श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
माया को निगल कर ब्रह्म फिर से एक अकेला बच रहता है। ब्रह्म अकेला रहकर भी परिपूर्ण है। लेकिन ऐसा
कौन कहेगा ? उसका न नाम है, न रूप है और न पूर्ण व्यक्तित्व ही है। पूर्ण ब्रह्म में ब्रह्मपन का स्फुरण नहीं
होता। उसमें न युगों की संख्या है, न काल है, न समय है। दिनमान नहीं, घटिका और पल नहीं। शून्य से
शून्यत्व का मण्डल भी नहीं है। ऐसा यह ब्रह्म केवल परिपूर्ण स्वरूप के कारण है। उसमें मैं ब्रह्म हूँ का जो
स्फुरण होता है, वही माया का मुख्य लक्षण है। प्रकृति और पुरुष इन दोनों का जन्मस्थान वही है। वहीं से इन
जुड़वाँ फलों की उत्पत्ति होती है। जिस प्रकार पेट में अनाज का दाना रख कर सत्त्वहीन छिलका स्वयं बढ़ता है,
उसी प्रकार पुरुष के योग से यह प्रकृति पूर्णरूप से विकसित होती है। मिठास अन्दर रखकर कटहल के शरीर
पर काँटे बढ़ते रहते हैं, उसी प्रकार पुरुष के योग से प्रकृति को बहुत अहंकार होता है। जिस प्रकार आँख का
पानी जमकर आँख में ही परदा आ जाता है, उसी प्रकार ब्रह्म में भी मायारूपी मैल एकत्र होकर वह शुद्ध ब्रह्म
को भी मलिन कर देता है। आँख पर आया परदा दृष्टि को क्षीण करता है, उसी प्रकार माया आत्मानन्द के आड़े
आती है। उसकी ही माया उस पर विकसित होकर पुरुष को पागल बना देती है। इस प्रकार कर्त्ता के बिना ही
जिस कार्यकारण ने आकार लिया उसे कृतयुग कहने के लिये वेद तत्काल उद्यत हुआ। 'अ' कार, 'उ' कार तथा
'म' कार के साथ प्रकृति पुरुषों में वेद उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार अंकुरित बीज में पहले तीन पत्तों का उद्भव
होता है, उसी प्रकार उस वेद का भावार्थ वही है कि ब्रह्म ही सत्य हैऔर माया मिथ्या है और यदि हम भेदाभेद
का त्याग करें तो ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति होती है। विचारशील और कुशल लोग यह बात जानते हैं। इस प्रकार जो
वेद के विचार से, अभेद भावना से योगी बनते हैं, वे कृतयुग से लेकर कलियुग तक विचरण करते समय सदा
युगरहित ही रहते हैं। उन्हें युग का बन्धन नहीं होता। कृतयुगादि जो युगों की पंक्तियाँ हैं या चराचरादि जो नाना
प्रकार के व्यक्ति हैं उन्हें प्रकृति ही उत्पन्न करती है। उस प्रकृति की उत्पत्ति श्रीकृष्ण बताते हैं।
तन्मायाफलरूपेण केवलं निर्विकल्पितम्।
वाङ्मनोऽगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत् ॥ ३ ॥
जो परब्रह्म है, वह सर्वव्यापी है, जिसमें रूप और नाम का प्रवेश नहीं है, जो मन और बुद्धि को भी दुर्गम
है और इन्द्रियों के लिये भी जो दुर्गम है, जो सचमुच ही सत्यस्वरूप है, जो परा से परे है और जो निर्विकार तत्त्व
है, उस परब्रह्म में माया के चमत्कार तर्क से परे हैं। वह परब्रह्म में ही दृश्य और द्रष्टा का विकार उत्पन्न करती
है, वही वास्तव में प्रकृति और पुरुष बन जाती है और इस प्रकार चराचर की वृद्धि करती है। जिस प्रकार स्वरूप
के साथ ही छाया की मूर्ति उत्पन्न होती है, उसी प्रकार ब्रह्म में माया की स्थिति है। उसी ने शिव-शक्ति को पुरुष
और प्रकृति इस भेद से उत्पन्न किया है। ब्रह्माण्ड में जो ईश्वर का स्वरूप होता है वही पिण्ड में (देह में) जीव
का रूप ले लेता है। इस प्रकार प्रकृति-पुरुष की यह जोड़ी माया ने ही दो प्रकार की बनायी है। ब्रह्म अच्छेद्य है,
ऐसा वेद कहते हैं। उसे फाड़कर दो भाग कैसे किये? उसी प्रकार जैसे दर्पण में हमें अपना मुख अलग प्रकार
का दिखायी देता है। उसी प्रकार हम यदि पूर्व की ओर मुँह करके खड़े हो जाएँ तो हमें दर्पण में अपना
प्रतिबिम्ब पूर्वाभिमुख नहीं दिखायी देता। वह हमारे सामने ही (पश्चिमाभिमुख) रहता है। यही माया का
चमत्कार है अर्थात् पुरुष यदि पूर्व की ओर देख रहा है तो प्रतिबिम्ब पश्चिम की ओर रहता है। उसी प्रकार
आत्मदृष्टि स्वरूप की ओर रहती है और जीवदृष्टि प्रपंच की ओर रहती है। इसलिये जीवस्वरूप के सम्मुख हो
नहीं पाता। जीव ठीक विपरीत दिशा की ओर देखता रहता है। उसी प्रकार ब्रह्म में ब्रह्म का जो स्फुरण होता है