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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 676, कुल 869 में से

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पृष्ठ 676

वे सब उनके भूषण हो जाते हैं। इसी का नाम है मेरी भक्ति की प्रसन्नता। सायुज्यादि जो चार मुक्तियाँ हैं, वे सब
वहाँ उनकी सेवा में उपस्थित रहती हैं, वे जहाँ विषय सेवन करने लगते हैं, वहाँ सायुज्य मुक्ति ही उनकी सेवा
करती है। ऋद्धि-सिद्धि उसके घर की दासी बन कर रहती हैं, फिर भी वह उनकी इच्छा नहीं करता। उसकी
सारी दारोमदार मेरी भक्ति पर ही रहती है। निश्चयपूर्वक की हुई ऐसी भक्ति देखकर मैं भी उस पर अनन्य प्रीति
करता हूँ। भक्त जहाँ मेरी बाट जोहते हैं, वहाँ मैं लक्ष्मीकांत स्वयं ही प्रकट होता हूँ। भक्त सहज ही जो बात
करता है, वह बात मैं स्वयं ही बन जाता हूँ। उसकी बातों में अंतर्बाह्य मैं ही शब्दार्थरूप में रहता हूँ। वह मौज में
कंकड़ से खेलने लगता है तो वह कंकड़ भी मुझे ही बनना पड़ता है। वह कृपालु होकर जिसकी ओर देखता है,
उसके मजबूत सांसारिक बन्धन मैं तोड़ देता हूँ। वह जिधर दृष्टि घुमाता है, उधर मैं सुखों की सृष्टि बना देता हूँ।
वह जिसका उद्धार करने के लिये कहे, उसे मैं अपने पद पर आसीन कर देता हूँ। उस पर जरा सा भी संकट आ
जाय तो उसे समाप्त करने के लिये मैं दौड़ पड़ता हूँ। जो भी उसका नाम लेते हैं, उनका मैं पूर्णरूप से उद्धार
करता हूँ। नन्हे बालक की चिन्ता जिस प्रकार उसकी माँ को होती है, उसी प्रकार मुझे भक्तों की चिन्ता रहती है।
उनकी सेवाचाकरी करने में मैं जरा भी नहीं शरमाता। माँ जिस प्रकार अपने बच्चों का लाड़-प्यार करती है, उसी
प्रकार मैं उनसे लाड़-प्यार करता हूँ। उनका प्रेम ही मुझे प्यारा लगता है। अन्य उपचारों की मुझे इच्छा ही नहीं
है। मैं शरीर हूँ और वह मेरा आत्मा है। प्यारा भक्त ही हमें अच्छा लगता है। भक्ति की महिमा कितनी ही महान
क्यों न हो लेकिन प्रिय व्यक्ति पर उसकी मात्रा का प्रभाव नहीं होता। प्रेमी के पास ही भक्ति की मर्यादा समाप्त
होती है। शायद काल उसका संहार करेगा इसलिये उसके भीतर और बाहर मैं अपने शरीर का किला ही तैयार
करता हूँ। प्रेमियों का मुझ पर इतना अधिक प्रेम है। ऐसी स्थिति में काल के ही भय से मैं अपने भक्तों को
ब्रह्मस्वरूप के मार्ग पर लगाता हूँ और अत्यन्त ध्यानपूर्वक उन्हें अपने स्वरूप में पूर्णरूप से आत्मसुखी बनाकर
रखता हूँ। ऐसे भक्तों का जो स्वाभाविक कृत्य है, वही मेरी प्रीति की पूजा है। वह जो देखता है, वही मेरा दर्शन
है और वह जो कुछ बोलता है वही मेरा वास्तविक स्तोत्र है। वह स्वयं जो भोजन करता है, वही मेरे लिये नैवेद्य
समर्पण है। उसकी निद्रा ही मेरी पूर्ण समाधि है। उसकी आँखों का खुलना बन्द होना मुझे बड़ा अच्छा लगता है।
उसका श्वासोश्वास मुझे अत्यन्त सुख प्रदान करता है। भक्तों के शरीर की जो स्वाभाविक स्थिति रहती है उससे
मैं लक्ष्मीपति अत्यन्त आनन्दित होता हूँ। ऐसे प्रेमी भक्त मुझे बहुत भाते हैं। मेरे भक्तों पर मेरी एकनिष्ठ प्रीति
रहती है। जो भक्त चारों पुरुषार्थों का स्पर्श नहीं करते और चारों मुक्तियों को दूर कर प्रेम से मेरी ही भक्ति करते
हैं, वे मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त करते हैं। गंगा समुद्र में मिलकर एकरूप से उसमें ऐसे मिल जाती है कि वह गंगा
ऐक्य रूप से उसकी ही होकर उस पर लोटने लगती है। उसी प्रकार मेरा भक्त भक्ति के सामर्थ्य से मुझसे
मिलकर मेरी भक्ति का सुख मुझमें ही भोगता है। युवा स्त्री यौवन के मद से सर्वांग से उस यौवन का उपभोग
करती रहती है, उसी प्रकार भक्त मुझसे मिलकर मेरी भक्ति का वैभव भोगता रहता है अथवा सत्रहवीं कला का
माधुर्य चन्द्रमा स्वयं ही जानता है, उसी प्रकार मैं बन कर मेरा भजन किस प्रकार किया जाय यह सज्ञानी भक्त
जानते हैं। वैसे जाति, स्वभाव के अनुसार सभी स्थानों का जल एक जैसा होता है किन्तु वही जल गंगा, यमुना
इन नामों से प्रयाग में एकत्र होता है और उस संगम पर लोगों का उद्धार करता है। उसी प्रकार मुझसे ऐक्य होने
पर भाविक भक्त भी बड़ी योग्यता प्राप्त करता है। उसके अनुसार मेरे भक्त मुझसे मिलकर एकनिष्ठ होकर मेरा
भजन करते हैं। ऐसे भजन से, मेरे साथ ऐक्य होने के कारण भाविक, सात्त्विक और अत्यन्त दीन लोगों का
उद्धार होता है। पृथ्वी तो सम्पदा से भरी हुई है ही लेकिन भाग्यवान के बिना उस द्रव्य की प्राप्ति नहीं होती।