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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 656, कुल 869 में से

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पृष्ठ 656

६४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
योग से पूरी तरह उफन कर सुख-दुःखादिक जन्म-मरण बढ़ाने लगता है तो उसे काबू में कौन ला पायेगा ?
स्वप्न का देह केवल मन का खेल है। उस देह में भी मनपन रहता है। उसी प्रकार इस देह को भी मन ही
समझो। वह अभिमान के कारण कठिन और स्थूल बन गया है। इसे ध्यान में रखो कि कार्यकारण रूप में संसार
ही मन का अभिमान है। वह भयंकर सुख-दुःख बढ़ा कर जन्म-मरण का दुःख स्वयं भोगता है। बार-बार वही
भोग भोगते हुए कष्ट होता है लेकिन वह अपनी अहंता नहीं छोड़ता और देह का अपने ढंग से पोषण करता है।
चाहे ब्रह्मप्रलय ही क्यों न हो जाय लेकिन देह की अहंता नष्ट नहीं होती, प्रलय में भी अभिमान नष्ट नहीं होता।
वह सुख-दुःख भोगता रहता है। इस अभिमान में जीव की क्या स्थिति रहती है? वैसी ही, जिस प्रकार अड़हुल
के फूल पर स्फटिक रखने से वह स्फटिक फूल के ही रंग का दिखायी देता है लेकिन उसके जैसा नहीं होता।
आत्मस्वरूप में सुख-दुःख नहीं है। वह देह में स्पष्टरूप से दिखायी देता है। यह सुख-दुःख अविचार के कारण
मनोरम लगता है और कल्पना जैसा भासित होता है। वह देह मेरा ही है इस अभिमान से उसे मस्तक पर धारण
कर जन्म-मरण के चक्कर में फँस कर सुख-दुःख का स्वयं ही भोक्ता बनता है। इसी विचार से जो आत्मज्ञानी
होते हैं, उनके मन पर गुरुपदेश का तत्त्वज्ञान पूरी तरह अंकित होने के कारण वे जन में या वन में कहीं भी
देहाभिमानी नहीं रहते। इस प्रकार जो आत्मस्वरूप के अनुभव से बुद्धिमान हुए पुरुष रहते हैं उन्हें प्रारब्ध की
गति से, प्राणिमात्रों से कैसे भी दुःख क्यों न प्राप्त हो लेकिन उनकी आत्मस्वरूप स्थिति अटल रहती है। उनमें
प्राणिमात्र के प्रति न द्वेष उत्पन्न होता है और न उन पर क्रोध ही होता है। त्रिभुवन में वे स्वानंद में रहते हैं और
निश्चिंत होकर द्वंद्वरहित रहते हैं। ऐसा पुरुष संकट देखकर भयभीत नहीं होता और किसी को पराया नहीं
समझता। सभी आत्मस्वरूप होने के कारण वह सबके साथ अपनत्व का व्यवहार करता है। ज्ञाता सदा
भेदभावरहित होता है। उसमें समविषम भाव और भेदभाव नहीं होता। वह किसी से डरता भी नहीं है और किसी
से दुःख भी नहीं करता है। वह सदा सुख में और आत्मानंद में मगन रहता है। निन्दा हो या कष्ट हो वह बिना
उद्विग्न हुए, सब कुछ सहन कर सुखी पुरुष की तरह व्यवहार करता है, यही सिद्ध का प्रमुख लक्षण है, और
साधकों के लिये साधन भी वही है।
एतां स आस्थाय परात्मनिष्ठामध्यासितां पूर्वतमैर्महर्षिभिः ।
अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव ॥ ५८ ॥
देखो! मेरे पूर्व पुण्य के भाग्योदय से अद्वैत स्वरूप आत्मनिष्ठा मुझ में उत्पन्न हुई। उसी आत्मनिष्ठा के
आश्रय से मैं द्वंद्वरहित होकर अनेक प्रकार के दुःख सहन कर रहा हूँ। भेदभाव से दूर रहकर सुख-दुःख सहन
करने का गुण यही सिद्धों का स्वाभाविक लक्षण है। मेरा मुख्य रूप से यही साधन है। इसी के योग से मन पर
विजय होती है। यही परमार्थ का श्रेष्ठ साधन है। महान ऋषियों की यही आत्मनिष्ठा है। विष्णु का मुख्य भजन
यही है। इसी के योग से आत्मनिष्ठा साध्य होती है। इसके योग से द्वंद्व से होने वाले दुःख की बाधा नहीं होती।
इसी के योग से शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है। यही आत्मविवेक हमें दुस्तर संसार से पार कराने वाला है।
संसारसागर पार करना अत्यन्त कठिन है, उसे पार करने के लिए आत्मविवेक उत्तम नौका है। उसका सद्गुरु
नाविक बनकर माया के उस किनारे पर पहुँचाता है। यह आत्मविवेक कैसे प्राप्त हो? उसकी चिन्ता करने की
आवश्यकता नहीं है। आत्मभावना से एकाग्र होकर भगवान की शरण जायें। लौकिक की लज्जा त्याग कर तथा
अभिमान का बोझ फेंक कर भगवान की शरण में जाना चाहिये, तभी आत्मविवेक प्राप्त होता है। जिस प्रकार
नन्हा बालक माँ की अनन्य भाव से शरण जाता है, उसी प्रकार अनन्य भाव से दिन-रात श्रीहरि की शरण में