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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 651, कुल 869 में से

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पृष्ठ 651

तेईसवाँ अध्याय ६३५
अब जो लोग दूसरा ही कारण मानते हैं, वे कहते हैं कि देवताओं के कारण ही दुःख प्राप्ति होती है। किन्तु
देवताओं का वास देह में ही होता है और आत्मा आत्मस्वरूप में रहकर विदेही ही रहता है। देह के इन्द्रियों के
विकारों का नियंता देवता ही है। आत्मा अखण्ड अविकारी ही होता है। वह सुख-दुःख से अलिप्त रहता है।
भूमि स्वाभाविक रूप से निर्विकार ही है। किन्तु उस पर बनी हुई दीवारें सविकार होती हैं। उसके अनुसार ब्रह्म
नित्य और निर्विकार ही है। उसमें जो नियामक देवता हैं वे सविकार होने का आभास देते हैं। दीवार जब जमीन
पर गिर पड़ती है तो भूमि उसे अपने में एकरूप करती है, उसी प्रकार निर्गुण और निर्विकार ब्रह्म में इन्द्रियों के
नियामक देवता एक हो जाते हैं। हमारे देह में या दूसरों के देह में इन्द्रियों का नियंत्रण करने वाले देवता एक
समान हैं। इसलिये इन्द्रियों का सुख-दुःख देवता स्वयं भोगते हैं। हाथ से मुँह पर मारने पर वहाँ क्रमानुसार इन्द्र
और अग्नि यही नियामक देवता हैं, इसलिये एक तरह से इन्द्र ही अग्नि को मारता है। आत्मा अविकारी होने के
कारण वह दुःख से अलिप्त ही है अथवा यदि मुँह हाथ को काट खाता है तो इसका यह अर्थ हुआ कि अग्नि ने
इन्द्र को घायल कर दिया। आत्मा इन्द्रादि देवताओं से भिन्न होने के कारण उसे सुख-दुःख स्पर्श नहीं करते।
दूसरे के मुख से हमारे मुँह पर थूक गिरती है तो दोनों ही मुखों में अग्नि का ही वास होने के कारण कौन किस
पर क्रोध करेगा? आत्मस्वरूप में दूसरा कोई नहीं होता। चाहे थूक हो या पेशाब हो दोनों देह से ही उत्पन्न हैं
अर्थात् देह के ही बच्चे हैं। देह के ही होने के कारण वे देह पर ही लोटते हैं, तो कौन किस पर नाराज हो?
अपने मुख से दूसरे के मुख को चुम्बन दे तो अग्नि ने ही अग्नि का चुम्बन लिया। उस आनन्द से कौन फूलेगा?
क्योंकि आत्मस्वरूप में दूसरा कोई नहीं होता या अपनी देह से दूसरे की देह को आलिंगन दे तो उन दोनों के
स्पर्श के बीच केवल वायु ही रहता है। उस आनन्द से प्रफुल्लित कौन होगा? क्योंकि वहाँ कोई 'दूजा' नहीं
होता। इसका अर्थ यह हुआ कि देवताओं का समुदाय सुख-दुःख के लिये कारण नहीं है क्योंकि आत्मा में ही
सभी देवताओं का बिना किसी भेदभाव के विलय होता है। देवताओं द्वारा देह को प्रताड़ित करने से देहाभिमानी
को दुःख होगा ऐसा जो मानते हैं, वे मूर्ख हैं क्योंकि वैसा भी कभी घटता नहीं है। पुर अर्थात् देह, उस देह में जो
निवास करता है, वह सभी की देह में एक ही पुरुष है। ऐसा होने पर किसके लिये कौन दुःख मनायेगा? तैश में
आकर मारा गया अपना ही हाथ अपने ही शरीर पर नहीं लग जाय तो उस दुःख के जिम्मेदार हम ही होते हैं
तथा क्रोध करने का कारण हम ही होते हैं। जब सर्वत्र अपना ही एकपन हो तो कौन किसका दुःख मानेगा और
कौन किस पर गुस्सा करेगा? क्योंकि चारों ओर तो अपने आप ही अकेला है। उसी प्रकार मैं ही एक विश्वात्मा
हूँ, मैं ही देवता हूँ, मैं ही जनता हूँ, फिर कौन किसे दुःख देता है? और मैं क्रोध करूँ भी तो किस पर? इस
प्रकार मन में विचार करने पर, मन में विश्वास हो जाता है कि देवताओं से सुख या दुःख बिलकुल नहीं होता।
आत्मा को सुख-दुःख का कारण माना जाय तो यह बात मुझे स्वीकार नहीं है क्योंकि आत्मा में कार्य का कारण
और सुख-दुःख होते ही नहीं हैं।
आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः किमन्यतस्तत्र निजस्वभावः।
न ह्यात्मनोऽन्यत् यदि तन्मृषा स्यात् क्रुध्येत कस्मान्न सुखं न दुःखम्॥ ५३ ॥
आत्मा तो केवल अकेला है, उसे सुख कैसा और दुःख कैसा? जो आत्मा को सुख-दुःख देने वाला कहते
हैं, वे मूर्ख और अविचारी हैं। जिस प्रकार पतले घी को कोई आकार नहीं होता और रंग भी नहीं होता, लेकिन
गाढ़ा होने पर उसके कण-कण में आकार और श्वेत वर्ण दिखायी देता है, और उन कणों के परस्पर मिलने से