श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 685, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय ६६९
कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे।
आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः ॥ २७॥
पुरुष की क्षुब्धावस्था को ही वास्तव में काल कहते हैं। उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय ये तीनों अवस्थाएँ काल
की ही हैं। ये तीनों अवस्थाएँ समाप्त होने पर काल का वहाँ कोई काम नहीं रहता। इसलिये वह स्वाभाविक
व्यापार से ही जीव में एकरूप होता है। जो अचेतन को चेतना देने वाला है और जड़ को सजीव करने वाला है,
उस पुरुष को इसी गुण के कारण 'जीव' कहा गया है। प्रकृति के योग से शुद्ध को ही जीव कहते हैं, उसे ही
'पुरुष' की संज्ञा देते हैं। यदि प्रकृति के बारे में विचार करें तो वह केवल मृगजल की तरह है। वह प्रत्यक्ष
दिखायी देती है लेकिन उसमें 'सत्यता' बिलकुल नहीं है। मृगजल में जो गिरेगा, वहाँ जब 'पानी' है ही नहीं तो
वह डूबेगा कैसे ? उसी प्रकार प्रकृति के न होने पर 'जीवत्व' किससे जुड़ेगा ? समुद्र की ओर देखें तो पानी में
आकाश डूबा हुआ दिखायी देता है लेकिन उसे सच मानना मूर्खता है। उसी प्रकार रूप, नाम, गुण, कर्म यह सब
माया का भ्रम है। उद्धव ! प्रकृति के अस्तित्व काल में भी 'जीवत्व' सत्य नहीं है। उस सम्बन्ध की सत्यता भी
पूर्णरूप से बताता हूँ। जब हम दर्पण में देखते हैं तो वहाँ हम स्वयं देखते हैं। लेकिन फिर भी हम अलग से हैं
ही ऐसा हम समझते हैं। उसी प्रकार उद्धव ! प्रकृति के अनुरोध से कर्म करते समय यद्यपि मैं उसके भीतर
दिखायी देता हूँ, फिर भी मैं प्रकृति से भिन्न हूँ, यह ध्यान में रखो। आकाश पानी में डूबा हुआ दिखायी देता है
फिर भी वह गीला नहीं होता। उसी प्रकार प्रकृति का कर्म मैं भले ही करूँ लेकिन उसमें मेरा अंग लिप्त नहीं
होता। इस प्रकार विचार करने से प्रकृति का ही अभाव हो जाता है और उसके कारण 'जीव' और 'शिव' ये नाम
भी व्यर्थ हो जाते हैं क्योंकि जो 'जीव' है वही परमात्मा है, इसे ध्यान में रखो। 'जीव' का 'जीवत्व' समाप्त होने
पर सहज ही 'शिवत्व' भी समाप्त हो जाता है और दोनों ही आत्मस्वरूप से परिपूर्ण हो जाते हैं। जीव को
आत्मस्वरूप का स्मरण होना इसी का नाम है जीव का परब्रह्म में विलीन हो जाना। वह परमात्मा अजन्मा,
अव्यय, अविनाशी, अद्वय और अनन्त है। ब्रह्म में जब ब्रह्मस्वरूप में ही स्फुरण नहीं होता तो वहाँ 'मैं' और 'तू'
कहेगा कौन ? उद्धव ! उस समय परिपूर्ण परमानन्द ही शेष रहता है। ऐसा परमानन्द कौन है ! जो अज, अव्यय,
आनन्दस्वरूप ऐसा जो श्रीकृष्ण मैं हूँ, वही परमानन्द स्वरूप है, यह जान लो। उस परमानन्द को मेरे सिवा कोई
स्थान ही नहीं है। उद्धव ! और जिस स्वानंद का नाम श्रीकृष्ण है, वही तुम्हारा भी स्वरूप है। उसमें 'मैं' या 'तू'
वाला भाव नहीं है। केवल परमकारण ही शेष रहता है। उद्धव ! तुम्हारे जीव का जो जीव है वह मैं श्रीकृष्ण ही
हूँ। मुझमें और तुझमें कोई अलगाव नहीं है। इसीलिये जीव का परम कारण यह मेरी पहचान मैंने तुम्हें बतायी।
मैं श्रीकृष्ण सारे संसार का आत्मा हूँ और मेरा पूर्ण आत्मा, उद्धव तुम हो। श्रीकृष्ण का यह भाषण सुनकर उद्धव
भौंचक्का हो गया। कृष्ण मुझे अपना आत्मा कहता अवश्य है किन्तु कृष्ण की महिमा भी मैं नहीं जानता।
पुरुषोत्तम की लीला अगाध है। वह हमारी समझ में कैसे आयेगी? व्यर्थ का ही उद्धवपन मुझमें आ गया है।
लेकिन कृष्ण की दृष्टि से देखें तो मुझे मेरा 'मैं' पन नहीं दिखायी देता। मैं अपना उद्धवपन छोड़ दूँ तो कृष्ण
सचमुच निजधाम को चले जायेंगे। वह दुःखद प्रेमावस्था मैं सहन नहीं कर पाऊँगा। उद्धव की यह स्थिति
श्रीकृष्ण की समझ में आ गयी इसलिये उससे सम्बन्धित कथा वह सुनाने लगा।
एवमन्वीक्षमाणस्य कथं वैकल्पिको भ्रमः।
मनसो हृदि तिष्ठेत व्योम्नीवार्कोदये तमः ॥ २८॥