श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 660, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें६४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विवेक और वैराग्य को शरीर में धारण कर जो बड़े-बड़े द्वंद्वों को सहन करता है, वही भगवान को प्रिय बनता है,
यह बात उन्होंने उद्धव को स्पष्ट कर दी। उद्धव ने समस्त संसार पर उपकार किया है क्योंकि उसके लिये
श्रीकृष्ण ने अपना गुह्य और आध्यात्मिक ज्ञान का भण्डार खोलकर भिक्षुगीत का रहस्य प्रकट किया। उद्धव ने
यदि शांति के बारे में न पूछा होता तो श्रीकृष्ण ने यह वर्णन क्यों किया होता ? लेकिन श्रीकृष्ण को उद्धव से
अत्यन्त प्रेम था इसलिये उसने उद्धव को अनेक प्रकार से उपदेश किया। इस उपाय से दीन-हीन भी संसार सागर
पार कर लेते हैं। जगजीवन श्रीकृष्ण ने संसार का उद्धार करने के लिये ही उद्धव को उपदेश करने के बहाने ये
बातें कहीं। श्रीकृष्ण ने ऐसा भिक्षुगीत सुनाया है जिसमें वेदशास्त्रों का तात्पर्य, उपनिषदों का सार और वार्तिक में
निहित गूढ़ रहस्य है। इस भिक्षुगीत से जीव अपने आप ही आत्मा से तद्रूप हो जाता है। ऐसा यह गूढ़ज्ञान
श्रीकृष्ण ने भक्तों की कृपा के लिये बतलाया। इसके योग से जीव का जीवत्व नष्ट होता है, शिव का शिवत्व
विलीन हो जाता है, द्वंद्वों का पीड़ा देने का गुण नष्ट हो जाता है और आत्मांनंद का भण्डार खुल जाता है। जहाँ
वेद मौन रह गये, शब्द शास्त्र भी लजा गये ऐसा उत्कृष्ट वह भिक्षुगीत मुझ जैसे साधारण पुरुष ने सुनाया। जिस
प्रकार राम ने डूबने वाले पत्थरों को तारा, उसी प्रकार मैं जड़, मूढ़ और अज्ञानी होते हुए भी जनार्दन की कृपा
मुझसे ब्रह्मज्ञान कहलवा रही है। जो अहिल्या व्यभिचारिणी थी वह श्रीराम के चरणों में लगने के कारण, उसके
नामस्मरण से पाप भी नष्ट हो जाते हैं। उसका नाम प्रातःस्मरणीय लोगों की श्रेणी में लिखा हुआ है। उसी प्रकार
यह सद्गुरु की कृपा का प्रसाद है। मेरी प्राकृत जड़ और मूढ़ वाणी साधु और ज्ञाता स्वीकार कर सकें ऐसे भाषण
आपने मुझसे कहलवाये। सरस्वती जिस पर प्रसन्न होती हैं, वह गूँगा होने पर भी वेदशास्त्र बोलता है उसी प्रकार
जनार्दन मुझ पर प्रसन्न हुए और प्राकृत भाषा में भिक्षुगीत गवाया। जिसके हाथ में राजमुद्रा रहती है, उसे सब
लोग सम्मान देते हैं। उसी प्रकार जनार्दन ने ही मेरी वाणी को श्रेष्ठ बनाया। बच्चे के तोतले बोल सुनकर माँ
प्रसन्न होती है, उसी प्रकार मेरी संस्कारहीन वाणी भी संतजनों को प्रिय लगती है। मैं और मेरी अच्छी-बुरी बातें
कौन-कौन स्वीकार करेगा ? क्योंकि मेरा मैं पन लेकर स्वयं जनार्दन स्वामी ही यह ग्रन्थ लिखवा रहे हैं। वैसे ही
यह भागवत है, तिस पर गूढ़ार्थ से भरा हुआ एकादश स्कन्ध और उसमें भी यह भिक्षुगीत पूर्णरूप से निर्द्वंद्व करने
वाला, अत्यन्त गूढ़ अर्थ से भरा हुआ है। उस भिक्षुगीत पर टीका लिखने वाला अकेला एक एकनाथ ही नहीं है
क्योंकि वह एकपन नष्ट कर ग्रंथार्थ का निरूपण जनार्दन ने कराया। उसमें न एक है न अनेक है। उसमें द्वंद्वों की
समता करने का कौशल है जिसके योग से ग्रन्थ का उत्तम स्वागत होता है। एका जनार्दन की शरण में है।
जनार्दन से उसका ऐक्य हो गया है। ऐसे ऐक्यरूप से यह भिक्षुगीत समाप्त किया। मेरे गुरु का भी गुरु, वही
योगियों का योगीश्वर इस भिक्षुगीत के अर्थ से सन्तुष्ट हुआ। उस अद्भुत आनन्द से उन्होंने मुझे आश्वासन दिया
और मुझे अभय का आशीर्वाद देकर आनन्द से डोलने लगे। एका जनार्दन की शरण में है। श्रोतागण सावधान हो
जाएँ। अगले अध्याय में श्रीकृष्ण प्रकृति-पुरुषों के लक्षण बतायेंगे। उस कथा का विचार मेरे अंतःकरण में घूम
रहा है इसलिये मैं सुख-दुःख द्वंद्व से अलग हो गया हूँ। आत्मज्ञान के योग से मेरा आत्मा से ऐक्य हो गया है।
संतसज्जनों को मैं दण्डवत् करता हूँ। श्रोताओं को भी दण्डवत् करता हूँ। अब एकनाथस्वरूप जनार्दन विनती
करते हैं कि आगे का निरूपण अत्यन्त मधुर और रस से परिपूर्ण है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे एकाकार टीकायां
भिक्षुगीत निरूपणं नाम त्रयोविंशतितमोध्यायः ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।