श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 693, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंपच्चीसवाँ अध्याय ६७७
महान योद्धा हूँ, मैं ही शत्रु का संहारकर्त्ता हूँ, मैं सब में अजेय हूँ, यह समझना तामस अहंकार है। ममता का
स्फुरण गुणानुरूप तीन प्रकार के स्वरूपों से होता है। इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्पष्ट करके बताते हैं। 'मेरे
हृदय में जो भगवान है, वही भगवान सभी प्राणियों के हृदय में है। समस्त प्राणी मेरे ही हैं' ऐसा समझना यही
शुद्ध सात्विक गुण की ममता है। उद्धव ! जो भक्त संत, साधु, सज्जन हैं, वही मेरे सगे सम्बन्धी हैं ऐसी जो पूर्व
ममता होती है वही सात्विक ममता है, यह जान लो। जीव से अधिक प्रेम सद्गुरुचरणों पर करना यह जो ममता
का प्रकार है वह भी सात्विक ही है। जिस देवता की उपासना करनी हो उसके अनुसार शैव अथवा वैष्णव की
दीक्षा लेना अथवा देवधर्मों पर परिपूर्ण ममता रखना, यह भी सात्विक ममता ही है। शैव अथवा वैष्णव धर्म पर
ढोंग न कर उस पर इच्छा रहित ममता रखना यह सात्त्विक ममता है। अब राजस की स्थिति सुनो। निवृत्ति मार्ग
को मिथ्या समझना, केवल लौकिक भाग को ही मानना, लौकिक में मान-सम्मान की इच्छा रखना, ऐसी ममता
राजसी है। प्रपंच से प्रेम रखना, लौकिक में चाह होना, नामरूप का झंडा फहराना, यह सच्ची राजसी ममता है।
पत्नी, बच्चे मेरे हैं, शरीर संबंधी आप्तजन एवं परिवारजन को अपना समझना, धन का लोभ करना, ऐसी बुद्धि
को राजस समझना चाहिये। जिन देवताओं की भक्ति करने से नाम, रूप और धन प्राप्त होता है, वे देवता अच्छे
लगते हैं ऐसी ममता रजोगुणी है। काम्यकर्मों की चाह रखना, सकाम कर्म करने वालों को अपना समझना,
स्वर्गादि विषय सुख को सच्चा मानना यह ममता राजस है। रजोगुण की यह ममता मैंने तुम्हें यथार्थ रीति से
समझायी। अब तमोगुण का जो स्वरूप है उसकी व्यवस्था भी बताता हूँ, सुनो। जो अपने देह का अपमान करता
है अथवा जो पूर्वजों से द्वेष करता है, उनके बाल-बच्चों से बैर करता है उसकी वह निष्ठुर बुद्धि तामस है। आगे
बच्चों के भी बच्चों से जो हमारी जमीन जायदाद की देखभाल कर अपनी उपजीविका चलायेंगे उनसे तामसी बैर
करता है, ऐसे मेरे पूर्व के शत्रुओं को मैं जान से मारूँगा और इसके लिये जारण मारण अभिचार कर्म करता है,
उसकी ममता सचमुच तामसी है। अभिचार कर्म का मंत्र जानने वालों को वह अपना इष्ट और सगा समझता है,
शाकिनी, डाकिनी आदि की उपासना करता है, यह पूर्णरूप से तामसी ममता है। यह वर्णन पर्याप्त हो गया।
प्रत्येक गुण में अनेक शक्ति है। ये तीनों गुण जहाँ मिल जाते हैं उसे 'सन्निपात वृत्ति' कहते हैं। कफ, वात और
पित्त जहाँ एकत्र होते हैं, वही सन्निपात उत्पन्न होता है। उसी प्रकार यहाँ भी तीन गुणों का सन्निपात होता है।
संकल्प विकल्पात्मक मन, पंचविषय, पंचप्राण आदि दशेन्द्रियों का सम्पूर्ण व्यवहार इसी में तीन गुणों का
सन्निपात होता है। उसी सन्निपात का निरूपण अर्थात् तीन गुणों का मिश्र लक्षण-जिसे मिश्रगुण सन्निपात कहते
हैं- उसे श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
धर्मे चार्थे च कामे च यदासौ परिनिष्ठतः।
गुणानां संनिकर्षोऽयं श्रद्धारतिधनावहः ॥७॥
पुरुष में क्षण-प्रतिक्षण, क्रिया, कर्म, स्वधर्म, काम धन प्राप्त करने का उद्योग जैसी भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों
का उद्भव होना, यही त्रिगुणों का सन्निपात है। गुणों का यह मिश्रण क्या करता है ? तो इन तीन गुणों से धर्म तीन
प्रकार का होता है, काम तीन प्रकार को होकर रहता है और अर्थ, स्वार्थ और निर्वाह ये भी तीन प्रकार के हो
जाते हैं। इसमें कर्म का दोष नहीं है। दोष कर्त्ता की बुद्धि में होता है। वह जो कुछ भी कल्पना करता है, उसका
फल स्वयं भोगता है। सुवर्ण अपने सोने के रूप में ही सम्माननीय है, यदि उसका श्वान बना दिया जाय तो वह
उसका उपहास होगा। उसी प्रकार स्वकर्म गुणबुद्धि से दूषित होता है। भूमि मूलतः शुद्ध है। उसमें जैसा बीज