का अवलोकन करने पर भी वह माधुर्य प्राप्त
नहीं होगा। वह माधुर्य तभी प्राप्त होगा जब भाग्य से भावार्थ हाथ लग जाय क्योंकि भावार्थ की चाह से भगवान
अपने अंतःकरण का माधुर्य भक्तों को देता है। सारांश, भगवान को भावार्थ के सिवा और कुछ भी प्रिय नहीं है।
वह भाव ही जिनके पास नहीं है वे केवल मूर्ख और अज्ञानी हैं। जो बालक कंकड़ बिछा कर उन्हें भगवान
कहते हैं, उन बालकों की भक्ति भी धन्य है और वहाँ भी विश्वास करने पर ईश्वर प्रकट होता है। बालक
उपमन्यु जब दूध के लिये भावार्थ से भगवान से हठ करने लगा तो उन्होंने क्षीरसागर को ही कटोरी की तरह
उसके मुँह से लगा दिया। सारांश, जो भाविक है वही भगवान का लाडला होता है और भगवान भी भाविकों का
सेवक होता है। बिना भाव के भगवान कभी किसी से नहीं मिलता। इसलिये जहाँ भावार्थ होता है, वहीं सुख का
लाभ होता है। जहाँ भावार्थ होता है, वहीं परमार्थ भी पूर्णरूप से प्राप्त होता है। इस प्रकार भावार्थ बढ़ाने से
निर्गुण प्राप्ति की इच्छा भी तृप्त होती है। इसी अर्थ का वृतांत श्रीकृष्ण अगले अध्याय में सुनायेंगे। उस कथा के
रसपूर्ण वर्णन के माधुर्य से लोग अमृत की मधुरता भी भूल जायेंगे। श्रीकृष्ण का कथामृत श्रोताओं के श्रवणरूपी
मुख में पड़ेगा। एकनाथस्वरूपी जनार्दन को भी अत्यन्त हर्ष होगा और वह बड़े कौतुक से उसका व्याख्यान
करेंगे। श्रीभागवत ने बड़े सम्मान के साथ श्रीकृष्ण कथा के विस्तार का उत्तम उपहार दिया है और परमार्थरूपी
अलंकार से उसे सुशोभित किया है। उस उपहार के श्रवण के प्रति उत्पन्न सम्मान कर मैं अपने आप्त संत सज्जनों
का गौरव करूँगा। जनार्दन ने एकनाथ पर इतनी कृपा की इसलिये वे अपना सामर्थ्य प्रकट कर रहे हैं। केवल
सम्बन्धी सज्जनों का आदर किया और अन्य लोगों की उपेक्षा की हो ऐसी बात नहीं है। श्री भागवत का जो
ध्यानपूर्वक श्रवण करेगा उसका गौरव परमार्थ से ही होगा। वास्तव में, भावार्थ ही गौरव है। उसे एकनाथस्वरूपी
जनार्दन जानते हैं, इसलिये एकनाथ भी जनार्दन की शरण में जाकर स्वयं ही गौरवान्वित हो रहे हैं।
इति श्रीमद्भागवते एकादश स्कंधे श्री कृष्णोद्धव संवादे एकाकार टीकायां
प्रकृति पुरुष सांख्य योग नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः॥ २४॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु।