श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सत्त्वगुण में वृद्धि हुई और उसके पहले के उस सत्त्वगुण के कारण ही मैं साक्षात नारायण बन गया।
"त्रिकालाबाधित विश्वात्मा सचमुच तुम ही हो" इस आशय के चतुःश्लोकी भागवत का मैंने उसे उपदेश किया।
मेरे उपदेश से वह समबुद्धि होकर रह गया और इतने कल्प बीतने पर भी उसे मोह स्पर्श नहीं कर पाता। इस
प्रकार कल्प के प्रारम्भ में ब्रह्मदेव ने जब समाधि धारण की तो उसे आत्मबुद्धि प्राप्त होकर उसने यह सारी
उत्पत्ति करने का कार्य पूर्ण किया। देवता, राक्षस, मनुष्य, सर्प आदि के बस्ती वाले तीनों लोक, सात पाताल तथा
विलक्षण सात गोपुरों का भी उन्होंने निर्माण किया। 'भूः' अर्थात् पाताल लोक, 'भुवः' अर्थात् मृत्युलोक और
'स्वः' अर्थात् स्वर्गलोक इन्हीं को मिलाकर त्रिभुवन कहा गया है। कुल मिलाकर चौदह लोक हैं और वहाँ रहने
वाले लोकपालों का स्पष्ट वर्णन श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
देवानामोक आसीत् स्वभूतानां च भुवः पदम्।
मर्त्यादीनां च भूर्लोकः सिद्धानां त्रितयात् परम्॥ १२॥
अधोऽसुराणां नागानां भूमेरोकोऽसृजत् प्रभुः।
त्रिलोक्यां गतयः सर्वाः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम्॥ १३॥
पिछले श्लोक के अन्त में भूः, भुवः, स्वः इस प्रकार तीन लोकों का श्रीकृष्ण ने स्पष्ट वर्णन किया है।
उसी प्रकार अगले श्लोक में पाताल लोक का अर्थ बताया है और उसका मृत्युलोक से ऐक्य है इसका भी
यथातथ्य निरूपण किया है। इन्द्रादि समस्त देवताओं के रहने के लिये स्वर्ग ही एक स्थान है। यक्ष, राक्षस, भूत
और गन्धर्वों के रहने के लिय आकाश है और जहाँ से मोक्ष जा सकते हैं, परलोक जा सकते हैं, वह कर्मभूमि
अथवा अतल सप्त पाताल के साथ पृथ्वी बड़े भाग्य से मनुष्य को रहने के लिये मिली है। सिद्ध पुरुष त्रैलोक्य
के ऊपर रहते हैं। वह सिद्धों के रहने का सिद्धस्थान है। अतल, वितल, सुतल, रसातल, महातल, तलातल और
पाताल ये पृथ्वी के नीचे रहने वाले पाताल हैं। अब सप्त पाताल के अधिकारियों के भी नाम सुन लो। तो अतल
में मयासुर का पुत्र बल रहता है। वह पराक्रम में प्रबल है। उसके पास राक्षसों का बड़ा समुदाय है। वितल में
हाटकेश्वर है। कर्पूर की तरह गौरवर्ण जो उमाकांत है वही हाटकेश्वर है। वहाँ हाटक नाम की नदी बहती है
जिसमें सुवर्ण की राशियाँ बहती हैं। सुतल में महान भगवद्भक्त बली राजा है और उसका द्वारपाल विष्णु है।
प्रह्लाद भी उसके पास विष्णु भक्तों के साथ रहता है। शंकर ने त्रिपुरासुर का वध करने के उपरान्त रसातल में
मयासुर की स्थापना की। वह मायावी तथा महान पराक्रमी वीर सपरिवार वहीं रहता है। विष धारण करने वाले
क्रोध कद्रू कु पुत्र सर्प, वे सारे महातल में निवास करते हैं। तलातल में दानव रहते हैं, जिन्हें 'निवातकवची' वीर
कहते हैं। (वे प्रह्लाद के भाई संह्लाद के पुत्र हैं) वहाँ का राजा नाग है जो उन्हें पूज्य है। उस स्थान की रचना
अपूर्व है। सातवें पातल में नाग रहते हैं। जहाँ एक लाख नागों का समुदाय जिसकी सेवा में तत्पर है, ऐसे
वासुकि आदि अनेक महान नाग पद्मिनीयों के साथ विलास करते रहते हैं। जिस प्रकार स्वर्ग में रंभा, उर्वशी आदि
सुन्दर स्त्रियाँ हैं, उसी प्रकार पाताल में पद्मिनी नाम की स्त्रियाँ हैं। उनके सौन्दर्य का वर्णन परलोक में भी होता
रहता है। उसके नीचे तीन सौ योजन नीचे सहस्रमुख का शेषनाग रहता है। उसके शरीर पर ही मैं भगवान शयन
करता हूँ। इसके भी काफी नीचे अंधतामिस्रादि बड़े-बड़े नरक हैं। उससे भी नीचे कूर्म है तथा उसके नीचे
आवरणोदक है। जिनका स्वर्ग का भोग क्षीण होने लगता है और केवल अधोभाग का ही भोग भोगने का पुण्य
शेष रह जाता है उस पुण्य के क्रम से ही वे लोक सप्तपाताल में जन्म लेते हैं। जिसकी गाँठ में केवल पाप ही