श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 681, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय ६६५
रहता है वही शुद्ध सत्य है। जिस प्रकार लकड़ी की गुड़िया लकड़ी के ही अवयवों से शोभा देती है उसी प्रकार
ब्रह्म ब्रह्मस्वरूप से एक ही है तथा संसार के रूप में शोभायमान होता है। जिस प्रकार देह एक होकर भी अनेक
प्रकार के अवयवों के कारण भिन्न दिखायी देता है, उसी प्रकार ब्रह्म भी एक ही होने पर भी वह अनेक स्वरूपों
में भासित होता है। जिस प्रकार पानी में ही क्रीड़ा करते हुए पानी तरंगों की अनेक मालिकायें उत्पन्न करता है,
उसी प्रकार परब्रह्म की लीला से ही संसार आदि वस्तु समुदाय प्रकट होता है। तरंगों के आदि, मध्य और अन्त
में जिस प्रकार पानी के रूप में पानी ही रहता है, उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और लय में ब्रह्म ब्रह्मरूप से
अविनाशी रहता है। इसलिये ब्रह्म सत्य है और प्रपंच मिथ्या है यह विचार साधकों के समझने के लिये
कार्यकारणों में अभिन्नभाव है, ऐसा देवाधिदेव ने कहा। कार्य यदि कारण से अभिन्न (एकरूप) है तो फिर ब्रह्म
में माया भिन्न कैसे हुई ? इस शंका के समाधान के लिये ही ब्रह्म स्वयं ही जगद्रूप से परिपूर्ण सजा हुआ है, यह
बता दिया है। ब्रह्म, माया और काल की गति अनादि है, ऐसा कहते हैं लेकिन वह भी तर्कसंगत नहीं है। इसी
उद्देश्य से श्रीकृष्ण बताते हैं।
प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधारः पुरुषः परः।
सतोऽभिव्यञ्जकः कालो ब्रह्म तत्त्रितयं त्वहम्॥१९॥
माया कभी ब्रह्म से अलग नहीं दिखायी देती। वह ब्रह्म के ही आश्रय में बढ़कर गुणों का कार्य बढ़ाती है।
माया का नियंता स्वयं परब्रह्म ही है अतः उसके पास पुरुषत्व है। माया उस पुरुष की अत्यन्त प्रिय है। इसीलिये
उसे प्रकृति कहते हैं। ब्रह्म से पुरुष भिन्न है, यह कहना गलत है। ब्रह्म और पुरुष एक ही के नाम हैं। माया और
प्रकृति ये जो दो नाम हैं, उन दोनों का अर्थ 'माया' ही समझना है। वह माया कुछ अलग ही प्रकार का
अविद्यात्मक कार्य प्रकट करती है, इसलिये उसे 'अविद्या' कहते हैं। यह ध्यान में रखो की माया ब्रह्म की शक्ति
है। लेकिन वह भी ब्रह्म से एकरूप हो चुकी है। वह क्षणार्ध के लिये भी उससे अलग नहीं रहती। वह सदा ब्रह्म
में ही लीन रहती है। शूरों का शौर्य जिस प्रकार शूरों से अलग नहीं होता, उसी प्रकार ब्रह्म में यह मायाशक्ति सदा
एकरूप रहती है। माया ब्रह्म में ही रहती है लेकिन जब तक उसका क्षोभ नहीं होता तब तक वह दृष्टिगोचर नहीं
होती। माया को क्षुब्ध करने वाला काल है। इस काल से ही लोगों की उत्पत्ति होती है। ब्रह्म की सत्ता ही काल
है। वह काल स्वयमेव प्रकृति को क्षुब्ध करता है और उत्पत्ति, स्थिति और लय का दर्शन कराता है। वह काल भी
ब्रह्म से एकरूप है। जिस प्रकार राजा के लड़के को राजा ही वश में रख सकता है उसी प्रकार प्रकृति से जो काल
जन्म लेता है उसे वह अपनी सत्ता से नष्ट करती है। वैचारिक दृष्टि से देखें तो काल और परमात्मा दोनों एकरूप
हैं। इसीलिये प्रकृति, पुरुष और काल में एकरूपता रहती है। ब्रह्म, काल और माया का सम्बन्ध ऐसा है कि ये
तीनों मूलरूप से ही एकरूप हैं। उनमें व्यावहारिक दृष्टि से जो भेद है, वह मिथ्यत्व के कारण असंबद्ध ही है।
ब्रह्म एक ही है। प्रकृति और पुरुष के स्वरूप कालरूप से अलग मालूम होते हैं। यदि उन्हें अखण्डत्व से देखें तो
मैं श्रीकृष्ण परमात्मा ही हूँ। उत्पत्ति से पूर्व पूर्ण ब्रह्म मैं हूँ, उत्पत्ति का आदिकारण जो ब्रह्म है वह मैं हूँ और
स्थिति काल में ब्रह्मरूप में मैं ही हूँ। इस प्रकार मैं स्वयं ही एक में अनेक रूप दिखाता हूँ। अपनी ही लीला से
सृष्टि के अन्त में, प्रलयके बाद मैं परिपूर्ण ब्रह्म ही शेष रहता हूँ। इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं करते हैं।
सर्गः प्रवर्तते पौर्वापर्यण नित्यशः।
महान् गुणविसर्गार्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम्॥२०॥