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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 677, कुल 869 में से

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पृष्ठ 677

चौबीसवाँ अध्याय ६६१

चारों पुरुषार्थों को छोड़कर जो चारों युक्तियों की उपेक्षा करते हैं और पाँचवें पुरुषार्थ की भक्ति करते हैं, वही
उद्धव ! मुझे प्रिय है। ऐसी ही भक्ति से मैं प्रेम करता हूँ। ऐसे ही भक्त मेरे लाडले रहते हैं। मुझ जैसे निरिच्छ को
उनका कौतुक होता है। उनका प्रेम मधुर होता है। हम प्रेम के अतिथि और भाव के सेवक हैं। मुझ एकनिष्ठ की
जीव प्राण से सर्वस्व सेवा करें। मेरा नाम आत्माराम है। मेरी सारी इच्छाएँ नष्ट हो चुकी हैं। फिर भी मैं अपने
प्रिय भक्तों की इच्छा मन में रखता हूँ क्योंकि मेरे प्रति उनका प्रेम अत्यन्त मधुर है। फिर मैं अपने प्रिय भक्त को
अपने साथ कर लेता हूँ और अन्त में उसे अपना ही सुख देता हूँ क्योंकि मुझे प्रेम से अत्यन्त प्रेम है। प्रेम मुझसे
भी अधिक मूल्यवान है। मैं उसकी बराबरी नहीं कर सकता इसलिये यदि मैं अपना सुख उसे नहीं दे पाता तो मैं
उसका ईमानदार सेवक बनकर रहता हूँ। प्रेम की सच्ची आत्मीयता और भावार्थ का लक्षण जानने वाला एक मैं
श्रीकृष्ण ही हूँ। अन्य लोग इसे नहीं जानते। मुझे गोपियों के सान्निध्य में सुख मानने का क्या कारण था ? लेकिन
उनका प्रेम अत्यन्त निर्मल था, इसीलिये उद्धव ! मेरे मन में उनके प्रति अतीव चाह उत्पन्न हो गयी। क्या कुब्जा
सुन्दर थी ? लेकिन मुझे उसके प्रेम की चाह थी। मैं वन में जाकर राधा की प्रार्थना करता था, वह क्या
विषयासक्ति के लिये ? गोपालों ने भी कितनी भक्ति की ! क्या वे छूत थे या अछूत थे ? लेकिन उनके जूठे कौर
मैंने खाये और उनके प्रेम में डोलता रहा। क्या मैं पाण्डवों का ऋणी था ? लेकिन उनके लिये मैंने अनेक कष्ट
सहे। मैंने सुदामा के चरण छुए। क्या मैं उसके उपकारों का ऋणी था ? क्या मेरे पास अन्न की कमी थी इसलिये
यज्ञपत्नियों के पास अन्न माँगने गया था ? मैं प्रेमभाव का भूखा हूँ इसलिये प्रेम का आतिथ्य लेने गया था। मुझे
गोपियों ने रस्सी से बाँध रखा था, उस समय क्या मेरी शक्ति बन्धन में रहने के लिये क्षीण हो गयी थी ? लेकिन
उनके प्रेम से ही मेरा पोषण हो रहा था। किसी का एक कौड़ी का भी कर्जदार न होते हुए मैं अर्जुन के घोड़ों को
नहलाता था। धर्म के घर की मैंने जूठन भी उठायी। इस प्रकार मुझे प्रेम की अत्यन्त चाह है। वह चाह मेरी
लौकिक दृष्टि से लाज लज्जा भी नष्ट करती है और मैं अपने बड़े-बड़े काम भी भूल जाता हूँ। उनकी सेवा
करने की मुझे इतनी लगन है। माँ सारे अलंकार पहनाकर बच्चे को अपने माथे पर बिठाती है। उसका लाड़
करती है और यदि इस बीच वह माँ पर थूकता है या पेशाब कर देता है तो उससे घृणा नहीं करती। उसी प्रकार
मेरे प्यारे भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय हैं, मैं श्रीकृष्ण अपने भक्तों का अंकित होकर रहता हूँ और प्रेमवश सदा उनके
आगे-पीछे खड़ा रहता हूँ। उद्धव ! मेरा यादवों का इतना बड़ा गोत्र है लेकिन केवल तुम ही मुझे इतने प्रिय लगते
हो। इसका कारण यही है कि तुम्हें मेरे प्रति अद्भुत प्रेम है ? भगवान का यह भाषण सुनकर उद्धव ने उनके पैर
पकड़ लिये। भगवान को भी अंतःकरण में अत्यन्त आनन्द हुआ और उन्होंने उद्धव को तत्काल आलिंगन दिया।
हृदय में हृदय एकरूप हुआ, देह का देह से आलिंगन हुआ, मन से मन मिला, तो आत्मानंद आकंठ भरकर बहने
लगा। देवता अपना देवत्त्व भूल गये और भक्त को अपना भक्तपन विस्मृत हो गया। दोनों का द्वैत नष्ट होकर वे
आत्मानन्द में पूर्णरूप से मग्न हो गये। सेव्य और सेवक का भेद ही समाप्त हो गया। द्वैतभाव की दृष्टि ही बन्द
हो गयी। आत्मा की एकता से भक्ति साम्राज्य के सिंहासन पर दोनों की भेंट हुई। स्थूलदेह, लिंगदेह और
कारणदेह इन्हीं से देखा चौथा महाकारण, लेकिन उस समय उसका स्मरण किसे होता ? इसलिये घना और
परिपूर्ण आनन्दमय स्वरूप, जिसे न आदि है न अन्त है वह साक्षात् प्रकट हुआ किन्तु भगवान की परिपूर्णता का
अद्भुत चमत्कार है। उसने वहाँ भी चमत्कार किया, उसने उद्धव को उसके अस्तित्व का भान नहीं जाने दिया
क्योंकि उसने मन ही मन कहा कि मुझे ऐसा भक्त नहीं मिलेगा। अपने मन की बात कहने के लिये मुझे उद्धव के
सिवा और कौन मिलेगा ? मेरे मन में जो मधुर बातें हैं उन्हें मैं आहिस्ता-आहिस्ता किसे सुनाऊँगा ? मेरे निजधाम