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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 679, कुल 869 में से

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पृष्ठ 679

चौबीसवाँ अध्याय ६६३
वर्णन किया है। प्रेम की जाति कैसी होती है? तो वह स्मरण का स्मरण नहीं होने देती। इसलिये उस प्रेम के मूल
हेतु की विस्मृति होकर मुझसे भक्ति का रहस्य कहलवाया। जिस प्रकार माँ अपने बालक को बोलना सिखाती है,
उसी प्रकार यहाँ भक्ति ने मुझे सवाक् बनाया। इसलिये मैं यहाँ दोष किसे दूँ? जो माँ के वात्सल्य लोभ को प्रकट
करे वह मूर्ख है। बल्कि मैंने ही अज्ञानवश गलती की यही सच लगता है। उड़द का काला रंग अपनी जगह है,
उसी प्रकार मैंने यहाँ जो गलती की है उसे गलती ही माना जाय। लेकिन इससे भी गुरुनाथ ने मना किया है
क्योंकि गलती स्वीकार कर मैं कवि या कर्ता बनना चाहता हूँ, यही सिद्ध होता है। लेकिन गुरुनाथ को 'मैंपन'
जरा भी नहीं भाता। कथा परिपूर्ण होने पर भी उस अभिमान से आत्मस्तुति कर मैं 'मैंपन' न लूँ यही लक्षण
बताकर गुरु ने 'मैं' 'तू' पन नष्ट कराया। लेकिन यह भाषण देने वाला भी मैं नहीं ही हूँ। मैं कवि भी नहीं हूँ
और ग्रन्थकर्त्ता भी नहीं हूँ। यह बात गुरु भी जानते हैं। इस पर श्रोताओं ने कहा, कैसा चमत्कार है! भक्तिसुख
का सुखदायी रहस्य—भक्ति परमामृत समुद्र तुमने सचमुच प्रकट कर दिया। भागवत मुख्य रूप से भक्ति प्रधान
है। भक्ति का जो सनातन सुख है, उसे पूर्णरूप से करतलामलकवत् खोल कर प्रकट कर दिया। तुमने यह बहुत
बड़ा उपकार किया है। स्त्रियों और शूद्रों के उद्धार के लिये और संसार को भजनतत्पर बनाने के लिये तुमने
भागवत का सारतत्त्व निकाल दिया है। भागवत का जो गुप्त अमृत है वही भक्तिसुख है, यह तुमने स्पष्ट कर
दिया है। इससे समस्त संतगण प्रसन्न हो उठे और श्रोतागण तृप्त हो गये। श्रीकृष्ण ने ही प्रसन्न होकर तुम्हें अपनी
भक्ति प्रदान की। इसीलिये तुमने भक्ति की कीर्ति का यथार्थ ढंग से वर्णन किया। तुम्हारी भक्ति का प्रत्येक शब्द
ब्रह्मानन्द से भी अधिक गम्भीर है और उसमें भी प्रेम की आर्द्रता होने के कारण ज्ञानानंद का ज्वार आ जाता है।
तुम जब आत्मभक्ति का वर्णन करते हो तो तुम्हारा अंतःकरण प्रेमपूर्ण होकर बहने लगता है। ग्रन्थ की बात भूल
कर तुम भक्ति के माहात्म्य का ही वर्णन कर रहे हो। अपनी ही इच्छा और उत्कंठा से भक्ति के माहात्म्य का
वर्णन करते समय तुम्हें अगला-पिछला कुछ स्मरण नहीं रहता। तुम्हारा अवर्णनीय प्रेम हम जान चुके हैं। जैसे-
जैसे भक्ति का निरूपण आगे बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे तुम्हारा स्फुरण बढ़ने लगता है। भक्तिसुख का निरूपण
होते समय श्रोता और वक्ता दोनों ही उसमें लोलुप हो गये हैं। अमृत प्राशन करते समय तृप्ति की बात कौन
करेगा? लेकिन अब स्फूर्ति को बीच ही मैं रोक कर ग्रन्थार्थ आगे बढ़ायें। संतों का यह वचन सुनकर एकनाथ ने
उन्हें साष्टांग नमस्कार किया और कहा, “अच्छा हुआ, आपने स्मरण दिलाया नहीं तो यह निरूपण समाप्त न
होता।” ‘भक्तियोगस्य मद्भक्ति’ इस पद का अर्थ बताते समय, जिस भक्ति से भगवत्प्राप्ति अत्यन्त सुलभ होती
है, उसका निरूपण किया। यदि यह भगवद्भक्ति न की जाय तो त्रिगुणरूपी डोर से जीवों की अनेक पंक्तियाँ बँध
जाती हैं और संसार में जन्म लेती हैं। उस स्थिति का वर्णन श्रीकृष्ण करते हैं।
मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत्।
गुणप्रवाह एतस्मिन्नुन्मज्जति निमज्जति॥ १५॥
संसार को मुख्य रूप से धारण करने वाला मैं हूँ, ब्रह्मदेव के रूप में उत्पत्ति करने वाला मैं ही हूँ, विष्णु के
रूप में पालन करने वाला मैं ही हूँ और रुद्ररूप से संहार करने वाला भी मैं ही हूँ। ये तीन गुण यही काल की
सत्ता है, वही मैं सचमुच निजकाल हूँ तथा गुण के स्वरूप के अनुसार उत्पन्न करने वाला, पालन करने वाला तथा
संहार करने वाला हूँ। लोगों का वासनाकर्म विचित्र है। वही कालसत्ता का आत्मसूत्र है। उसी से, यह गुणों से
बद्ध चराचर संसार खड़ा है। जीव गुणकर्मों के योग से स्वर्ग प्राप्त करता है, और गुणकर्मों के कारण ही नरक में