श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकृति पुरुषों का विवेचन कर मैंने तुम्हें आदि, मध्य और अन्त इन तीनों अवस्थाओं का ऐक्य दिखला
दिया। फिर उनमें व्यर्थ ही भिन्नता क्यों मानते हो ? उत्पत्ति के पूर्व भी पूर्ण ब्रह्म ही रहता है। उत्पत्ति का कारण
वही होता है और यह जो संसार आकार रूप में प्रकट हुआ है, वह भी ब्रह्मस्वरूप ही है, यह भी तुम्हें दिखा
दिया है और प्रलय के अन्त में ब्रह्म जैसा का तैसा शेष रह जाता है, उस सम्बन्ध का अनुभव भी तुम्हें बता
दिया। प्रकृति से पुरुष भिन्न है। प्रकृति को अलग से देखें तो वह मिथ्या है। प्रकृति पुरुष का यह ज्ञान जिसे हो
जाता है उसे 'मैं' और 'तू' पन का आभास नहीं होता। जहाँ 'मैं' पन और 'तू' पन नहीं है, वहाँ विकल्प की
कल्पना कौन करेगा.? सृष्टि के आदि और अन्त में परब्रह्म परिपूर्ण है यह ज्ञान जिसे प्राप्त होता है, प्रकृति पुरुष
का विचार और उनका वह सांख्य दर्शन जिसके मन में जागृत रहता है, उसके मन में हे उद्धव ! कल्पांत में भी
विकल्प की उत्पत्ति नहीं होती। जिसके मन में प्रकृति पुरुषों का विचाररूपी सूर्य पूरी तरह उदित हो चुका है,
वहाँ विकल्परूप अँधेरी रात कैसे रह पायेगी ? जिसे प्रकृतिपुरुष का अत्युत्तम ज्ञान है, उसका मन विकल्प भूल
ही जाता है। उसके अंतःकरण में ज्ञानरूपी सूर्य अज्ञानरात्रि पूर्ण रूप से नष्ट कर उदित होता है। जहाँ का अज्ञान
ही नष्ट हो जाता है वहाँ विकल्प को स्थान कहाँ ? इस प्रकार यह सांख्यतत्त्व विचार साधकों का बहुत उपकार
करने वाला है। उद्धव ! यह सार का भी सार, यह गुप्त ज्ञान का भण्डार, जो विचाररत्नों का समुद्र है, वही सच्चा
सांख्यशास्त्र है।
एष सांख्यविधिः प्रोक्तः संशयग्रन्थिभेदनः ।
प्रतिलोमानुलोमाभ्यां परावरदृशा मया ॥ २९ ॥
मैं विचारों का विचार हूँ मैं सूर्य का आदि सूर्य हूँ। मैं ज्ञानियों का ज्ञानरूपी मुकुटमणि. हूँ, मेरी वह
पूर्णावस्था, वही सांख्य मत है। मैं वेदों का आदिवेद, मैं उपदेश का आद्य उपदेश और मैं आनन्द का आत्मानंद
हूँ। मेरा ज्ञानोपदेश ही सांख्यतत्त्वज्ञान है। उस श्रीकृष्ण ने आत्मज्ञान स्पष्ट कर सांख्ययोग के साधन से अव्यय
होकर ब्रह्म भी दिखला दिया। जिस प्रकार हथेली पर गोल आँवला स्पष्ट रूप से दिखायी देता है, उसी प्रकार
सांख्ययोग के साधन से साक्षात परब्रह्म तुम्हें तुम्हारी आँखों से दिखा दिया। जो आँखों से ब्रह्म देखने जाता है वह
सर्वांग से ही देखने वाला (तन्मय) हो जाता है, यही सांख्ययोग की चाभी है। यह सांख्ययोग अनुक्रम अन्वय
व्यतिरेक से विचार करके देखें तो ब्रह्म अखण्ड तथा अद्वय है यह रहस्य मालूम हो जाता है। उत्पत्ति, स्थिति
अथवा प्रलय में ब्रह्म अखण्ड एवं स्वयं नित्य है, यही ज्ञान साधकों को सच्चे सांख्ययोग से प्राप्त होता है। जिन्हें
ब्रह्मज्ञान का शौक रहता है उनका वह शौक सांख्ययोग पूरा करता है और लिंगदेह के विशाल और प्रबल वृक्ष को
समूल गिरा देता है। लिंगदेह अत्यन्त कठिन अवश्य है, लेकिन जिस प्रकार अग्नि में घास गिर जाय, उसी प्रकार
सांख्य योग के सामने वह भस्म हो जाता है। लिंगदेह नमक का एक प्रचण्ड पर्वत है तो सांख्य प्रलयकाल का
तूफानी समुद्र है। वह समुद्र जब क्षुब्ध होता है तो अपने जल में उस पर्वत को घोल देता है और अपनी ही तरह
सारा पानी एकाकार कर देता है। उद्धव ! यह ज्ञानसागर जब क्षुब्ध होता है तो संशय के लिये कोई स्थान शेष नहीं
रहता। हे उद्धव ! जो ज्ञान सारे संशयों को काटता है, लिंगदेह का भेद करता है, वह सांख्ययोगज्ञान है इसे
निश्चित रूप से जान लो। अनुलोम तथा प्रतिलोम का विवेचन करना कठिन मालूम होगा लेकिन यह विवेचन
किये बिना ही सांख्य सुलभ ढंग से समझ में आ जाय ऐसी युक्ति बताता हूँ, सुनो। विभिन्न आकारों में दिखायी
देने वाले भेद छोड़कर, समस्त प्राणिमात्र में भगवत्स्वरूप ही भरा हुआ है, इस भाव से जो देखेगा उसे समूल