श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
रूपं वायौ स च स्पर्शे लीयते सोऽपि चाम्बरे।
अम्बरं शब्दतन्मात्र इन्द्रियाणि स्वयोनिषु ॥ २४ ॥
तेज का जो रूप शेष रह जाता है उसका वायु शोषण कर उसे निराकार बना देता है, उस समय चारों ओर
केवल वायु ही भर जाता है। फिर उस चारों ओर भरे हुए वायु को आकाश वहीं निगल लेता है, तब वायु स्पर्श
के रूप में प्रवेश कर केवल स्पर्श के ही रूप में शेष रहता है। वायु के उस शेष बचे हुए स्पर्श स्वरूप का लय
आकाश में तत्काल हो जाता है। फिर आकाश शब्द में प्रवेश करता है और वह शब्दतन्मात्र शेष रहता है। मुट्ठी
बन्द करने पर जिस प्रकार पाँचों उँगलियाँ उसमें लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार दस इन्द्रियों का यह समुदाय जो
राजसगुण से उत्पन्न होता है, वह अपने गुण में जाकर लुप्त हो जाता है।
योनिवैकारिके सौम्य लीयते मनसीश्वरे।
शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभुः ॥ २५ ॥
जो वैकारिक सत्त्वगुण है, वह देवता तथा अंतःकरण भी उत्पन्न करता है। वह भी प्रलय के स्वभाव धर्म
के अनुसार स्वयं मन में प्रवेश करता है। मन सभी इन्द्रियों का राजा है। 'जीवत्व' और 'शिवत्व' भी मन की ही
कल्पना है। श्लोक में वर्णित 'मनसीश्वर' शब्द से श्रीकृष्ण पूर्ण रूप से मन के ही विषय में बोल रहे हैं।
मनोदेवता अंतःकरण के साथ सत्वगुण में प्रविष्ट होती है। कार्य-विशेष का जो कारण होता है वहीं वे जाते हैं।
फिर पहले से बचे हुए शब्दतन्मात्र, तामस में जाकर एकरूप होते हैं। उद्धव! वास्तव में कारण में ही कार्य का
विलय होता है, इसे ध्यान में रखो। तीन गुणों से युक्त अहंकार एकत्र होकर अत्यन्त प्रबल हुआ रहता है। उसकी
महत्ता भी सुन लो। संसार में वह महाकठिन है। वह शिव का महत्त्व बढ़ाता है। जीव को देहात्मा में उलझा देता
है और अहंता से सारे संसार पर मोहिनी डालता है। उसके इस सामर्थ्य के कारण ही उसका महत्त्व है। ऐसा है
अहंकार! वह यदि परमार्थ में सहायक बन जाय तो सोहंभाव (ब्रह्म मैं ही हूँ उस भावना के) के योग से तत्काल
संसार का विनाश कर दे। चोर ही जब विश्वासपात्र मित्र बन जाता है तो वह चोर ही अन्य चोरों का निवारण
करता है। उसी प्रकार जब अभिमान ही सहायक बनता है तो संसारभय की बाधा नहीं होती। उद्धव! इस प्रकार
अभिमान सामर्थ्य सम्पन्न होने के कारण ही मैंने उसकी महत्ता का वर्णन किया। तीन गुणों से उत्पन्न यह
गुणाभिमान, पूर्णरूप से एकत्र होकर महत्तत्त्व में विलीन होता है और उससे एकात्मता प्राप्त करता है।
स लीयते महान् स्वेषु गुणेषु गुणवत्तमः।
तेऽव्यक्तेसम्प्रलीयन्ते तत् काले लीयतेऽव्यये ॥ २६ ॥
इस समय वह महत्तत्त्व भी कारणगुणों में लीन था और गुण साम्य के कारण सचमुच ही अव्यक्त में (मूल
माया में) लीन था। उस समय जब समस्त आकार-विकार नष्ट हो जाते हैं, तब केवल बीज शेष रह जाता है।
उसे ही 'अव्यक्त' कहते हैं। वट का न आकार है न विकार है, न अग्र है, न मूल है, न पत्र है न पुष्प है, अवशेष
केवल बीज रहता है, उसी प्रकार यह संसार अव्यक्त में ही रहता है। वट का यह बीज आँखों को दिखायी भी
नहीं देता। उसी प्रकार संसार का बीज भी अव्यक्त ही रहता है, वह जीव को सरलता से दिखायी नहीं देता।
अनेक प्रकार के तृण के बीज गर्मी में काल जमींदोज कर देता है, उसी प्रकार अव्यक्त रहने वाला संसार बीज
भी काल से एकरूप हो जाता है। देखिये इसी को अव्यक्त का काल में विलय कहते हैं। काल को ही महाबाहु
कहते हैं। उसका विलय पुरुष में होता है।