श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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बाढ़। विषाद का अर्थ है ऐसे दुःख का संचार जिससे अंतःकरण को कष्ट हो। 'आर्ति' का अर्थ है, अत्यन्त
संताप। निन्दा का अर्थ है मिथ्या आरोप लगाना। आशा का अर्थ है अत्यन्त लोभ। भी का अर्थ है भय से शरीर
काँपना। अब निद्रा का मर्म सुनो। जो आलस्य का मायका है और जो असली लम्बी सुस्ती है, वही असीम
तामसी निद्रा है। सारे उद्योग त्याग कर सुखी रहना इसी का नाम 'अनुद्यम' है। 'तम' इसी में सुखपूर्वक रहता है।
इस तमोगुण की सोलह कलाएँ हैं। वे जिस व्यक्ति के शरीर में बसती हैं, वही उस तमोगुणी रात्रि का चन्द्रमा है।
वह तामस पुरुष अविचार से अन्धा हुआ रहता है। सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणों से परिचित कराने के लिये
उनका अलग-अलग वर्णन किया। अब उनके मिले-जुले लक्षण सुनो।
सत्त्वस्य रजश्चैतास्तमसश्चानुपूर्वशः।
वृत्तयो वर्णितप्रायाः संनिपातमथो शृणु॥५॥
तीन गुणों की स्थिति तुम्हें बतायी। प्रत्येक की अनंत वृत्ति है। वे भी अनंत प्रकार की होती हैं। इसीलिये
जीव को यहाँ गुणों की उलझन में फँसना पड़ता है। स्त्रियों के माथे पर केश एक-दूसरे में उलझे रहते हैं लेकिन
वे स्वयं उन्हें नहीं छुड़ा पातीं, उसी प्रकार यह त्रिगुणों की उलझन जीव नहीं छुड़ा पाता। सहेलियाँ, माँ, बहनें
एक साथ मिलकर तेल और कंघी लेकर उन उलझे बालों को छुड़ाने का प्रयत्न करती हैं, उसी प्रकार यह जीव
त्रिगुणों की चोटी है। यदि जीव के सामर्थ्य से ही त्रिगुणों के विभाग होते तो वह जीव शुद्ध सत्त्व में रहकर, बाद
में गुणातीत अवस्था में गया होता। लेकिन अपने ही इन गुणों को सुलझाना जीव के लिये संभव नहीं है इसलिये
जो भाग्यवान हैं वे गुरुचरणों पर ही एकनिष्ठ भक्ति रखते हैं। जो संसार में भाग्य से भाग्यवान बनते हैं, सद्गुरु
ही जिनकी वास्तविक माँ रहती है वे सद्गुरु विवेक वैराग्य की कंघी लेकर त्रिगुणों की चोटी सुलझाते हैं।
जिनके गुणों की उलझन एक बार सुलझ जाती है वे फिर कभी उलझन पैदा न हो इसलिये गुणों का समूल मुंडन
कर उन्हें संन्यासी बना देते हैं। कुछ का तो और ही चमत्कार होता है। उनके वैराग्य की स्थिति अत्यन्त प्रखर
होती है। वे उलझन छुड़ाने के फेर में फँसते ही नहीं। वे समूल पूरा मुण्डन करा देते हैं। विवेकरूपी कंघी जब
वैराग्यबल से चलने लगती है तो जब भक्तिबल में दुर्बल होते हैं वे बीच ही में उठकर भाग जाते हैं। ऐसे दुर्बल
लोगों को दूर भागते हुए देखने पर कितने ही अन्य लोग मोहरूपी अँधेरे में ही दौड़ने लगते हैं। कुछ तो केशों की
उलझन माथे पर वैसे ही रखकर उस उलझन में ही फँसे रहते हैं। कुछ जो बिल्कुल ही अभागे होते हैं उनकी
गुरु माँ से कभी भेंट ही नहीं होती। संसार में ऐसे अनेक बच्चे त्रिगुणों से उत्पन्न होने वाले दुःख भोगते रहते हैं।
जिनकी आयु दो परार्ध से भी अधिक है ऐसे ब्रह्मदेव भी गुणों के विभाग नहीं कर पाते। फिर गुणों का सच्चा
चयन करने का सामर्थ्य औरों में कैसे होगा? त्रिगुणों की ऐसी वृत्तियों का वर्णन मैं भी पूरी तरह नहीं कर पाता।
अतः वैसा ध्वनितार्थ निकलने वाले शब्दों में संक्षेप में वर्णन किया।
संनिपातस्त्वहमिति ममेत्युद्धव या मतिः।
व्यवहारः संनिपातो मनोमात्रेन्द्रियासुभिः ॥६॥
गुणसन्निपात का यह प्रकार है कि एक ही अहंकार गुणों की संगति से तीन प्रकार का हो जाता है। उसके
सम्बन्ध में भी सुनो। वर्णाश्रम के अनुसार व्यवहार करना, वेदाज्ञा का पालन अवश्य करना और मैं ही ज्ञानस्वरूप
आत्मा हूँ यह मानना, यह अहंकार सात्त्विक है। मैं स्वधर्म कर्म करने वाला, मैं स्वर्गादि सुखों का भोग करने
वाला, नानाप्रकार के सुख विलास मुझे ही प्राप्त होते हैं, यह समझना राजस अहंता का लक्षण है। मैं देहधारी