श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय ६५३
रहता है वह अनेक प्रकार के नरकों का भोग भोगता है। ऐसी यह सृष्टि त्रिलोकी ब्रह्मदेव की ही रचना है। हे
उद्धव ! जिसका मन इच्छारहित नहीं है, जिसने स्वप्न में भी विरक्ति का दर्शन नहीं किया है, उन्हें निश्चित रूप
से त्रैलोक्य से ऊपर गति नहीं है। जो मेरी भक्ति नहीं करते, जो मेरी कीर्ति नहीं सुनते, जो संसारबन्धन को तोड़ने
वाले मेरे रामनाम का उच्चार नहीं करते, उन्हें बार-बार स्वर्ग तथा नरक का भोग भोगना पड़ता है और वे बार-
बार पाताल लोक तथा मृत्युलोक में अनेक प्रकार की योनि में जन्म लेकर दुःख भोगते हैं। जो इन तीन गुणों में
लिप्त रहते हैं तथा सदैव लोभी बने रहते हैं, वे निरन्तर सकाम कर्म ही करते रहते हैं, उन्हें उनका त्रिगुणात्मक
धर्म कभी त्रैलोक्य के बाहर नहीं जाने देता। यह पाताल का वर्णन हुआ अब स्वर्ग की रचना सुनो। फिर अन्य
लोकों की रचना भी सुनाऊँगा। जहाँ तक सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश पहुँचता है वहीं तक पृथ्वी का महत्त्व है।
लेकिन लोगों की बस्ती नीचे पाताल से लेकर ऊपर स्वर्गलोक तक अनेक लोकों में है ही। जहाँ पैरों से चलते हैं,
वह भूलोक है। वहाँ से सूर्य तक भुवलोकों का विस्तार है। उस भुवलोक में यक्ष, रक्ष और गन्धर्वों की बस्ती है।
भुवलोक से भी ऊपर सूर्यलोक का विस्तार होता है। पृथ्वी से लक्ष योजन दूर सूर्यलोक है, यह ध्यान में रखो।
कालरूपी, सूत्रधार वायु निर्मित चक्र पर सूर्य, चन्द्रमा और तारागण इन्हें बड़े कौशल से सजाकर उन्हें गोल-गोल
घुमाता रहता है। लेकिन उस काल पर भी मेरा नियंत्रण है। मेरे भय से ही क्षण, लव, निमिष आदि विभागों में
आधिक्य या कमी नहीं आ पाती। इस कालचक्र की गति बड़ी आश्चर्यजनक है। एक महीने में सूर्य और चन्द्रमा
एक साथ आते हैं। नक्षत्रचक्र में चन्द्रमा का एक परिभ्रमण पूर्ण होने के दो दिन के बाद कुल मिलाकर २९ दिन
के बाद चन्द्र सूर्य के आड़े आता है। अमावस्या और प्रतिपदा के संधिकाल में जब चन्द्रमा अपने भ्रमण मार्ग में
यथावकाश चलता रहता है उस समय उसका राशि अंशादि स्थान सूर्य के जितना ही होता है। सूर्य के तेज के
कारण वह लोगों को दिखायी नहीं देता। इतनी-सी बात पर ज्योतिषी लोग उन दिन सजीव रहने वाले (आकाश
पर उपस्थित) चन्द्रमा को मृत कह देते हैं और सब लोग उसे सच मान लेते हैं। सूर्य और चन्द्रमा अपने अलग-
अलग रास्तों पर चलते हुए कभी एक-दूसरे से नहीं टकरायेंगे। किन्तु महीने के अन्त में (अमावस्या के दिन)
उनकी गति से उनके बिम्ब लक्षान्तर पर समान दूरी पर आ जाते हैं। जो ग्रह अपनी गति से सूर्य के आड़े आता है
(सूर्य के निकट होने के कारण नहीं दिखायी देता) उसके अस्त होने की सूचना ज्योतिषी देते हैं और लोगों को
उनकी बात सच लगती है क्योंकि उस समय वह ग्रह दिखायी भी नहीं देता। वेदांत में जो दृष्टि सृष्टि का
सिद्धान्त है वह ज्योतिषशास्त्र में भी सत्य है क्योंकि जो नहीं दिखायी देता उसका ज्योतिषी लोग अस्त मानते हैं
और जो दिखायी देता है, उसकी पूजा करते हैं। ग्रहण लगने के बाद वह कुछ समय तक बादलों के पीछे रहता
है, फिर भी यदि बादल न होते तो उन्हें ग्रहण दिखायी देता है। वे लोग उस काल को पर्वकाल मानते हैं लेकिन
वही ग्रहण जिस देश में दृश्य आकाश में नहीं होता (चन्द्रग्रहण यदि दिन में हो जाय तो उस समय चन्द्र दृश्य
आकाश में नहीं होता, उसी प्रकार रात्रि का सूर्यग्रहण भी दृश्य आकाश में नहीं होता) वहाँ के लोग ग्रहण लगा
हो ऐसा मानते ही नहीं हैं। सूर्य और चन्द्र के एक ओर राहुकेतु की बस्ती है। वे राहु केतु जब सूर्यचन्द्र के बिम्ब
के आड़े आते हैं तो उन्होंने सूर्य-चन्द्र को ग्रस लिया ऐसा कहा जाता है। वास्तव में यदि राहु सूर्य को निगलने
का प्रयास करे तो उसका मुँह ही जल गया होता है। एक बिम्ब के आड़े दूसरा बिम्ब आता है, यही उस ग्रहण
के सर्वग्रासों का सामान्य तत्त्व है। वास्तव में सूर्य अपने 'सूर्यमण्डल' में राजकाज करता है किन्तु सूर्यग्रहण के
समय उसके सर्वग्रास का माहात्म्य ज्योतिषी घर-घर में बताता रहता है और वह ग्रहण देखकर साधारण जनता
भी कोलाहल करने लगती है। सूर्य के खग्रास ग्रहण की बात सुनकर संसार में अपूर्व कोलाहल मच जाता है।