श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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पहुँचता है। अनेक प्रकार की योनियों के संकट उसे गुणकर्मों के ही कारण भोगने पड़ते हैं। वह बड़े आनन्द से
स्वर्ग के सुखोपभोग भोग कर तथा महर्जन तपोलोक भोग कर आगे सत्यलोक तक प्रयाण करता है। इसी का
नाम 'उन्मज्जन' है। पशु, पक्षी, स्थावर, वृक्ष, पाषाण, कीट आदि का जन्म लेते-लेते महानरक में अधःपतन
होता है, इसी को 'निमज्जन' कहते हैं। ऊँचाई तक पहुँच कर नीचे गिरना, इस उलटफेर में जिन नानाप्रकार के
जन्म-मरण का भोग भोगना पड़ता है वह प्रकृति पुरुषों का कार्य है। वही जीवबंधन भोगने को बाध्य करता है।
अणुर्बृहत् कृशः स्थूलो यो यो भावः प्रसिध्यति।
सर्वोऽप्युभयसंयुक्तः प्रकृत्या पुरुषेण च॥१६॥
अणु का अर्थ है अत्यन्त सूक्ष्म; बृहत् का अर्थ है अत्यन्त बड़ा; कृश का अर्थ है साधारण; और स्थूल का
अर्थ है पूरी तरह जड़ अवयवों से युक्त, ऐसा जो भी दिखायी देता है, प्रसिद्ध होता है, वह सब प्रकृति और पुरुष
के संयोग से बना है। जो दो पदार्थों के संयोग से बना है, जिसे संसार कहते हैं वह मूर्तिमंत प्रकृतिपुरुषमय ही
है। तीसरा स्वरूप होता ही नहीं है। अब इन दोनों के अलावा जो अवयवरहित है, जहाँ से इन दोनों का भी उद्भव
होता है, वही सर्वत्र सभी दृष्टियों से व्याप्त परब्रह्म देवाधिदेव बता रहे हैं।
यस्तु यस्यादिरन्तश्च स वै मध्यं च तस्य सन्।
विकारो व्यवहारार्थो यथा तैजसपार्थिवाः ॥ १७॥
प्रकृतिपुरुष के साथ जो यह साकार चराचर दिखाई देता है, वह जिस प्रकार आदि और अन्त में नश्वर है,
उसी प्रकार वह मध्य में भी नश्वर है। आभूषण बनाने के पहले जो सुवर्ण होता है वह अलंकार तोड़ने के बाद
भी सुवर्ण ही रहता है और मध्य में भी वही शुद्ध सुवर्ण अलंकार के रूप में सुशोभित रहता है। मिट्टी का
गोकुल बनाने से पहले मिट्टी ही रहती है, और गोकुल तोड़ने के बाद भी शुद्ध मिट्टी ही रहती है। वही मिट्टी
गोकुल के रूप में भी मिट्टी ही रहती है। उसी प्रकार आदि, मध्य और अन्त में अविनाशी ब्रह्मतत्त्व ही रहता है।
तीन गुणों के प्रभाव से विकृत जो यह साकार चराचर दिखायी देता है वह स्वप्न की बातों की ही तरह मायिक
होता है। समस्त विकारों का कारण अविद्या ही है। उन विकारों की सत्यता स्थापित करने में अविद्या ही उजागर
होने लगती है। यह मर्म ज्ञाता जानते हैं किन्तु अज्ञानी लोग इसे न जानकर अविद्या को ही सत्य मानते हैं।
अविद्या अविद्याकत्त्व के कारण मिथ्या है और ब्रह्म अपने ब्रह्मत्व के कारण सदा सम्पन्न है। इसी बात का निरूपण
स्वयं श्रीकृष्ण करते हैं।
यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुतेऽपरम्।
आदिरन्तो यदा यस्य तत् सत्यमभिधीयते ॥ १८ ॥
जिस प्रकार निद्रा के योग से हम स्वप्न से एक से अनेक हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रकृति को अंगीकार
करने के कारण ब्रह्मा से अनेक लोग हो जाते हैं। जिस प्रकार तंतु से करोड़ों वस्त्र बनते हैं, फिर भी करोड़ों वस्त्रों
में तंतु एक जैसा एक ही रहता है; वस्त्र का आदि, मध्य और अन्त देखने पर उसमें तंतु के अतिरिक्त और कोई
भी दूसरी चीज नहीं दिखायी देती उसी प्रकार प्रकृति पुरुषादि सारे लोक परब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं। इसलिये वो
आदि, मध्य और अन्त में एक परब्रह्मस्वरूप के ही हैं। उसमें द्वैत की बात ही नहीं रहती। तंतु वास्तविकता है
किन्तु वस्त्र मायिक है। उसी प्रकार परब्रह्म सत्य और माया झूठी है। उद्धव! जो आदि, मध्य और अन्त में एक