श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 689, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंपच्चीसवाँ अध्याय ६७३
भगवान ने किया है और उसी में अहंभाव छोड़ दिया जाय यह निश्चित किया है। सचमुच, मेरे सामर्थ्य से मेरा
'मैं'पन नहीं जाएगा और निर्लज्ज की तरह श्रीकृष्ण से कितनी बार पूछें? उद्धव के मन की यह चिन्ता श्रीकृष्ण ने
जान ली। श्रीकृष्ण अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त कृपालु होने के कारण वह अहंता नष्ट करने के उपाय बताने
लगा। आज उद्धव का भाग्य पूर्णरूप से प्रकट हो गया। संसार में उद्धव ही अत्यन्त धन्यवाद का पात्र है। जिस
पर श्रीकृष्ण प्रसन्न हो उठा उसे प्रश्न किये बिना ही अपना रहस्य बताने लगा। क्या बालक बताता है कि उसे
भूख लगी है? और तब माँ उसे स्तनपान कराती है? नहीं। वह तो अपने अंतःकरण की व्यथा से स्वयं ही
दौड़कर उसके पास जाती है और उसे स्तनपान कराने लगती है। लेकिन श्रीकृष्ण के मन में उद्धव के प्रति
व्याकुलता उससे कई गुना अधिक थी। अपने भक्तों के भक्ति का महत्त्व मन में आते ही श्रीकृष्ण का अंतःकरण
व्याकुल हो उठता था। बच्चे को अपनी चिन्ता नहीं होती लेकिन माँ ही उसका हित करने की ओर प्रवृत्त होती
है। उसी प्रकार उद्धव का हेतु पूर्ण करने के लिए श्रीकृष्ण व्याकुल थे। उद्धव में जो कोई कमी हो उसे पूरा करने
के लिये श्रीकृष्ण तैयार थे। उसने उसे अपने निर्गुण का उपदेश किया। पचीसवें अध्याय में गुणों पर किस प्रकार
विजय प्राप्त की जाय इसका लक्षण बताकर वह अपना निर्गुण भी दिखला देगा। यही एकनिष्ठा का निरूपण है।
प्रकृति पुरुषों का बुद्धिपूर्वक विचार हो गया लेकिन जब तक गुणों पर विजय नहीं प्राप्त होती तब तक सुख-
दुःख और अहंभाव तो बढ़ेगा ही। तीनों गुणों से देह तैयार हुआ है। इसलिये देह में गुणों की विजय नहीं होती
क्योंकि अपने ही मूल का उच्छेद करने के लिये कोई तैयार नहीं होता। डंडा वृक्ष में ही उत्पन्न होता है लेकिन
वह कुल्हाड़ी के साथ मिलकर उससे वृक्ष का उच्छेद करवाता है। उसी प्रकार विवेक से सद्गुण मिलता है और
तीनों गुणों का समूल उच्छेद कर डालता है। इससे मूल का निर्गुणत्व अपने आप प्रकट होता है। तब गुणों का
छेदन भी मिथ्या ही है। तीनों गुण ही मिथ्या हैं और निर्गुणत्व ही नित्य और सत्य है। इसी अर्थ का निरूपण
श्रीकृष्ण स्वमुख से कर रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
गुणानामसमिश्राणां पुमान् येन यथा भवेत्।
तन्मे पुरुषवर्यैदमुपधारय शंसतः ॥ १ ॥
जिसके चरणस्पर्श से सारी पृथ्वी पवित्र होती है; जिसके नाम से त्रैलोक्य का उद्धार होता है, जिसके गुणों
की कीर्ति श्रवण करने से महापातकों का भी विनाश हो जाता है; जिनके मृदु, मधुर एवं विपुल नाम का उच्चार
करने से परम संतोष होता है, वह पुरुषोत्तम परम प्रीति से उद्धव से बात करने लगा। सत्व, रज और तम ये तीनों
गुण मिले बिना जब भिन्न-भिन्न रहते हैं उस समय पुरुष के पास जो भिन्न-भिन्न एक गुण होता है, उससे कौन-सा
चिह्न दिखायी पड़ता है, उसे सुनें। मेरा यह भाषण जो निःसन्देह, सावधान और निर्विकल्प होकर सुनेगा वह स्वयं
ही परिपूर्ण पुरुषोत्तम हो जायेगा। मेरे स्वरूप के प्रति सद्भावना रखना यही पुरुष की उत्तम अवस्था होगी। मेरे
भाषण पर विश्वास करने से पुरुषोत्तम स्वयं घर पर आते हैं। ऐसा यह उत्तम से उत्तम निरुपम और निर्गुण स्थान
को यदि तुम मुझ पर विश्वास करो तो मैं तुम्हें सौंपता हूँ। उद्धव भक्ति भावार्थ में अत्यन्त श्रेष्ठ, वचन पर विश्वास
करने में तो अग्रगण्य हैं इसलिये श्रीकृष्ण अपने मुख से उसे 'हे पुरुषश्रेष्ठ' कह कर बुलाने लगे। इस संसार में
अनेक योनियाँ हैं। उनमें मनुष्य सबसे उत्तम है। उसमें भी सुदृढ़, अव्यंग, सम्पूर्ण अवयवों से युक्त तथा किसी भी
प्रकार की कोई कमी न हो ऐसा देह होना चाहिये। ऐसे सारे देहों में पुरुष देह ही सबसे श्रेष्ठ हैं। उसमें भी