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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 675, कुल 869 में से

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पृष्ठ 675

चौबीसवाँ अध्याय ६५९
आत्मप्रतीति होती है। इसलिये उसे सहज ही सायुक्त मुक्ति प्राप्त होती है। मेरा देह विष्णुस्वरूप है ऐसा
देहाभिमान उसमें कदापि उत्पन्न नहीं होता। वह विष्णु के देह को और अपने देह को मिथ्या ही समझता है।
इसलिए वह सरूपता की कामना नहीं करता। अपनी ही जगह यदि विचार किया जाय तो देह के रूप में जो भी
कुछ है, वह सब मिथ्या है ऐसा लगता है। तो फिर सरूपता कहाँ रही ? सायुज्यता प्राप्त होने के बाद ब्रह्म के
सिवाय कोई रीता स्थान दिखाई ही नहीं देता। समस्त प्राणिमात्र में एकात्मता होना, इसी का नाम वास्तव में
सायुज्यता है। अनेक प्रकार के रूपों से संसार भरा है, उसे वह अपना ही अंग समझता है, मैं ही अभंग सर्वात्मा
हूँ, ऐसी जिसकी भावना होती है, उसी को पूर्ण सायुज्यता प्राप्त होती है। अंतर्बाह्य मैं ही व्याप्त हूँ, सभी स्थावर-
जंगम में मैं अकेला ही व्याप्त हूँ, चराचर का आत्मा मैं ही हूँ, ऐसा जो मानता है, उसके घर में सायुज्यता चाकरी
करती है। सर्वत्र मैं एक अकेला ही एकत्त्व से भरा हुआ हूँ, ऐसी जिसकी समझ रहती है, जिसका द्वैतभाव नष्ट
हुआ रहता है वही सचमुच सायुज्यता प्राप्त करता है। सारांश, भावपूर्वक जो मेरे भक्त जिस किसी भी वस्तु की
इच्छा करते हैं, उसकी आपूर्ति मैं श्रीपति करता हूँ। इस प्रकार भक्तों को चारों मुक्ति प्राप्त होती है। इसके
अतिरिक्त भी मेरे और प्रिय भक्त हैं। अपनी भक्ति के प्रताप से वे अत्यन्त प्रतापी रहते हैं। उनके भजन का शौर्य
विचित्र रहता है। वे निरन्तर इच्छारहित होकर मेरे भजन में ही मग्न रहते हैं। आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी इन बातों का
विचार न कर वे निरन्तर इच्छारहित होकर अत्यन्त प्रेमपूर्वक मेरा भजन करते हैं। वे सलोकता, समीपता और
सरूपता बिलकुल स्वीकार नहीं करते और सायुज्यता भी नहीं माँगते। वे इच्छारहित होकर भगवान का भजन
करते रहते हैं। इसी का नाम है सच्ची भक्ति। भजन के सामर्थ्य का एक बहुत बड़ा चमत्कार है। वह यह कि
चाह से ही चाह उत्पन्न होती है और अधिक से अधिक उत्कर्ष से क्षण-प्रतिक्षण प्रेम की नयी माधुरी उत्पन्न होती
है। सचमुच, मेरे प्रति रुचि के कारण वह अपना सर्वस्व मुझे अर्पण करता है, फिर भी उसके अंतःकरण में कोई
परिवर्तन नहीं होता। भक्तिभाव से वह भजन के प्रति इतना अधिक आश्वस्त रहता है। देवाधिदेव एक मैं हूँ,
समस्त प्राणियों में मेरा आत्मा है, ऐसी जिसकी भावना हो जाती है, उसके मन में कोई कितने ही विकल्प,
विकृति अथवा संशय उत्पन्न करने का प्रयत्न क्यों न करे लेकिन उनका प्रयास सार्थक नहीं होता। भक्ति की
महत्ता आश्चर्यजनक है। वह भक्त सारे पुरुषों-स्त्रियों में मुझे ही देखता है। श्वान, शूकर आदि में मेरा ही रूप
देखकर उनको प्रणाम करता है। उसके भजन की महत्ता आश्चर्यजनक है। ऐसे भक्त सायुज्यादि चारों मुक्ति मुझ
पर न्योछावर कर देते हैं। इतनी असीम उनकी भक्ति रहती है। कितना ही बड़ा संकट क्यों न आ जाय लेकिन वे
दूसरे के पास मिन्नत करने नहीं जाते। वे जानते हैं कि रामनाम के सामने वह विघ्न कुछ नहीं कर पायेगा। चाहे
बिजली की गर्जना से आकाश नीचे गिरता सा मालूम पड़े अथवा पृथ्वी उलटने लगे, लेकिन वह श्रीहरि का
नामस्मरण करता रहता है। ऐसी एकनिष्ठ प्रीति देखकर मैं लक्ष्मीपति उसके मोह में पड़ जाता हूँ और फिर कुल
और जाति का विचार न कर उसके घर की ओर दौड़ पड़ता हूँ। ऐसे भक्त वैकुण्ठ की राह नहीं खोजते, वरन्
उनके घर को ही मैं वैकुण्ठ बना देता हूँ। फिर वहाँ ज्ञान की भोर होती है, और संतों का समुदाय एकत्र होने
लगता है। उपनिषद उनके पास आते हैं; स्वधर्म आनन्दपूर्वक उनके पास रहने के लिये आता है और नारद,
सनकादिक आदि को उस घर से लगाव-सा हो जाता है। वे नाम के माहात्म्य का घोष करते हैं। बड़ी चाह से
मेरी यशोगाथा का गान करते हैं। मेरे रामनाम के आगे सुख-दुःख के द्वंद्वों की कष्टदायक स्थिति शेष ही नहीं
रहती। मेरी ऐसी भक्ति देखकर आत्मशान्ति अत्यन्त प्रेम से उनके पास दौड़ती चली आती है और वहाँ आकर
जब वह प्रसन्न हो जाती है तो जाने की बात ही भूल जाती है। जो भी दूषण उनका छल करने के लिये आते हैं,