श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 688, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंपच्चीसवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप निर्गुण देव! तुम्हें नमस्कार है यह कहना चाहें तो गुण कहीं दिखायी नहीं पड़ता और गुण
के बिना निर्गुणपन तो कभी नहीं आयेगा। इसलिये निर्गुणपन कभी नहीं होता। लेकिन सगुणपन भी तुम स्वीकार
नहीं करते। इस प्रकार तुम गुण अथवा अगुण को स्पर्श नहीं करते। इसलिये हे गुरुराया! तुम पूर्णतयः अगुणी हो।
उसी प्रकार तुम अगुणी के विपरीत गुणी हो। लेकिन तुम त्रिगुण के गुणों का विनाश कर देते हो। संसार में
पंचमहाभूतों से मुक्ति दिलानेवाला एक जनार्दन ही है। जिसके योग से दुष्टजनों का संहार होता है, जिसके योग
से लिंगदेह का नाश होता है, जो जीव को जीव से ही जान से मारता है वह जनार्दन कृपालु कैसे होगा? लेकिन
जनार्दन का कृपालुपन लोग बिलकुल नहीं जानते। न समझने का कारण यही है कि वे देहाभिमान नहीं छोड़ते।
जननी के पेट से जन्म होता है इसलिये मनुष्य को 'जन' कहते हैं। उस 'जन' के जन्म का ही संहार करता है,
इसलिये उसे जनार्दन कहते हैं। मृत्यु को ही मारकर आयु बढ़ाता है, जीव को मारकर उसे जीवन प्रदान करता है
और देह में ही विदेह की स्थापना करता है ऐसी जनार्दन की कृपा है। जन जो भी इच्छा करता है, उसे जनार्दन
पूरा करता है। जो पूर्ण समाधान चाहता है, उसका देहाभिमान नष्ट कर डालता है। लेकिन जनार्दन के सामने
अहंकार आया ही कब था? अगर आ जाय तो वह हाथ में शस्त्र लेकर उसके टुकड़े-टुकड़े कर देगा। जिस
प्रकार सूर्य के प्रकाश से अन्धकार के साथ रात्रि समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार जनार्दन के नाम के सामने
अहंकार कब तक टिक पायेगा? गुरुनाम का घोष होते ही अहंकार पूर्णरूप से विलीन हो जाता है। फिर ऐसे
गुरुनाम के सामने दुःखदायी संसार कब तक टिक पायेगा? इच्छा से जिसके नाम का स्मरण करें तो वह संसार
का बाँध तोड़ डालता है, जीव का जीवबन्धन तोड़ देता है, उसके उस नाम का माधुर्य मोक्ष को भी लज्जित
करता है। जिसका नाम मोक्ष से भी ऊँचा पद दिलाता है उसकी कृपा के बारे में मैं यहाँ क्या कहूँगा? लेकिन वह
नामप्रताप भी जिसकी बराबरी नहीं कर सकता उस सद्गुरु की महिमा हमें किस प्रकार मालूम होगी? निरूपम
को कौन-सी उपमा दी जाय? गुरु की कीर्ति अगाध और गहन है। उसके गुणों की गिनती करना चाहें तो वे
अनंत हैं। वह स्वयं नित्य निर्गुण है। उससे हम क्या लें? यदि दौड़कर उसके पास जाना चाहें तो उसका न कोई
गाँव है न कोई स्थान है। एक सद्भाव के अतिरिक्त उसका लाभ उठाने का अन्य कोई उपाय नहीं है। यदि सद्भाव
से उसका नामस्मरण करें तो उस स्मरण के साथ ही गुरु प्रकट होता है और जिस प्रकार समुद्र स्वयमेव नमक से
मिलने आया और इसलिये सागर को आलिंगन देने के साथ ही जिस प्रकार नमक का पानी हो जाता है, उसी
प्रकार सद्गुरु की पूर्ण कृपा होने पर जन ही जनार्दनस्वरूप हो जाता है। उस समय जन, वन अथवा विजन में
भिन्नता नहीं दिखायी देती। इसलिये जो जन है, वही जनार्दन है और जनार्दन ही सारे जन है। यह उपनिषद् का
सारांश है और यही जनार्दन का सच्चा स्वरूप है। इसी अभेदभाव से यहाँ भगवान ने सांख्यशास्त्र बताया। वह
यही है कि परब्रह्म उत्पत्ति, स्थिति और लय इनमें निरन्तर परिपूर्ण ही रहता है। यह सांख्यमत सुनकर उद्धव मन
ही मन विचार करने लगा कि यदि अहम्भाव ही संसार को बढ़ाता है तो क्यों न उसे छोड़ दिया जाय? लेकिन जो
अहंकार अंतःकरण से चिपका हुआ है उसे छोड़ने जाओ तो वह जल्दी नहीं छूटता। यह बात यदि श्रीकृष्ण से
पूछी जाय तो उसने इसीलिये सांख्य शास्त्र बताया है। समस्त प्राप्ति का रहस्य जो सांख्य है उसी का वर्णन