सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 663, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 663

चौबीसवाँ अध्याय ६४७
करना चाहिये। जिनके मन में अटल शान्ति का वास होता है वे मुझ अजेय को भी जीत लेते हैं। वही वास्तव में
परमार्थ साधक होते हैं ऐसा श्रीकृष्ण ने स्वमुख से कहा है। कृष्ण का वह भाषण सुनकर उद्धव का मन चौंक
उठा। उसने सोचा कि भेदाभेद सहन करने का यह काम तो अत्यन्त कठिन है। वह मुझसे कैसे सध पायेगा?
फिर, भेदाभेद सहन करने के लिये साधन क्या है, यह पूछने पर भगवान नाराज हो जायेंगे। इसलिये उद्धव
संकोच के मारे मौन रह गया। भगवान ने उद्धव के मन का हेतु जान कर द्वंद्व को सहन करने का उपाय मूल से
ही बताया। पुरुष अद्वयगुण से परिपूर्ण है तथा वह प्रकृति से भिन्न है यह आत्मज्ञान मन में जम जाने पर द्वंद्व की
बाधा नहीं होती। इसलिये द्वंद्वों पर पूर्णरूप से विजय प्राप्त करने के लिये प्रकृति पुरुषों का विवेचन उद्धव के पूछे
बिना ही श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं। श्रीकृष्ण भक्तों के अंतःकरण की बात जानता है इसीलिये वह भक्तों का
अंतरात्मा है। वह अपने भक्तों के कल्याण के लिये पूर्ण परमार्थ बता रहा है। भक्तों का मनोगत जानकर कृपालु
श्रीकृष्ण उन भक्तों के हित के लिये कृपापूर्वक बता रहा है। संसार में उद्धव अपने भाग्य के कारण धन्य है
क्योंकि त्रिभुवन का देवता श्रीकृष्ण स्वयं ही कृपा की वर्षा कर प्रकृतिपुरुष का रहस्य उसे बता रहा है। उद्धव ने
अपनी शंका स्पष्ट न करने पर भी, श्रीकृष्ण उसका निरूपण सुनाने लगा। कृष्ण जिसे तारने की बात करते हैं,
वह पहले ही तर गया ऐसा समझना चाहिये। सारे संसार का उद्धार करने के लिये श्रीकृष्ण कृपापूर्वक बोलने
लगा। गौ बछड़े के प्यार के कारण जिस प्रकार पूरे घर को दूध देती है, उसी प्रकार पद्मनाभ कृष्ण ने उद्धव से
प्रेम के कारण सारे संसार का उद्धार किया।
श्रीभगवानुवाच
अथते सम्प्रवक्ष्यामि सांख्यं पूर्वैर्विनिश्चितम्।
यद् विज्ञाय पुमान् सद्यो जह्याद् वैकल्पिकं भ्रमम् ॥ १॥
जो योगियों का योगीन्द्र है, ज्ञानियों का ज्ञानेन्द्र है, भक्तचित्तरूप चकोर का चन्द्र है, जो यदुवंश का
यादवेन्द्र है, जो प्रकृति पुरुष से भिन्न है, उस श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा- उद्धव ! द्वंद्व सहन करने के प्रकार का
अत्यन्त गूढ विचार तुम्हें बताता हूँ, सुनो। जिस निरूपण को सुनते ही हम सुख-दुःख से बिलकुल विलग हैं यह
भाव उत्पन्न होता है, वह गुप्त ज्ञान सुनो। मैंने कपिलऋषि का अवतार लेकर अपनी माँ से (देवहुति को) प्रकृति
पुरुष के सम्बन्ध में सविस्तार बताकर उपदेश किया। वही पूर्व की बात सुनाऊँगा। इस बात को सुनने से मनुष्य
स्वयं ही ज्ञानसम्पन्न हो जाता है। पुरुष से प्रकृति भिन्न है और सारा सुख-दुःख उसी के पास है यह ध्यान में
रखो। सुख-दुःख केवल मायिक हैं यह ज्ञान जिसे हो गया वह उसी क्षण संसारभय का भ्रम त्याग देता है। जिस
प्रकार मोतियों का हार सर्प का भ्रम दूर होने के बाद ही गले में डालते हैं और फिर सर्प के भय का कष्ट नहीं रह
जाता, उसी प्रकार शिव और शक्ति का विचार मैं तुम्हें पूरी तरह बताता हूँ। ब्रह्म आनन्दरूप में केवल एक है।
जिनके कारण उत्पन्न हुए द्वंद्वों के सुख-दुःख त्रिभुवन में भी नहीं समा पाते, ऐसे प्रकृति और पुरुष कहाँ से
आये? इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं। प्रकृति-पुरुषों का जन्म ही मुख्य रूप से सुख-दुःखों का
कारण है।
आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमेवाविकल्पितम्।
यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगेऽयुगे ॥ २॥
जिस प्रकार सोये हुए पुरुष की छाया उसके शरीर के नीचे ही समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार सविकार