श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 691, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंपच्चीसवाँ अध्याय ६७५
का विकास भूसे में छिपा रहता है और भूसे के साथ ही वह पुष्ट होता रहता है। लेकिन उसी दाने को प्राप्त करने
के लिये भूसे को छाँट देना पड़ता है। उसी प्रकार ब्रह्मसुख की ही तरह देह का भी मोह होता है, लेकिन वही
ब्रह्मसुख जब हाथ तक पहुँचता है तो देह का विषयरूपी भूत खराब लगने लगता है। उसी प्रकार विषय प्रेम
छोड़कर जिसे ब्रह्मसुख में सुखप्राप्ति होती है, उसे ही हे उद्धव! सच्ची 'आत्मनिवृत्ति' कहते हैं। इन पन्द्रह
लक्षणों की स्थिति जिसमें रहती है, वही शुद्ध सत्त्व की मूर्ति है। अब 'आदि' शब्द से शोधित सत्त्व की सत्त्वृत्ती
भी श्रीकृष्ण बताते हैं। समस्त प्राणीमात्र के प्रति भगवान की भावना रखकर उनके प्रति निष्कपट बुद्धि रखना
इसी का नाम है सारे गुणों की अवस्था का छेदन करने वाली शुद्ध सात्त्विकता। इस प्रकार सात्त्विक के पास
सत्त्वगुण पूर्णरूप से रहता है। अब रज का लक्षण स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
काम ईहा मदस्तृष्णा स्तम्भ आशीर्भिदा सुखम्।
मदोत्साहो यशः प्रीतिर्हास्यं वीर्यं बलोद्यमः ॥ ३ ॥
काम का अर्थ है विषयों की हवस। जिस प्रकार काष्ठ आदि से अग्नि बढ़ता है उसी प्रकार काम की इच्छा
पूरी करते-करते काम की हवस भी बढ़ती जाती है। इसका नाम काम है। काम की जो क्रिया हे, वही पूर्ण ईर्षा
है। सम्पादित विद्या का अत्यन्त गर्व होना ही मद का लक्षण है। अर्थप्राप्ति होने पर भी वासना की तृप्ति नहीं
होती। ऐसी निरन्तर बढ़ती जाने वाली आसक्ति का ही वास्तविक नाम तृष्णा है। उद्धव! अत्यन्त अहंकार से जो
स्तब्धता आती है, आँखों के सामने कोई दिखायी नहीं देता, इसी का नाम स्तंभावस्था है। पैसा प्राप्त करने के
लिये इष्टदेवता की प्रार्थना करना और उसके पास प्रापंचिक सुख माँगना इसी का नाम आशा है। भिदा का अर्थ
है, भेद। प्रपंच का भान होना और 'यह मेरा' और 'यह तेरा' इस भाषण का नाम भिदा है। राजस सुख की एक
बात अद्भुत है। वह यह कि विषयसुख के जो सारे भोग हैं उसे ही लोग उत्तम सुख मानते हैं। वीर को युद्ध में
वीरश्री का संचार होना अथवा साधारण मनुष्य का पुत्रप्राप्ति के कारण उत्साहित होना अथवा परिवारजनों के
विवाह आदि समारोहों में इष्टमित्रों का उत्साहित होना, इसे 'महोत्साह' कहते हैं। शास्त्रवाद में विजयी होना
अथवा युद्ध में शत्रु को पराजित करना और इससे लौकिक दृष्टि से प्रसिद्ध होना, इसी का नाम यश है। उद्धव!
चारणों के माध्यम से अपनी यशगाथा का दिगंत में प्रसार करना इसी का नाम यशःप्रीति है। उद्धव! कविताबद्ध
भाषण सुनकर, अथवा उपहास से विनोद चलता देख राजस को हँसी आ जाती है। वह 'हास्य' प्रसिद्ध ही है।
वीर्य अर्थात् अत्यन्त प्रबल शरीर-सामर्थ्य का प्रदर्शन, इसी का नाम वीर्यशाली होना है। राजा के बल पर व्यापार
करना, सीनाजोरी का व्यवहार करना, न्याय को छोड़ स्वार्थ साधना, इसी का नाम 'बलोध्यम्' अर्थात् सीनाजोरी
है। जिसके पास ये सभी पन्द्रह लक्षण हों, उसे जीवभाव से 'राजस' समझना चाहिये। जो केवल अविचार की
ही सम्पत्ति है, उसे 'तामस' की वृत्ति समझना चाहिये। सोलह लक्षणों में उसकी स्थिति बताता हूँ।
क्रोधो लोभोऽनृतं हिंसा याच्ञा दम्भः क्लमः कलिः।
शोकमोहौ विषादार्ती निद्राऽऽशा भीरनुद्यमः ॥ ४ ॥
क्रोध काम की परिपूर्ण तथा बढ़ी हुई स्थिति लोभ का अर्थ है कंजूसी। अमृत का अर्थ है मिथ्या भाषण।
हिंसा का अर्थ है, दूसरे को पीड़ा पहुँचाना। याच्ञा का अर्थ है जी हुजुरी करना। दंभ का अर्थ है अतिसम्मान प्राप्त
करने के लिये किया हुआ ढोंग। वलम का अर्थ है अत्यन्त परिश्रम के कारण आने वाली थकावट और बिना
किसी कारण के झगड़ा-बखेड़ा करने का अर्थ है कलि। शोक का अर्थ है हाहाकार। मोह का अर्थ है भ्रम की